Saturday, March 28

गुण-धर्म के आधार पर ग्रहों को अंकों का आधिपत्य

अंक ज्योतिष का आधार मुख्य रूप से 1 से लेकर 9 तक अंक हैं।जिस प्रकार से वैदिक ज्योतिष में 12 राशियां 27 नक्षत्र और नौ ग्रहों का अत्यंत ही महत्व है उसके प्रकार से अंक ज्योतिष में 1 से लोग लेकर 9 तक के अंको का महत्व है प्रत्येक अंक किसी न किसी ग्रह से संबंधित है। लेकिन इसके साथ-साथ जीरो का अंक भी अत्यंत महत्वपूर्ण है यद्यपि जीरो की कीमत कुछ नहीं रखी गई लेकिन फिर भी जीरो जिस ग्रह के जिस अंक के आगे लग जाता है उसकी वैल्यू उसकी कीमत 10 गुना बढ़ा देता है इसलिए आज हम इस पहली क्लास में सबसे पहले बात करेंगे जीरो पर कि जीरो क्या है ।
शून्य (0) निराकार ब्रह्म
अंक या संख्या का शब्द एवं क्रिया से घनिष्ठ संबंध है |0 अर्थात शून्य निराकार ब्रह्म या अनंत का प्रतीक है शून्य से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है एवं शून्य में ही सब कुछ विलीन हो जाता है यह शून्य सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर एवं वृहद से वृहदकर है। हम जब भी अपनी दृष्टि चारों ओर घुमाएंगे तो हमें सब कुछ गोल-गोल ही दिखाई देगा यह गोल ही तो विश्व है| आकाश, पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि सभी कुछ गोलाकार है। हमारे शरीर में स्थित विभिन्न द्वार भी गोलाकार रूप में है इसलिए शून्य की शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है और इस शून्य को हमारे ऋषि-मुनियों ने खोजा जिसे आज पूरा विश्व मान रहा है शून्य से ही श्रेष्ठ की उत्पत्ति हुई और सृष्टि एक कहलाई अर्थात इस सृष्टि को संचालित करने वाली कोई एक शक्ति है जो अदृश्य है जो विधि पूर्वक इस सृष्टि का संचालन कर रही है। वह शक्ति निराकार है इसे ब्रह्म की संज्ञा दी गई इस प्रकार आप देखेंगे कि शून्य वास्तव में निराकार ब्रह्म है। अंक ज्योतिष का मुख्य आधार मूलांक है। परंतु मूलांक को समझने के पूर्व ये जानना अति आवश्यक है कि 0 से 9 तक के अंक क्रमशः किस प्रकार इस सृष्टि से सम्बन्ध रखता है | ये Topic अत्यंत ही logical और महत्वपूर्ण है इसके द्वारा आप ग्रहों के कारकत्वों को भी जान जाएंगे।जैसे शून्य किसी की भी power को बढ़ाने वाला अंक है।ये पृथ्वी तत्व का है।
0 के विषय में उपर बतलाया जा चूका है अतः यहां 1 से 9 तक की विषय के बारे में जानकारी-

1 का अंक -सूर्य
मानव ने जब आंखें खोली तो उसे सूर्य एवं चंद्र दो तारे आकाश में दिखाई दिए यह प्रकाशित ग्रह है सभी ग्रहों में केवल सूर्य और चंद्रमा ही प्रकाश उत्पन्न करने वाले ग्रह इन्हीं के प्रकाश से अन्य ग्रह प्रकाशित होते हैं । यही दो ऐसे ग्रह हैं जो नियमित मनुष्य का मार्ग दर्शन करने की क्षमता रखते हैं सर्वप्रथम इस सृष्टि ने दिन और रात के रूप में समय की गणना शुरू की दिन में सूर्य का प्रकाश और रात में चंद्रमा का प्रकाश लेकिन चंद्रमा के प्रकाश में 15 दिन प्रकाश कम होता जाता है परंतु सूर्य दिन में अनवरत प्रकाश देता रहता है इसलिए चंद्रमा से अधिक शक्ति सूर्य के पास है तो सूर्य को दिन का राजा कहा गया सूर्य इस सृष्टि की आत्मा है | सूर्य आत्म कारक ग्रह होने के कारण चुकी शरीर में आत्मा एक है और निराकार ब्रह्म के अत्यंत समीप है इसलिए 0 के बगल वाली संख्या 1 सूर्य को प्रदान की गई सूर्य को 1 अंक का स्वामित्व प्रदान किया गया ।…

2 का अंक- चंद्रमा
इसके उपरांत चंद्रमा ने रात्रि बनाई और दिन और रात मिलकर समय की पूर्णता स्पष्ट हुई ।चूंकि सृष्टि ने प्रथम पुरुष की उत्पत्ति सूर्य के रूप में की इसके बाद स्त्री की भी आवश्यकता थी अतः चंद्रमा को स्त्री रूप में इस सृष्टि का कार्य सौंपा गया पुरुष और स्त्री ने मिलकर के इस सृष्टि में जनन की क्षमता उत्पन्न कर इस सृष्टि के विस्तार में सहयोग किया । इस प्रकार परम सत्ता को पूर्ण करने वाली संख्या 2 है इसका स्वामित्व चंद्रमा को प्रदान किया गया । सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशक ग्रह हैं जिनका अंक क्रमशः 1 और 2 है अतः जिन व्यक्तियों का मूलांक 1 या 2 होगा वे इस संसार मे अपनी किसी योग्यता को जन जन तक पहुंचाएंगे।फर्क इतना है कि सूर्य अस्त नही होता और कभी क्षीर्ण नही होता अतः उसका यश अधिक होगा और वो बिना रुकावट के अपनी योग्यता का प्रदर्शन करेगा परन्तु 2 मूलांक वाला व्यक्ति कृष्ण पक्ष में रुकावट अनुभव करेगा|
3का अंक – ब्ाृहस्पति
ब्रह्म से इस सृष्टि का आरंभ हुआ इसके उपरांत पुरुष ग्रह सूर्य और स्त्री ग्रह चंद्रमा ने इस सृष्टि को अपने आगोश में लिया और फिर आवश्यकता पड़ी एक ऐसे गुरु की जो सूर्य और चंद्रमा सहित इस सृष्टि को सही दिशा दे सके उसके मार्गदर्शन के लिए 3 का अंक बृहस्पति को दिया गया जो देवगुरु कहलाए |इस प्रकार 3 के अंक को विस्तार का अंक माना गया जिस प्रकार सूर्य का आत्मा से संबंध है चंद्रमा का मन से संबंध है उसी प्रकार से बृहस्पति का संबंध फैलाव और आत्मा तथा मन के विस्तार तथा ज्ञान से है ।बृहस्पति सूर्य और चंद्रमा को नियंत्रित करने वाले देव हैं इस सृष्टि का विस्तार गलत प्रकार से ना हो इसके लिए इस सृष्टि ने तीसरा अंक बृहस्पति को दिया | तीन शक्तियां उत्पत्ति, पालन एवं संहार हैं इन्हें ब्रह्मा विष्णु महेश के नाम से भी जाना जाता है ।सतोगुणी ब्रह्म ,रजोगुण विष्णु ,और तमोगुण ही शिव है ।बचपन ,जवानी और बुढ़ापा भी यही हैं । मनुष्य के तीन कर्म हैं संचित ,प्रारब्ध और आगामी |इसी बात का संकेत 3 का अंक बृहस्पति के रूप में मिलता है।
4 का अंक – राहु
इस अंक का अधिकार राहु को मिला क्योंकि प्रकृति में बहुत सारी वस्तुएं छिपी हुई हैं जो विशेष परिस्थितियों में उजागर होती हैं राहु ने छिपकर अमृतपान किया इसी कारण सृष्टि का चतुर्थ हिस्सा राहु को बनाया गया।गूढ़ ज्ञान ,छिपा हुआ ज्ञान जैसे 4 वेद ,4 वर्ण ,जीवन की 4 अवस्थाए आदि का प्रतिनिधित्व 4 का अंक अर्थात राहु के पास है। देव गुरु ब्रहस्पति को अपने ज्ञान का अहंकार न हो जाये इसीलिए उनके बगल वाली संख्या राहुको प्रदान की गई की की राहु उनकी छिपी हुई कमियों को उन्हें बता सकें और देव गुरु को अहंकार की अनुभूति न हो |
5 का अंक- बुध
मनुष्य ने अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पंच तत्वों आकाश ,वायु,अग्नि,जल एवं पृथ्वी के रूप में पहचाना तथा इनके गुणों को क्रमशः शब्द,स्पर्श ,रूप ,रस एवं गंध को जाना ।बुद्धि के बिना इसे जानना असंभव था इसी कारण 5 का अंक बुद्धि के कारक ग्रह बुध को दिया गया । 5 अंक की शक्ति का सम्बंध बौद्धिक सुखों से है जिसका अधिपत्य बुध ग्रह के पास है।
6 का अंक- शुक्र
जब मनुष्य सूर्य रूपी आत्मा ,चन्द्र रूपी मन, ज्ञान रूपी गुरु, छल कपट एवं छिपी शक्ति रूपी राहु, बुद्धि रूपी बुध को ले चुका तो उसे भौतिक सुखों और काम वासना की आवश्यकता हुई जिसकी पूर्ति हेतु 6 का अंक शुक्र को प्रदान किया गया। समग्र ऐश्वर्य, यश ,श्री ,रूप, वीर्य और यश इन्ही छह गुणों को ही शुक्र कहा जाता है। 6 के अंक की शक्ति अर्थात मृत संजीवनी शुक्राचार्य को ही प्रदान की गई अतः 6 का अंक चिक्तित्सा जगत के लिए भी एक वरदान है |
7 का अंक – केतू
शुक्र रूपी भोग को जीवन मे उतारने के बाद मनुष्य को तृप्ति का अनुभव होता है।पति -पत्नी जब भोग से तृप्त होकर अलग होते हैं तब उसे ही मोक्ष की संज्ञा दी गई है । 7 का अंक पूर्णता का है। किसी भी कार्य के completion में 7 का महत्वपूर्ण योगदान है । 7 का अधिष्ठाता ग्रह केतु है जिसे मोक्ष का कारक माना गया है। इसे आध्यात्मिक अंक भी कहा जाता है।(अनुभव के आधार पर मेरा भाग्यांक 7 है जिसके प्रभाव से मुझे आध्यात्मिक और ज्योतिषीय क्षेत्र में सफलता मिली ) | केतू झंडे एवं छोटी का प्रतीक है | मंदिर का गुम्बद भी केतू है जो धर्म के प्रति सजग रहना सिखाता है | अतः 7 के अंक की शक्ति आध्यात्मिक शक्ति है जो हमेशा ऊँचा उठने की प्रेरणा देती है |
8 का अंक – शनि
कालपुरुष की यात्रा आत्मा से आरम्भ होकर जब पूर्णता तक पहुंची तब जीवन मे उसके द्वारा किये हुए पाप पुण्य का लेखा जोखा और उसके आधार पर न्याय करने का समय आया | शनि इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के न्यायाधीश हैं अतः सृष्टि के द्वारा 8 का अंक शनि को दिया गया जो कर्म तथा न्याय के देवता हैं ।शनि के पास शरीर को सुख और दुख देने वाली दोनो शक्तियां हैं । 8 का अंक कर्मप्रधान है । देर से फल देना इसकी नियति है। कर्म करने की शक्ति और फल का निर्णय करने वाला अंक 8 सूर्य -पुत्र शनि के पास है | इस प्रकार सूर्य यदि स्रष्टि के संचालक हैं तो शनि कर्म करने की प्रेरणा देने वाले ग्रह | शनि आयु के प्रदाता हैं |
9 का अंक – मंगल
9 का अंक स्वतंत्र अंक है ।किसी भी संख्या को कहीं भी ले जाएं उसका योग 9 के आगे जा ही नही सकता ।कालपुरुष की यात्रा सूर्य रूपी आत्मा से आरम्भ होते हुए शनि रूपी मृत्यु तक आती है और अंत मे उसे मंगल रुपी अग्नि में डालकर पुनः शून्य रूपी सृष्टि में मिला दिया जाता है । अग्नि के कारक ग्रह मंगल को एकल संख्या का अंतिम अंक 9 प्रदान किया गया । मंगल सेनापति हैं तथा सीताजी के द्वारा उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधियों का वरदान प्राप्त है | 9 के अंक की शक्ति सिद्धियों और निधियों की शक्ति है । इस प्रकार 0 (शून्य ) रुपी स्रष्टि या निराकार ब्रह्म ने क्रमशः 1 से लेकर 9 तक के अंको को ग्रहों के गुण -धर्म के आधार पर इस प्रकृति के संचालन का कार्य सौंपा | प्रत्येक व्यक्ति का एक मूल अंक अवश्य होता है जिसे मूलांक कहा गया| जिस प्रकार ब्रह्म ने जिस भी ग्रह को जो अंक दिया है ,प्रत्येक व्यक्ति को अपने मूलांक के आधार पर प्रकृति के सृजन में सहयोग करना चाहिये |