Home Neelam Saxena Chandra बेबसी

बेबसी

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नीलम सक्सेना चंद्रा

मालगाड़ी के उन डब्बों को
धीरे-धीरे पीछे की ओर जाते देख रही थी,
बिलकुल वैसे जैसे वो रेंग रहे हों…
रेंग तो सभी रहा है-
वो मजदूर, जो दो जून का खाना नहीं जुगाड़ पाते,
वो व्यापारी, जिनका व्यापार ठप्प सा पडा है,
देश की अर्थव्यवस्था, जो रुक सी गयी है,
वो डॉक्टर, जो थक गए हैं अब काम करते-करते-
कहीं भी तो किसी को कोई ऐसा स्टेशन आते नहीं दिखता
जहां बेंच पर लेटकर,
कुछ पल को आराम से पैर पसारकर
सुस्ता लें!
कहाँ सोचा था किसी ने कि प्रलय यूँ इस कदर
सारी दुनिया को निष्क्रिय कर देगी?
सब हताश से आसमान की ओर यूँ देख रहे हैं
जैसे कोई मसीहा आएगा और उनको कर देगा रिहा
उनकी सारी मुश्किलों से!
चलो, अच्छा ही है,
आदमी अब भी आकाश की ओर देख रहा है,
उसने बायीं ओर पलटकर अपनी आँख बंद नहीं कर ली-
वरना वो मान ही लेता कि मर चुका है वो
और उसे इंतज़ार भी नहीं रहता कि कोई उसे दफना ही दे
या फिर दे दे आग उसकी चिता को!