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बिन आंगन विकास

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इमारतों के झुंड में जगह की तलाश और खाली जगह को बस इक भवन चाहिए। यह फितरत हिमाचल की हो चुकी है कि कंक्रीट में विकास चुना जाए, जबकि प्रश्न अब भूमि के सही इस्तेमाल से विकास को रेखांकित करने का होगा। भविष्य के लिए जमीन से जुड़ा विकास चाहिए। हिमाचल में टकराव भी यही है कि जमीन उस अनुपात में नहीं बची, जो इनसानों की बस्ती की शर्तें पूरी कर सके। सड़क को चौड़ा, भीड़ को नियंत्रित तथा नागरिक गतिविधियों की जरूरतें पूरा करने के लिए अतिरिक्त भूमि चाहिए। आश्चर्य तो यह कि प्रदेश के पच्चीस फीसदी सरकारी स्कूलों में इमारतें बन गई, लेकिन बच्चों को खेलने के लिए मैदान नहीं। कस्बों ने शहर बनना मंजूर कर लिया, लेकिन इस प्रक्रिया में सांस लेने के लिए जगह कम पड़ गई। हमीरपुर जैसे शहर में एक अदद सामुदायिक मैदान नहीं। पार्किंग के लिहाज से तो प्रदेश का कमोबेश हर शहर बर्बाद है। सबसे बुरे हालात में सोलन का नजारा है, फिर भी तुर्रा यह है कि नगर निगम के दायरे में कहीं विकास नियंत्रित न हो जाए इसलिए इसका विरोध हो रहा है। प्रदेश के 3891 स्कूलों में मैदान का न होना, हमारे विकास के साथ भविष्य के प्रति लापरवाही का सबूत है। यह इसलिए भी कि स्कूलों को स्तरोन्नत करते-करते प्राइमरी से जमा दो की कक्षाएं तो बैठ गईं, लेकिन छात्रों को बंद कमरों में ठूंसने के अलावा क्या मिला। कुछ इसी तरह नए कालेजों की होड़ में स्कूल परिसर ही परवान चढ़ गए और इसका सबसे बड़ा उदाहरण मटौर के स्कूल में महाविद्यालय का प्रवेश देखा जाएगा।
घोषणाओं की चौड़ी छाती ने कई कारण व अनिवार्यताएं ही गौण कर दीं। करीब उनतालीस सौ स्कूलों में खेल मैदानों के न होने का असर वहां मौजूद छात्रों के व्यक्तित्व विकास से जुड़ता है। साथ ही यह सत्य छात्रों के शारीरिक विकास के साथ-साथ स्कूली खेलों के प्रति हिमाचल की असंवेदनशीलता भी है। प्रदेश चौदह सौ के करीब डाक बंगलों के साथ इनके लॉन की हिफाजत करता है और अगर यही सरोकार स्कूली मैदानों के प्रति दिखाया जाए, तो प्रदेश का ढांचा बदल जाएगा। यह मैदान की जरूरत में सामुदायिक व्यवहार की सार्थकता है, लेकिन विडंबना यह भी है कि ग्रामीण परिधि में ही स्कूल खेलों से महरूम हैं। ग्रामीण स्कूलों के मैदान प्रायः सामुदायिक बैठकों, कसरतों, समारोहों तथा खेलों के लिए उपलब्ध होते आ रहे हैं। ऐसे में अगर जनता को स्कूल भवनों पर गर्व महसूस होता है, तो यह सामाजिक तौर पर भी आवश्यक पक्ष है। हर सूरत गांव में स्कूली या सार्वजनिक मैदान की जरूरत रहेगी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह अनिवार्यता है। बेशक हिमाचल में ओपन एयर जिम खोले जा रहे हैं, लेकिन शहरों में खुले स्थान या सामुदायिक मैदान विकसित करने होंगे, ताकि मानवीय गतिविधियों को जगह कम न पड़े। कुछ शहरों को नगर निगमों के आकार में पिरो देने से कोई खास परिवर्तन नहीं आएगा, जबकि यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि कहीं इमारतों के बीच भविष्य के लिए आवश्यक भूमि कम न रह जाए। शहरों को मापती तरक्की ने सरकारी इमारतों की गर्दनें ऊंची कर दी हैं।
ऐसे में अब नई योजनाओं में यह दर्ज करना होगा कि कोई भी सरकारी भवन आबंटित भूमि के पचास फीसदी हिस्से से ज्यादा स्थान न घेरे। इसी परिप्रेक्ष्य में सरकारी स्कूलों की स्थिति व सुविधाओं का विश्लेषण करते हुए यह आवश्यक होगा कि खेल मैदान या खुले स्थान को कम से कम पचास फीसदी भूमि मिले। अब समय आ गया है कि ऐसे सरकारी स्कूलों की पुनर्रचना करते हुए, इन्हें बाजारों व व्यस्त सड़कों से हटाकर ऐसी जगहों पर स्थापित किया जाए, जहां खुले मैदान व शांत माहौल हो। स्कूलों के माध्यम से फिट इंडिया जैसे कार्यक्रमों में निखार आएगा, जबकि व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से भी इसकी आवश्यकता है। हर गांव और शहर की तासीर में ‘फिट इंडिया’ की अधोसरंचना विकसित नहीं की, तो ऐसे कार्यक्रम मात्र ढकोसले साबित होंगे। कोविड-19 ने पुनः जीवन की चिंताओं को शारीरिक हिफाजत व कसरतों से जोड़ा है।
फिर से साइकिलिंग की तरफ बच्चे व युवा आकर्षित हुए हैं, तो उन्हें इस दृष्टि से अधोसरंचना भी चाहिए। प्रकृति व परिवेश के साथ तरक्की की एक कतार नव निर्माण को अहमियत दे रही है, जबकि हिमाचली परिदृश्य में जीवन के अहम पहलुओं के लिए सार्वजनिक भूमि का बेहतर रखरखाव, संरक्षण व इस्तेमाल करना होगा।