Friday, December 6

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लायन्स क्लब नई दिल्ली शक्ति द्वारा शांति पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन

लायन्स क्लब नई दिल्ली शक्ति द्वारा शांति पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन

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आज के समाज में शांति एक आम मुद्दा है। क्या यह कभी हम सबको मिलेगी ? मिलेगी तो कब ? क्या यह सचमुच संभव है ? यह सवाल लायन क्लब के अध्यक्ष इंदु गुप्ता ने उठाये हैं। उनका सवाल है कि मानव कल्याण की शांति के लिए भगवान राम या भगवान मसीह फिर से आएंगे ? क्या दुनिया फिर से एकजुट हो जाएगी ? विश्व के भविष्य में शांति के बने रहने को लेकर किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी नहीं किया जा सकता है। लेकिन हम कोशिश नहीं कर सकते क्या ? हम सिर्फ बैठकर विनाश और हमारे चारों ओर चल रहे सांप्रदायिक युद्ध को देखते रहना चाहिए। इस संबंध में मेरा अपना सिद्धांत है I जब हम नकारात्मक लोगों के नकारात्मक प्रभावों से अछूते हैं, तो हम बहुत कम उम्र में बच्चों के बीच शांति और इसका अर्थ क्यों नहीं पैदा कर सकते हैं ? हम लायंस क्लब नई दिल्ली के सदस्य लायंस इंटरनेशनल की के जरिये किशोरों के लिए यही कोशिश कर रहे हैं। लायन इंटरनेशनल हर साल 1
भारत में ’महिला सशक्तिकरण’ की ज़रुरत

भारत में ’महिला सशक्तिकरण’ की ज़रुरत

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जैसा कि हम सभी जानते है कि भारत एक पुरुषप्रधान समाज है जहाँ पुरुष का हर क्षेत्र मंे दखल है और महिलाएँ सिर्फ घर-परिवार की जिम्मेदारी उठाती है साथ ही उनपर कई पाबंदियाँ भी होती है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत आबादी केवल महिलाओं की है मतलब, पूरे देश के विकास के लिये इस आधी आबाधी की जरुरत है जो कि अभी भी सशक्त नहीं है और कई सामाजिक प्रतिबंधों से बंधी हुई है। ऐसी स्थिति में हम नहीं कह सकते कि भविष्य में बिना हमारी आधी आबादी को मजबूत किये हमारा देश विकसित हो पायेगा। अगर हमें अपने देश को विकसित बनाना है तो ये जरुरी है कि सरकार, पुरुष और खुद महिलाओं द्वारा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाये। महिला सशक्तिकरण की जरुरत इसलिये पड़ी क्योंकि प्राचीन समय से भारत में लैंगिक असमानता थी और पुरुषप्रधान समाज था। महिलाओं को उनके अपने परिवार और समाज द्वार कई कारणों से दबाया गया तथा उनके साथ कई प्रकार की हिंसा हुई
ऋतुओं में वसंत हूं मैं

ऋतुओं में वसंत हूं मैं

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मासानां मार्गशीर्षों अहम् ऋतूनां कुसुमाकरः गीता में भगवान श्री क्ृष्ण कहते हैं कि छह ऋतुओं में वसंत मैं हूं। वसंत ज्ञान, विद्या, कलाओं की धात्री मां सरस्वती के स्मरण का पर्व, मदनोत्सव का पर्व, प्रकृति के निखार का पर्व, संपूर्ण चराचर में नवचेतना लाने वाला पर्व है। प्रकृति अपने संपूर्ण निखार के साथ वसन्त ऋतु में निखर कर आती है और ऐसा लगता है जैसे नवयौवना सोलह श्रृंगार करके अपने प्रियतम का स्वागत करने को आतुर हो। वसंत के आगमन से संसार का चित्त जाग उठता है। महाकाव्यों के अनुसार वसंत पंचमी कामदेव के अवतार का दिन है। कामदेव अर्थात् इन्द्र के प्रिय सखा, ऋषियों-मुनियों तक के सत् को डिगा देने वाले। अपने पांच बाणों से क्या-क्या नहीं किया है कामदेव ने। इसी कामदेव के अवतार दिवस यानि वसंत के आगमन के साथ ही चारों तरफ पुष्प ही पुष्प पल्लवित हो जाते हैं, नई कोपलें आती है, हरितमा फैल जाती है, ऐसा लगता है म
नारी सशक्ितकरण के बिना मानवता का विकास अधूरा है

नारी सशक्ितकरण के बिना मानवता का विकास अधूरा है

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“ चाहे खेल कूद हो अथवा अंतरिक्ष विज्ञान, हमारे देश की महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। वे आगे बढ़ रही हैं और अपनी उपलब्धियों से देश का गौरव बढ़ा रही हैं।” “यह जरूरी है कि हम स्वयं को और अपनी शक्तियों को समझें। जब कई कार्य एक समय पर करने की बात आती है तो महिलाओं को कोई नहीं पछाड़ सकता। यह उनकी शक्ति है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए।” “आइये हम लड़कियों के जन्म होने पर खुशियां मनाएं। हमें अपनी बेटियों पर समान रूप से गर्व होना चाहिए। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि बेटी के पैदा होने पर पांच पौधे लगाकर खुशियां मनाएं।” “हमें समाज में ही नहीं, बल्कि परिवार के भीतर भी महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव को रोकना होगा।” “महिलाओं को खुद से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए - सही मायने में हम तभी नारी सशक्तिकरण को सार्थक कर सकते हैं।” “नारी सशक्तिकरण में आर्थिक स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण भूमिका होती
आश्रमोपेक्षा और प्रकृति से विमुखता ने किया मानव जीवन पीड़ित

आश्रमोपेक्षा और प्रकृति से विमुखता ने किया मानव जीवन पीड़ित

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-अनिल शर्मा सरल शब्दों में कहा जाए कि मानव विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति से खिलवाड़ किया तो इसका बदला भूकंप, सूखा, अतिवृष्टि सहित अनेक घटना-दुर्घटनाओं से मानव को दो-चार होना पड़ा। यही कारण है कि आज का मानव आश्रम की उपेक्षा की वजह से पंगु बन गया है। प्रकृति से खिलवाड़ के संबंध में ख्‍यात फिल्म अभिनेत्री मीनाकुमारी ने कहा था कि 'मां और प्रकृति में यही अंतर है कि मां माफ कर देती है, मगर प्रकृति नहीं। प्रकृति से खिलवाड़ करने की वजह से ही आज मनुष्य का स्वास्थ्य, उम्र, शिक्षा आदि में काफी कमी आ गई है।' कहने को तो स्वास्थ्य के लिए अनेक सरकारी व गैरसरकारी चिकित्सा सुविधाएं हैं, मगर प्राकृतिक रूप से आज से सदियों पहले जो स्वस्थ मनुष्य था, वह आज नहीं है। पहले के दौर में जब इतना विकास नहीं हुआ था, संसाधन नहीं थे, मगर मनुष्य प्रकृति से जुड़ा था, शुद्ध पर्यावरण था और तब की उम्र 100 से भी आगे बढ़ जाती थी। आज
आलू के बहाने बाजार व्यवस्था की खुलती पोल

आलू के बहाने बाजार व्यवस्था की खुलती पोल

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ए आलू के आते ही हमारी बाजार व्यवस्था ने एक बार फिर पोल खोल कर रख दी है। नए आलू आने के बाद आलू की लागत भी नहीं निकलने के चलते यूपी-पंजाब के किसान आलू सड़कों पर फेंकने की राह पर आ रहे है। मण्डियों में आलू के भाव लागत जितने भी नहीं मिल रहे हैं। मोहल्ले में फेरी लगाने वाला या गली कूचे में दुकान खोल कर बैठा सब्जी बेचने वाला उसी आलू को आठ से दस रूपए किलो बेच रहा है। बड़े-बड़े मॉल वाले सस्ती दर पर सब्जी के विज्ञापन देकर इस तरह से दिखा रहे हैं, जैसे वे खुद घाटा खाकर हमें सस्ते में आलू या सब्जियां बेच रहे हंै। नए आलू आने से कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू को निकालने की आवश्यकता हो रही है वहीं आलू के भावों में तेजी से कमी आई है। कारण यह कि गोदामों में आलू का रखरखाब महंगा पड़ रहा है मालिक आलू ले जाने को तैयार नहीं है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कई प्रदेशों में यही आलू कई गुणा अधिक दाम पर आम आदमी को मिल
बाल कहानी – अगली बार जरूर आना

बाल कहानी – अगली बार जरूर आना

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अनुभव चिल्लाया-‘मम्मी! यहाँ आओ। देखो न, ये नई चिडि़या हमारे घर में घुस आई है। इसकी पूँछ दो मुँह वाली है।’ अमिता दौड़कर आई। खुशी से बोली-‘अरे! ये तो अबाबील है। प्रवासी पक्षी। दूर देश से आई है। ये हमेशा यहाँ नहीं रहेगी। कुछ महीनों बाद ये वापिस अपने वतन चली जाएगी।’ अनुभव सोचने लगा- ‘इसका मतलब ये विदेशी चिडि़या है। भारत में घूमने आई है। मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूँगा।’ अबाबील का जोड़ा मेहनती था। दोनों ने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने घर की बैठक वाले कमरे का एक कोना चुन लिया था। छत के तिकोने पर दोनों ने मिलकर घोंसला बना लिया। अमिता ने अनुभव से कहा- ‘अबाबील ने कितना सुंदर घोंसला बनाया है। अब हम इन्हें झुनका और झुनकी कहेंगे।’ अनुभव ने पूछा- ‘मम्मी। ये अपनी चोंच में क्या ला रहे हैं?’ अमिता ने बताया- ‘झुनकी अंडे देगी। घोंसला भीतर से नरम और गरम रहेगा। इसके लिए झुनका-झुनकी घास-फूस के तिनके,
कविता – तेरी बंसी कान्हा

कविता – तेरी बंसी कान्हा

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बंसी तेरी मधुर है कान्हा पर जानें छेड़े कौन सी तान? बजती जब जब मुरली प्यारी तन से निकल जात हैं प्राण। गैया तेरी नांचे छमछम मेघ उमड़-घुमड़ कर आए। पनघट पे खड़ी गोपियां सारी तेरी मुरली की धुन में खो जाएं। राधा रानी तेरी दिवानी तेरी बांसुरी पे मरती है। गोकुल के हर कण-कण का तेरी बंसी निद्रा हरती है। तेरे राग बिन सुना है जग तुझ बिन अशांत खड़ी है कृष्णा तू बड़ा मतवाला केशव जग में भरी है तेरे प्रेम की तृष्णा। मुकेश सिंह सिलापथार, असम
‘मुगल-ए-आजम: द म्यूजिकल’ में दिखेगा सलीम और अनारकली का प्रेम

‘मुगल-ए-आजम: द म्यूजिकल’ में दिखेगा सलीम और अनारकली का प्रेम

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मुंबई में 60,000 श्रोताओं का रिकॉर्ड बनाते हुए, चार सीजनों की शानदार सफलता के बाद ‘मुगल-ए-आजम : द म्यूजिकल’ देश की राजधानी में पहुंचने को तैयार है। भारत के सबसे बड़े थिएटर प्रोडक्शन के रूप में प्रशंसा हासिल करने वाला यह प्रतिष्ठित प्ले सितंबर महीने में दिल्ली वालों की वाह-वाह लूटने को तैयार है। इस प्रतिष्ठित प्ले 9 से 17 सितंबर के दौरान जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में प्रदर्शित किया जाएगा। मुगल राजकुमार सलीम व अनारकली की सदाबहार प्रेमकथा को एक बार फिर से सिरजते हुए ‘मुगल-ए-आजम : द म्यूजिकल’ ने अपने श्रोताओं को अपने शानदार प्रदर्शनों, महंगे सेटों, विश्वस्तरीय प्रोडक्शन डिजाइन और मनीष मल्होत्रा के अत्यधिक सुंदर परिधानों के जरिए मंत्रमुगध कर दिया है। यह प्ले इस कथा को एक बार फिर से नए श्रोताओं के समक्ष जीवंत करने का वायदा करता है। इसी शो के सिलसिले में प्रख्यात फैशन डिजायनर मनीष मल्होत्रा, जिन्हों
मौसम के रंग ने जगाई उमंग

मौसम के रंग ने जगाई उमंग

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पावस की पहली फुहारों द्वारा पृथ्वी की प्यास बुझाये जाने पर निःसृत मिट्टी की सोंधी सुरभि जब चाणक्य के नासिका रंध्रों का स्पर्श करती होगी, तो क्या राजनीति तथा राजनीतिक सिद्धांतों के अपने अविराम विवेचन से एक पल का अवकाश ले वे आनंदमग्न न होते होंगे? मुझे तो इसका उत्तर सकारात्मक ही प्रतीत होता है, क्योंकि उन सरीखे प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिए न तो यह संभव था-और न ही ऐसा होना चाहिए-कि वह बस एकल रुचियुक्त ही हो. शीत से लेकर लघुकालिक वसंत, फिर वर्षाऋतु तक की विस्तृत अवधि और अक्तूबर-नवंबर की हल्की सिहरन भरी रातों के बाद एक बार पुनः ठिठुरते शीत तक उत्तर भारतीय मौसम के बदलते रंग आपके हृदय को उमंग और यादों से पूरित कर देते हैं। ऐसे प्रत्येक वृत्त के पूरा होने के साथ ही प्राकृतिक रंगों की यह छवि निहारने के अद्भुत अवसरों का एक और वर्ष हमारी जीवनावधि से कम जो हो जाता है! एक ऐसे ही वर्ष की याद मेरे दिल