Saturday, March 28

प्रेम के कैनवास पर बिखरे रंग: डॉ अनुराधा चंदेल ‘ओस’

प्रेम के कैनवस पर अनेक रंग बिखरे पड़े हैं। आतुर मन को उन्हें समेटने की जल्दी पड़ी है। जंगल मे जोगी की सारंगी की टीस प्रेम की टीस को और बढ़ाती है। प्रेम और बसंत ऋतु का परस्पर गहरा सम्बन्ध है । बसंत ऋतु में प्रेम की आतुरता और बढ़ जाती है। बसंत आते ही सम्पूर्ण धरती प्रेम के रंग में रंग जाती है,और धरा धानी चूनर पहन इठलाती है। कालिदास की लिखी रचना देखें…..
मधुद्विरेफ़ कुसुमैकपात्रे
पपौ प्रियां स्वां अनुवर्तमान
शृंगेड च स्पर्शनि मिलितक्षीण
मृगीं अकंडूमत कृष्णसार ।
‘कुसुम के एक पात्र से मधु पीता भ्रमर प्रिया के पीछे मंडराता स्पर्श सुख में आँखे मूँद खड़ी मृगी के सींग लगा कृष्णसार मृग’ ।
ददौ रसातपडकजरेनुगन्धि
गजाय गंडू षजल करेणु:
अधोर्पभुक्तेन बिसेनजया
सम्भाव्यमास रथाडगनामा।
‘कमल के पराग से सुरभित जल हथिनी अपनी सूंड में भरकर अपने प्रिय गज को पिलाने लगी,अधखाई कमल की नाल के टुकड़े से लगा रिझाने ‘।
गितान्तरेषु श्रम वारिलेशै
किंचितसमुगच्छवासित पत्रलेखनम
पुष्पासवाधुणीरते नेत्रशोभि
प्रिया मुखं कीं पुरुषशचुचुम्बते।।
‘गाते-गाते सहसा थककर पसीने की बुंदकियों से कुछ उछले गुदनेवाला फूलों की मदिरा से उतराते नैनोवल,किन्नर ने चूम लिया प्रिय का मुख’। बात प्रेम की चल रही हो तो राधा -कृष्ण के प्रेम को कैसे भूल सकतें है। राधा-कृष्ण की प्रेमकथा अलौकिक प्रेमकथा के रूप में भारतीय साहित्य में अमर है। जिस पर हजारों कवियों ने अपनी लेखनी चलाई है, भले ही कृष्ण का विवाह रुक्मिणी से हुआ हो ,लेकिन कृष्ण के साथ आज भी राधा की पूजा की जाती है।
इस कविता को देखें….
सुनो कान्हा
मैं फूल बनाना चाहती हूँ
तुम्हारे गले की माला बनकर
फैलाना चाहती हूँ जग में सुगन्ध
सुनो कान्हा
मैं चैत की धवल चाँदनी बन
तारों की चुनरी ओढ़
नभ में सौंदर्य भरना चाहती हूँ।(ओस)
अमृता प्रीतम की कविता तो मुहब्बत के रंगों से सरोबार है। उनकी कविताएं प्रेम के रस में डूबी हुई हैं…
कलम ने आज गीतों का काफिया तोड़ दिया।
मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आ गया है॥
उठो अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो।
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी ॥
हिंदी साहित्य की मशहूर कवयित्री महादेवी वर्मा ने तो प्रेम के दूसरे पक्ष पर ज्यादा लिखा…..

निशा को धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल
कली से कहता मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल
बिछाती थी सपनों का जाल
तुम्हारी वह करुणा की कोर
पाब्लो नेरूदा ने प्रेम कविता में कहा…..
लिख सकता हूँ सबसे उदास कविताएँ आज की रात,जैसे लिखूं रात है तारो भरी
टिमटिमाते हैं, नीले तारे कहीं बहुत दूर
रात की हवा आकाश में चक्कर काटती है और गाती हैं,
लिख सकता हूँ सबसे उदास कविताएं आज की रात,
मैंने उससे प्यार किया और कभी-कभी उसने भी मुझसे प्यार किया।
बेतहाशा फैली रात को सुनते हुए, जो उसके बगैर है औरभी अगाध।
और आत्मा में कविता गिरती है जैसे चरागाह में ओस।।
जब हम प्यार करतें हैं ,हमारे अंदर जैव रसायन अपना प्रभाव हम पर जमा रहें होते हैं।अगर प्रेम और उससे जुड़ी भावनाएं न हो तो सिर्फ प्रेमी -प्रेमिका ,माता -पिता ,भाई-बहन, दोस्त इत्यादि के साथ रिश्ते भी नही होते। लव हार्मोन सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका या दम्पतियों के बीच प्यार नही लाता ,अपितु माँ और बच्चे के बीच मे भी अटूट प्यार का रिश्ता बनता है। बच्चे का जन्म से ही माँ से गहरा लगाव रहता है,और ताउम्र रहता है । इसके पीछे उसके दिमाग मे जाने वाला लव हार्मोन का बहुत गहरा हाथ है।सिर्फ पति-पत्नी,भाई-बहन,मां-बच्चा, आदि के बीच विश्वास और प्यार नही है तो शरीर मे दर्द की शिकायत हो सकती है,अगर आर्थिक परेशानी है ,परन्तु प्यार है ,भरोसा है तो ऐसी समस्या देखने को नही मिलती। अफगानिस्तान की कुछ महिला कवयित्रियों की लिखे मुहब्बत के नगमे यहां देखें…..
राबिया बालखि—-914 ई.-943ई. प्रेम करने की वजह से कलाई काट देने के बाद ,यह कविता स्नानघर के दीवार पर लिखी।
मैं कैदी हूँ तुम्हारे प्यार की
इस कैद से मुक्ति सम्भव नही
प्यार है एक सीमाहीन समुद्र
जो बुद्धिमान होगा
नही चाहेगा तैरना इसमे।
बहार सईद-(पश्चिमी प्रान्त की विद्रोही अफगानी कवयित्री ,जिसे प्रेम की वजह सर से अपना देश छोड़ना पड़ा।
उसने एक बार मेरा चुंबन लिया
और चुरा लिया मेरे होंठों को
हमेशा के लिए मेरी नींदें चुरा लीं
मैं डर जाती हूँ
जब वह छुएगा मेरी देह
मेरा धैर्य जवाब दे जाएगा ।।
कहने का तात्पर्य है कि ,लोग चाहे जहां के हो दुनिया के किसी भी प्रान्त ,किसी भी देश मे, लेकिन प्यार वो एहसास है जिसे सहृदय महसूस करतें हैं, और अपने सम्पूर्ण समर्पण को अपने प्रिय को देना चाहतें हैं। प्रेम में व्यक्ति को सारी दुनिया अत्यंत ख़ूबसूरत लगती है। लेकिन आज के भौतिकवादी युग ने प्रेम की चमक फीकी पड़ रही है। आज कोयल की कूक यदा कदा ही सुनाई पड़ती है ।
हवाएं इतनी प्रदूषित हो गयी है कि वसंत कब आया पता ही नही चलता। शहरों में तो वसंत के आगमन का पता।ही नही चलता,कब सरसों फूले,कब अमराइयों में मंजरियाँ आयी कब तितलियाँ उड़ी ,पता ही नही चलता। हाँ गांवो में अब भी वसंत आता है ,लेकिन हम दुनिया भर के कामों में इतने व्यस्त रहतें है कि ,उसका आनंद नही ले पातें हैं। (मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)