Friday, February 21

लेखन बेपरवाह न हो, गहराई में जाएं तब लिखें जूही चतुर्वेदी

फिल्म “पीकू” की पटकथा लेखिका जूही चतुर्वेदी ने कहा कि वह अपने पात्रों को गढ़ने के लिए बहुत समय देती हैं और उन्हें इस तरह से नहीं लेतीं कि मांग के हिसाब से बिना सोचे-समझे बस किसी तरह निपटाया जाए। “अक्टूबर” और “विकी डॉनर” जैसी प्रशंसित फिल्मों की पटकथा लिखने वाली चतुर्वेदी का कहना है कि विज्ञापन में उनके करियर ने उन्हें सिखाया है कि किसी विचार को कागज पर उतारने से पहले उसे कुछ समय के लिए जीना चाहिए। उन्होंने द रेड स्पैरो के ‘रील टॉकीज’ के सत्र के दौरान कहा, “आप बस सोचने पर कई दिन बिता सकते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आपके दिमाग में कोई विचार आया और आप अपना लैपटॉप उठा कर कहानी लिखने लग गए। हर चीज पर मंथन करना होगा, लेखनी की गति जरूर इससे धीमी हो जाती है। “आप ज्यादा विचार किए बिना कुछ भी नहीं लिख सकते। सिनेमा की खूबसूरती है कि यह इतना पारदर्शी है, यह पर्दे पर साफ-साफ दिखता है। क्या पर्दे पर जो कुछ दिख रहा है उस पर विचार करने के लिए आपने पर्याप्त समय लिया है?’’ इस सत्र में पटकथा लेखिका अलंकृता श्रीवास्तव, रितेश शाह और सुदीप शर्मा भी मौजूद थे। चतुर्वेदी ने कहा कि कुछ विचार रोजाना आपके दिमाग में नहीं आते। उन्होंने “पीकू’’ का उदाहरण देते हुए कहा कि जब आप गहराई में जाते हैं तभी इस तरह का कुछ बाहर आता है कि माता-पिता खुद से जिंदा नहीं रहते बल्कि उनको जिंदा रखना पड़ता है।