Tuesday, October 15

Spirituality

चमत्कारिक है उज्जैन की गढ़कालिका माता का मंदिर

चमत्कारिक है उज्जैन की गढ़कालिका माता का मंदिर

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मध्यप्रदेश के उज्जैन के कालीघाट स्थित कालिका माता के प्राचीन मंदिर को गढ़ कालिका के नाम से जाना जाता है। देवियों में कालिका को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। गढ़ कालिका के मंदिर में मां कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। कालिकाजी के इस स्थान पर गोपाल मंदिर से सीधे यहां जाया जा सकता है। गढ़ नामक स्थान पर होने के कारण गढ़ कालिका हो गया है। मंदिर के प्रवेश-द्वार के आगे ही सिंह वाहन की प्रतिमा बनी हुई है। आसपास दो तरफ धर्मशालाएं हैं। इसके बी
हनुमान चलीसा के चौपाई में छिपा है सेहत की समस्याओं से मुक्ति का राज

हनुमान चलीसा के चौपाई में छिपा है सेहत की समस्याओं से मुक्ति का राज

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मंगलवार और शनिवार का दिन महाबली हनुमान की पूजा के लिए सबसे उत्तम दिन माना गया है, इसलिए भक्त अपने जिंदगी में हो रही किसी भी कष्टों का निवारण के लिए बजरंगबली के मंदिर जरूर जाते हैं। वैसे तो साधारण पूजा से भी महाबली हनुमान अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन अगर कोई भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए हनुमान चलीसा या बजरंग बाण का पाठ करता है तो बजरंग बली हनुमान उनकी प्रार्थना जल्दी सुनते हैं। अब हम आपको बताते हैं कि किस प्रकार के कष्ट में कौन सी चौपाई या मंत्र से सबसे ज्यादा प्रभावी होता है, इसलिए किसी भी प्रकार के संकट या कष्ट के लिए हनुमान के इस मंत्र का जाप करना चाहिए। आइए जानते हैं उनकी उपासना का शुभ समय क्या है और किस तरह उपासना करने से सारे संकटों से मुक्ति मिल जाती है। संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमिरे हनुमत बलबीरा यानि जो कोई भक्त महावीर हनुमान का ध्यान करता रहता है, उसके सब संकट
वसंत पंचमी पर ऐसे करें मां सरस्वती की पूजा

वसंत पंचमी पर ऐसे करें मां सरस्वती की पूजा

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माघ शुक्ल की पंचमी तिथि को विद्या और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की उपासना की जाती है, इसी उपासना के पर्व को वसंत पंचमी कहते हैं। वर्ष के कुछ विशेष शुभ काल में से एक होने के कारण इसको 'अबूझ मुहूर्त' भी कहा जाता है। इसमें विवाह, निर्माण तथा अन्य शुभ कार्य किए जा सकते हैं। ऋतुओं के इस संधिकाल में ज्ञान और विज्ञान दोनों का वरदान प्राप्त किया जा सकता है। इस वर्ष 22 जनवरी को वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाएगा। वसंत पंचमी के दिन संगीत कला और आध्यात्म का आशीर्वाद भी लिया जा सकता है। अगर कुंडली में विद्या बुद्धि का योग नहीं है या शिक्षा की बाधा का योग है तो इस दिन विशेष पूजा करके उसको ठीक किया जा सकता है। जो लोग मूक अथवा बधिर हैं, उनके लिए भी आज मां शारदा की उपासना लाभकारी होगी। कैसे करें मां सरस्वती की उपासना? 4इस दिन पीले या सफेद वस्त्र धारण करें, काले या लाल वस्त्र नहीं। 4तत्पश्चात पूर्व या उत
हिन्दुओं का एकमात्र मंदिर जहां नहीं होती मूर्ति पूजा

हिन्दुओं का एकमात्र मंदिर जहां नहीं होती मूर्ति पूजा

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माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती,
महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य

महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य

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शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को व्यवस्थित करने का भरपूर प्रयास किया। उन्होंने हिंदुओं की सभी जातियों को इकट्ठा करके 'दसनामी संप्रदाय' बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया जिस पर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई। लेकिन हिंदुओं के साधुजनों और ब्राह्मणों ने मिलकर सब कुछ मटियामेट कर दिया। अब चार की जगह चालीस शंकराचार्य होंगे और उन सभी की अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियां और ठाठ-बाट है क्योंकि उनके पीछे चलने वाले उनके चेले-चपाटियों की भरमार है जो उनके अहंकार को पोषित करते रहते हैं। शंकराचार्य का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण के यहां हुआ। मात्र 32 वर्ष की उम्र में वे निर्वाण प्राप्त कर ब्रह्मलोक चले गए। इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने भारतभर का भ्रमण कर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने के लि
‘नटराज’ भगवान शिव के प्रदोष-नृत्य की पावन कथा

‘नटराज’ भगवान शिव के प्रदोष-नृत्य की पावन कथा

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एक बार की बात है 'नटराज' भगवान्‌ शिव के तांडव-नृत्य में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवगण कैलाश पर्वत पर उपस्थित हुए। जगज्जननी माता गौरी वहां दिव्य रत्नसिंहासन पर आसीन होकर अपनी अध्यक्षता में तांडव का आयोजन कराने के लिए उपस्थित थीं। देवर्षि नारद भी उस नृत्य कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए लोकों का परिभ्रमण करते हुए वहां आ पहुंचे थे। थोड़ी देर में भगवान्‌ शिव ने भाव-विभोर होकर तांडव-नृत्य प्रारंभ कर दिया। समस्त देवगण और देवियां भी उस नृत्य में सहयोगी बनकर विभिन्न प्रकार के वाद्य बजाने लगे। वीणावादिनी मां सरस्वती वीणा-वादन करने लगीं, विष्णु भगवान्‌ मृदंग बजाने लगे, देवराज इंद्र बंशी बजाने लगे, ब्रह्माजी हाथ से ताल देने लगे और लक्ष्मीजी गायन करने लगीं। अन्य देवगण, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, उरग, पन्नग, सिद्ध, अप्सराएं, विद्याधर आदि भाव-विह्वल होकर भगवान्‌ शिव के चतुर्दिक्‌ खड़े होकर उनकी स्तुति मे
अध्यात्म एक दर्शन है

अध्यात्म एक दर्शन है

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ध्यात्म एक दर्शन है, चिंतन-धारा है, विद्या है, हमारी संस्कृति की परंपरागत विरासत है, ऋषियों, मनीषियों के चिंतन का निचोड़ है, उपनिषदों का दिव्य प्रसाद है। आत्मा, परमात्मा, जीव, माया, जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, सृजन-प्रलय की अबूझ पहेलियों को सुलझाने का प्रयत्न है अध्यात्म। यह अलग बात है कि इस प्रयत्न को अब तक कितनी सफलता मिल पाई है। अब तक निर्मित स्थापनाएं, धारणाएं, विश्वास, कल्पनाएं किस सीमा तक यथार्थ की परिधि को छू पाई हैं, यह प्रश्न अनुत्तरित है, पर इस दिशा में अनंत प्रयत्न अनेक उर्वर मस्तिष्कों द्वारा किए जाते रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। वेदों का रचनाकाल (जो अनुमानित 5000 वर्ष पूर्व का है) 'वैदिककाल' कहा जाता है। तब हमारा देश कृषि और पशुपालन युग में था। उस समय के निवासी कर्मठ, फक्कड़, प्रकृ‍तिप्रेमी, सरल और इस जीवन को भरपूर जीने की लालसा वाले थे। उन्होंने कुछ प्राकृतिक शक्तियों की पह
श्मशान घाट की अग्नि सबसे खराब,  कैसे और क्यों?

श्मशान घाट की अग्नि सबसे खराब, कैसे और क्यों?

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हाल ही में मुरारी बापूजी ने गुजरात के एक जोड़े की श्मशान घाट में शादी करवा दी। कहते हैं कि वर और वधु ने चिता के फेरे लिए थे। निश्चत ही यह घोर निंदनीय है। धर्म का मार्ग दिखाने वाले कैसे ऐसा अधर्मी कार्य कर सकते हैं? धर्मशास्त्र हमें सही और गलत में फर्क करना सिखाता है। उसमें मुख्‍यत: 16 संस्कारों को अच्छे से परिभाषित किया गया है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मंदिर में देवता के समक्ष किसी का दाह संस्कार कर दें? तब फिर कैसे कोई चिता के फेरे ले सकता है? आओ जानते हैं कि शास्त्र क्या कहता है। शास्त्र अनुसार 27 प्रकार की अग्नि होती है। प्रत्येक कार्य के लिए अलग-अलग अग्नि का प्रयोग होता है। विवाह में जिस अग्नि को प्रज्जवलित किया जाता है उसे योजक कहते हैं जबकि चिता की अग्नि को क्रव्याद कहते हैं। दोनों का गुण-धर्म अलग-अलग होता है। माना जाता है कि योजक अग्नि जोड़ने का कार्य करती है जबकि क्रव्याद अग्
सनातन धर्म का असली मर्म समझो

सनातन धर्म का असली मर्म समझो

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भारतीय संस्कृति की परंपरा रही है कि यहां के तमाम धार्मिक ग्रंथ और संत-परंपरा उपदेश देते आए हैं कि सत्य बोलना चािहए क्योंकि झूइ महापाप है। मगर आज की िवडंबना तो देखिए कि धर्म का चोल पहनकर दूसरों को जो संस्कार, धर्म, मानवता का पाठ पढ़ाते हैं। उसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में आज के तथाकथित बाबा खूब दौलत बटोर रहे हैं। कितनी शर्मनाक बात है ये कि, जो लोग धर्म के ठेकेदार बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे पाप और पाखंड का करोबार फल-फूल रहा है। हमारा धर्म कहता है कि मानव को अनजाने में किए गए पाप का भी फल भोगना पड़ता है। तब जान बूझकर किए गए पापकर्म क्या उसे पतन के मार्ग पर नहीं ले जाएंगे‍‍? क्या कभी उसके पाप दुनिया के सामने नहीं आएंगे। आज सवाल ज़रूर उठता है कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का िवरोध पुरज़ोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के िखलाफ कोई मुहिम या
अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन अयोध्या से राममेश्वरम तक बनवासी राम के पद चिह्न पर

अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन अयोध्या से राममेश्वरम तक बनवासी राम के पद चिह्न पर

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27 नवंबर, 1984 को अयोध्या में श्रीराम विवाह की पुण्यतिथि पर शुरू होकर 8 दिसंबर, 1984 को रामेश्वरम में पूर्ण हुए'' अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन की चर्चा भले ही आम चुनाव के शोरगुल में न सुनाई पड़ी हो या कम सुनाई पड़ी हो, किन्तु वह संस्कृतिक क्षेत्र की विश्व महत्व की घटना थी जो न जाने कितने संत -महात्माओं, श्रीराम भक्तों और रामायण प्रेमयों का स्वपन साकार था। लोकनेत्री प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की आकस्मिक अभाव से उत्पन विपरीत परिस्तिथियों के बावजूद साधनों के अभाव में मात्र भागवद कृपा से संभव हुआ। इस आयोजन के पीछे भले ही विश्व साहित्य संस्कृति संस्थान के महामंत्री के नाते में या मेरे कुछ सहयोगीगण दिखाई पड़ते हों, किन्तु यह वस्तुत: न जाने कितनी समुन्नत आत्माओं की कामना की पूर्ति थी और उससे भी अधिक संसार के कोने-कोने में बड़ी तेजी से प्रसारित और प्रचारित होने वाली श्रीराम चेतना की एक किरण