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संयुक्त राष्ट्र पर सवाल

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प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की प्रासंगिकता और मौजूदा दौर में उसके प्रयासों पर सवाल उठाए हैं। बीते आठ महीनों से दुनिया कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी की गिरफ्त में है, लिहाजा प्रधानमंत्री ने जानना चाहा है कि इस दौरान यूएन कहां था और उसने क्या सार्थक भूमिका निभाई? उन्होंने यह स्वीकार किया कि कहने को तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ है, लेकिन इसे नकार नहीं सकते कि अनेक युद्ध हुए हैं, गृहयुद्ध भी हुए हैं, कितने ही आतंकी हमलों ने खून की नदियां बहाईं। इन युद्धों और हमलों में जो मारे गए, वे भी हमारी तरह इनसान थे। लाखों मासूम बच्चे, जिन्हें दुनिया पर छा जाना था, उन्हें दुनिया छोड़ कर जाना पड़ा। उस समय और आज भी, क्या यूएन के प्रयास पर्याप्त थे? प्रधानमंत्री मोदी ने यूएन की 75वीं सालगिरह के मौके पर अपने संबोधन में ये सवाल उठाए हैं। उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए यूएन महासभा के सामने कुछ सवाल रखे कि क्या प्रासंगिकता के मद्देनजर और मौजूदा हालात की चुनौतियों को देखते हुए यूएन के स्वरूप और ढांचे में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए? दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945 में जब यूएन की स्थापना की गई, भारत तभी से इसका सदस्य है। उस दौर की दुनिया, समस्याएं, चुनौतियां आज से बिलकुल भिन्न थीं, लिहाजा आज यह सवाल सहज और स्वाभाविक नहीं है कि 21वीं सदी की दुनिया में यूएन कितना प्रासंगिक है? दरअसल प्रधानमंत्री मोदी का सवाल था कि भारत यूएन के फैसले लेने वाले ढांचे का हिस्सा आखिर कब बनेगा? कब तक भारत को इंतजार करना पड़ेगा? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। विश्व की करीब 18 फीसदी आबादी भारत में बसती है। भारत समूचे विश्व को अपना परिवार मानता रहा है। इस देश में सैकड़ों बोलियां और विविधताएं हैं। भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व किया है और गुलामी का दौर भी देखा-सहा है। दुनिया के शांति मिशनों में भारत ने अपनी सेनाएं भेजी हैं और कई सैनिक ‘शहीद’ भी हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने 40 करोड़ जन-धन बैंक खातों, 60 करोड़ लोगों को खुले में शौच से मुक्ति दिलाना, 15 करोड़ घरों में पाइप से पेयजल पहुंचाने का अभियान, आयुष्मान भारत और करीब छह लाख गांवों को ब्रॉडबैंड से जोड़ने के प्रयासों आदि को ‘आसान योजनाएं’ नहीं माना जा सकता। भारत अब आत्मनिर्भर होने की दिशा में प्रयासरत है। विश्व स्तर पर सौर गठबंधन, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और योग दिवस भारत की ही उपलब्धियां हैं। सार यह है कि मानव-जाति के हित और कल्याण में हमेशा सोचने और काम करने वाले भारत को यूएन का स्थायी सदस्य आखिर कब बनाया जाएगा? यूएन में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग और समर्थन अमरीका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्टे्रलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका और साउथ कोरिया आदि देश करते रहे हैं, लेकिन यूएन में बदलाव करने की पहल भी नहीं की गई है। हालांकि भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का ‘अस्थायी सदस्य’ चुना गया है। उसका दो साल का कार्यकाल जनवरी, 2021 में शुरू होगा। दरअसल आज भी संयुक्त राष्ट्र के पांच देश ही स्थायी सदस्य हैं-अमरीका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। इन देशों को ही ‘वीटो पॉवर’ हासिल है। यह ऐसा विशेषाधिकार है, जिसके तहत यूएन के महत्त्वपूर्ण फैसलों को भी बदला जा सकता है। यह यूएन की संकीर्णता है, लिहाजा मौजूदा तंत्र को बदला जाना चाहिए। भारत की ताकत को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह विश्व की बड़ी शक्तियां भी महसूस कर रही हैं, लिहाजा अब यूएन के स्तर पर बदलाव को एक निरंतर अभियान बनाना चाहिए। कोरोना के संदर्भ में यह गौरतलब है कि भारत ने करीब 150 देशों को निशुल्क दवाएं मुहैया कराई थीं। प्रधानमंत्री मोदी ने आश्वस्त किया है कि भारत में कोरोना का जो टीका बन रहा है और जिसका तीसरे चरण का परीक्षण जारी है, वह पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध होगा। उसका उत्पादन और भंडारण उसी नजरिए से किया जाएगा। लेकिन बुनियादी विषय और चिंता यूएन से जुड़ी है, जिसकी प्रासंगिकता और प्रतिबद्धता ही सवालिया है।