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सनातनी सोच पर हमले!

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हमारे देश में यह क्या हो रहा है? कौन हैं ये हत्यारे, हमलावर और कौन संरक्षण दे रहा है? यह कैसा राज है? हालांकि पूरे देश को कलंकित करार देना न्यायसंगत नहीं है, लेकिन जो साधु-संतों की हत्याएं कर रहे हैं, जो दुर्दांत बलात्कारी हैं, जो महिला नेताओं पर भी हमलावर हैं और जिन्हें लंबे अंतराल तक कानून के कठघरे तक पहुंचाना संभव नहीं हो रहा है, क्या ऐसे मुखौटाधारी देश को कलंकित नहीं कर रहे हैं? राजस्थान के करौली गांव में एक अधेड़ पुजारी को जिंदा जलाकर मार दिया गया। इनसान इस हद तक भी पहुंच सकता है-बर्बर, क्रूर, पैशाचिक और मानवता-विरोधी! अभी तो करौली ही तपा हुआ है, लेकिन उप्र के गोंडा में एक महंत को गोली मार दी गई। फिलहाल वह अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। कुछ पीछे लौटें, तो महाराष्ट्र के पालघर की दरिंदगी आप नहीं भूले होंगे। भीड़ ने बुजुर्ग साधुओं को लाठियों, डंडों से पीट-पीट कर मार डाला। अभी तक कानून किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है और न ही सीबीआई जांच के आदेश दिए गए हैं। ऐसी ही जघन्य घटना चित्रकूट में हुई थी, जहां ‘बच्चा-चोर’ आरोपित कर साधुओं की हत्या कर दी गई। महाराष्ट्र के ही नांदेड़ में लिंगायत समुदाय के साधुओं का कत्ल किया गया। उप्र के बुलंदशहर में दो साधुओं की हत्या की गई। बहरहाल ये ऐसे हादसे हैं, जो फिलहाल हमारी जानकारी में हैं। भारत जैसे विराट देश के हरेक कोने में कौन, किसे मार रहा है या जानलेवा हमले कर रहा है, उसका एक संगठित यथार्थ हमारे सामने नहीं है, लेकिन एक प्रवृत्ति स्पष्ट है कि मंदिर के पुजारियों, साधु-संतों और महंतों को निशाना बनाकर उन पर हमले किए जा रहे हैं। क्या देश के कुछ हिस्सों में जंगलराज, हत्याराज और अमानुषिक व्यवहार स्थापित हो चुके हैं? क्या ऐसे हमले हिंदू धर्म और सनातनी सोच पर किए जा रहे हैं? क्या यह सब कुछ साजिशाना है? पुजारी और साधु-संत तो देव-स्वरूप होते हैं। वे तो दैवीय शक्तियों की प्रतिमूर्ति होते हैं। वे पूजा-पाठ करने वालों और धर्म के समर्थकों को पत्थर में भी भगवान का एहसास कराने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, लिहाजा जब करौली के पुजारी अंतिम सांसें ले रहे थे, तो उन्होंने स्मरण किया-हे राम! हे भगवान!! हे मेरे मालिक!!! शायद उन्होंने इसे ही अपनी नियति मान लिया था! उन गरीब और अशक्त चेहरों के साथ किसी का क्या विवाद हो सकता है? लेकिन हत्या के लिए भी कोई बहाना तो चाहिए। ऐसे सवालों पर भाजपा कांग्रेस को और कांग्रेस भाजपा को कोसती रहे, एक-दूसरे के मुख्यमंत्रियों को गरियाते रहें, यह राजनीति तो हो सकती है, लेकिन हमारा जो सरोकार है, उस संदर्भ में ऐसी सियासत बेमानी है। यकीनन एक जिंदगी की कीमत 10 लाख या 25 लाख रुपए नहीं आंकी जा सकती। ये तो मुआवजे हैं, सांत्वनाएं हैं, पीडि़त परिवार को दोबारा खड़ा होने में आश्रय मिलता है। सवाल हत्यारों और हमलावरों पर किए जाते रहेंगे कि आखिर हमारा समाज और देश ‘आदिम और जंगली’ क्यों बने रहेंगे? आखिर इनसानी जिंदगी की गारंटी कौन लेगा? यदि कोई भी सरकार ‘अपराधहीन’ समाज को सुनिश्चित नहीं कर सकती, तो कृपया ‘रामराज्य’ के दावे करना छोड़ दें। क्योंकि मौजूदा दौर में हिंदू धर्म और सनातनी सोच बेहद असुरक्षित हैं। बेशक ऐसे अपराधों में मुजरिम पकड़े जाते हैं और उन्हें कानूनी सजा भी सुनाई जाती है, लेकिन जेल से बाहर आकर वे फिर हत्याएं करते हैं। दरअसल यह मानसिक प्रवृत्ति का मामला है। वह कैसे समाप्त होगी, बुनियादी चिंता तो यह है। अभी तक कोई भी सरकार इन मामलों में सफल नहीं रही है, लिहाजा यह समझा जाए कि इन प्रवृत्तियों के साथ ही इनसान को जीना पड़ेगा?