Home Articles गांधी के हर आग्रह को मंत्र

गांधी के हर आग्रह को मंत्र

0
-गिरीश पंकज
महात्मा गांधी का पूरा जीवन अगर हम देखें, तो पाते हैं है कि यह एक ऐसे शख्स की जीवन गाथा है जो साधारण से असाधारण व्यक्तित्व की यात्रा पूरी करता है। महात्मा गांधी का प्रारंभिक जीवन किसी भी सामान्य किशोर जैसा ही रहा । नाना कुसंगों में रहकर वे गलत गलत दिशाओं की ओर भी प्रवृत्त होते रहे लेकिन कहीं न कहीं मां के स्नेह संस्कार के कारण वे आत्ममंथन करके सही मार्ग पर चलने की भी कोशिश करते रहे। फिर चाहे वह छिपकर बीड़ी फूंकने की आदत हो या मांस भक्षण। अपनी हर गलत हरकत पर गांधी को आत्मग्लानि हुई और उन्होंने उसे छोड़ने का संकल्प किया, फिर दोबारा उस ओर लौटकर नहीं देखा। साधारण लोग अपने दुर्गुणों से प्रेम करते हुएजीवन भर उसी से चिपके रहते हैं, लेकिन जो लोग असाधारण होते हैं, वे समय रहते अपने दुर्गुणों को पहचान लेते हैं और उस से मुक्त होकर असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी बन जाते हैं। जैसे गांधी।
महात्मा गांधी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग को पढ़ते हुए कोई भी अभिभूत हो सकता है कि एक व्यक्ति अपने जीवन के तमाम दुर्गुणों के बारे में सबको बता देना चाहता है ताकि भावी पीढ़ी उससे बच सके। गांधी अनेक दुर्गुणों से बच सके इसीलिए वे अपने जीवन को बेहतर ढंग से रच सके। गांधी जी का चिंतन बहुत कुछ उनका अपना मौलिक नहीं था । उन्होंने अपनी परंपरा से, अपने सनातनी संस्कारों से जो कुछ ग्रहण किया, उसे उन्होंने प्रस्तुत करने की कोशिश की। फिर चाहे वह सत्य हिंसा का मामला हो , ब्रह्मचर्य का हो , अस्तेय हो, स्वच्छता हो अथवा अपरिग्रह आदि । कहीं उन्होंने बुद्ध से प्रेरणा ली तो कहीं उन्होंने भगवान महावीर के चिंतन को आत्मसात किया। नरसी मेहता का भजन तो उनके जीवन का भजन उनके जीवन का स्थायी भजन बन गया, ”वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे”।
चिन्तन नहीं, मन्त्र
गांधी जी का चिंतन हम एक मंत्र की तरह लगता है। उन्होंने जितनी भी बातें हमें बताई,उन पर अमल करके न केवल व्यक्ति वरन राष्ट्र भी सफलता के शिखर तक पहुंच सकता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसा कुछ हो नहीं पाया। गांधी ने देश की आजादी की लड़ाई भर नहीं लड़ी, वह मनुष्य के नव निर्माण की लड़ाई भी लड़ रहे थे। उनके दिमाग में स्वतंत्र भारत का एक खाका विद्यमान था कि आजादी के बाद उनका देश कैसा होगा। गांधी अपने जीवन के प्रयोगों से भी अपनी बातें सिद्ध कर रहे थे। फिर चाहे वह पत्रकारिता हो, ग्राम सुधार हो या सामाजिक आंदोलन। हर कहीं गांधी का गांधीपन दिखाई देता था। वे जब स्त्री मुक्ति की बात करते थे तो सिर्फ उनके लिए यह जुमला नहीं था, उन्होंने ऐसा करके दिखाया। उस दौर में जबकि स्त्रियों पर तरह-तरह के बंधन लगे रहते थे, तब गांधी जी की प्रेरणा से हजारो स्त्रियां अंग्रेजों के विरुद्ध सड़कों पर उतर कर संघर्ष कर रही थी। उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी भी धीरे-धीरे गांधीमय हो गई थी। उनके व्यक्तित्व के कारण भी अनेक महिलाएं घरों से निकलकर समाज सुधार की दिशा में काम करने लगी थी।
न डरो और न डराओ
गांधी जी ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध निर्भय होकर आंदोलन किया और अहिंसा के शाश्वत सत्य को स्थापित करने की कोशिश की। यह कितनी बड़ी बात है कि गांधीजी के कहने पर लोग लाठियां झेलते रहे लेकिन किसी ने भी पलट कर हमला नहीं किया । यह कायरता नहीं थी। यह निर्भीक व्यक्ति की अहिंसा का प्रमाण था, जिसके आगे आखिरकार गोरी सत्ता को झुकना पड़ा। गांधी ने अहिंसा, सत्य, आस्वाद, अस्तेय (चोरी न करना) अपरिग्रह( संचय न करना) ,ब्रम्हचर्य , अभय, अस्पृश्यता निवारण, जात-मेहनत,सर्वधर्म सद्भाव, और स्वदेशी जैसे अमर मंत्र हमें दिए। उस मंत्र को जीवन में आत्मसात करके कोई भी मानव महामानव बन सकता है। कोई भी साधारण व्यक्ति असाधारण व्यक्तित्व का धनी बन सकता है। जैसा महात्मा गांधी बने। अपने अस्तेय मंत्र को उन्होंने और व्याख्यायित करके समझाने की कोशिश की कि अस्तेय का मतलब सिर्फ चोरी करना नहीं है। अगर मन में किसी चीज को पाने का भाव भी जाग्रत होता है, तो यह भी चोरी का एक प्रकार है । अपने मंत्र अभय में वे कहते हैं कि हमें भयमुक्त रहना है। लेकिन सिर्फ भय मुक्त नहीं रहना है। हमें दूसरों को भी निर्भीक बनाए रखना है। संक्षेप में कहें तो ‘न डरो ना डराओ’ की नीति पर चलना है। उनका जात- मेहनत का मंत्र भी मुझे क्या सब को प्रभावित करता है, जिसमें वे कहते हैं कि रोटी के लिए हमें मेहनत करनी चाहिए । मेहनत करके ही खाना चाहिए। फिर उन्होंने गीता का हवाला देते हुए कहा उस कथन को याद किया कि यज्ञ किए बिना जो खाता है वह चोरी है। गांधी ने यज्ञ की जगह जात- मेहनत को रखा।
ब्रह्मचर्य पर भी गांधीजी ने भरपूर जोर दिया ।और सबसे अच्छी बात है कि उनकी धर्मपत्नी बा ने भी भी गांधी जी की भावना का सम्मान करते हुए ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया। गांधी कहते हैं कि तमाम विषय वासनाओं पर काबू प्राप्त करना ही ब्रम्हचर्य है । केवल इंद्रियों के विकारों पर और रोक ब्रह्मचर्य नहीं है। ब्रह्मचर्य का मतलब है, ब्रह्म अर्थात सत्य की खोज में चर्या करना। सिर्फ दैहिक वासना पर नियंत्रण नहीं, भौतिक वासनाओं पर भी काबू करना ब्रम्हचर्य कहलायेगा। भौतिक वासना के वशीभूत होकर ही साधारण लोग संग्रह करने की प्रवृत्ति से ग्रस्त हो जाते हैं इसलिए गांधी ने अपरिग्रह का मंत्र दिया। जितनी हमारी जरूरत है, उतना ही हम संचय करें। उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं। मगर आज यह व्यावहारिक रूप में संभव नहीं दिखता। संचय की लालसा व्यक्ति को तरह-तरह के आर्थिक अपराध करने पर विवश कर देती है।
गांधी ने जीवन में नम्रता को भी एक मंत्र कहा। वे कहते थे कि हमें परमार्थ करना है, खूब मेहनत करें और उसके कारण खूब धन वैभव भी आ जाय तो भी हम विनम्रता न छोड़ें। सदैव विनयशील बने रहें। गांधी ने यह महसूस किया था कि किंचित आर्थिक समृद्धि आने के कारण कुछ लोग समाज से कट जाते हैं । गुरूर में आ जाते हैं। पैसे की अकड़ आ जाती है। यही सब बुराई देखकर गांधी ने नम्रता का मंत्र दिया कि हमारे पास पुरुषार्थ तो हो मगर विनम्रता भी आ जाय तो वह मानव महामानव किस श्रेणी में रखा जा सकता है। यही कारण है कि गांधी की सोहबत में रहने वाले उस वक्त के कुछ अरबपति पूरी विनम्रता के साथ गांधी जी से मिलते थे और जी खोलकर गांधी आश्रम को और उनके विभिन्न प्रकल्पों को आर्थिक मदद भी किया करते थे। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ नाथ ठाकुर ( टैगोर) को भी गांधी समय पर हजारों रुपये की मदद भेजा करते थे क्योंकि वे भी पश्चिम बंगाल में शांतिनिकेतन जैसा महान प्रकल्प तैयार कर रहे थे।
अहिंसा और सत्याग्रह
गांधीजी का सबसे सफल मंत्र साबित हुआ सत्याग्रह और अहिंसा। इसी रास्ते पर देश का लोकतांत्रिक समाज चल रहा है। यह और बात है कि हमारा तथाकथित सिस्टम गांधी के रास्ते से भटक गया है। वह पुलिस जो अंग्रेजो के समय प्रदर्शनकारियों पर अत्याचार करती थी, आज भी शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वाले नागरिकों पर अत्याचार करती है । प्रदर्शनकारी भीड़ को कुचलने के लिए आज भी डंडों और गोलियों का सहारा दिया जाता है। यह लोकतंत्र की बहुत बड़ी विफलता है कि अपने ही जन को कुचलने के लिए लाठी और गन का सहारा लिया जाय। दमन की यह प्रवृत्ति, यह हरकत गांधी दर्शन का अपमान है। जिस राष्ट्र ने गांधी को राष्ट्रपिता कहा, महात्मा माना, उसी गांधी के वचनों पर यह देश नही चल पा रहा। आए दिन होने वाले विभिन्न आंदोलनों को कुचलने की शर्मनाक कोशिशें होती रहती है। आज अगर गांधी जीवित होते तो पुलिस के इस विद्रूप चेहरे को देखकर आमरण अनशन पर ही बैठ जाते। गांधी जी के बारे में अंतिम वायसराय माउंटबेटन ने कहा था कि ”गांधी का जीवन इस दुनिया को शांति और अहिंसा के माध्यम से अपना बचाव करने की राह दिखाता रहेगा”। आज पूरी दुनिया में गांधी के सत्याग्रह को आत्मसात करके लोग आंदोलन करते हैं। हालांकि वहां भी दमन चक्र चलता है लेकिन अपने देश में कुछ ज्यादा ही हिंसक तरीके से सत्याग्रह को कुचलने की कोशिश की जाती है।
गांधी ने अपनी महान कृति ‘हिंद स्वराज’ में पाठक और संपादक की वार्तालाप शैली में जो विचार व्यक्त किए हैं वह एक सौ ग्यारह साल बाद भी तरोताजा बने हुए हैं। इस पुस्तक में गांधी पाठक भी है और संपादक के रूप में सवालों के जवाब भी दे रहे हैं। एक जगह पाठक सवाल करता है, ” आप जो कहते हैं, उस पर से मुझे लगता है सत्याग्रह कमजोर आदमियों के लिए काफी काम का है। लेकिन जब वे बलवान बन जाएं, तब तो उन्हें तोप ( हथियार) ही चलाना चाहिए ।” इस पर संपादक बने गांधी खूबसूरत उत्तर देते हैं कि ”यह तो आपने बड़े अज्ञान की बात कही। सत्याग्रह सबसे बड़ा सर्वोपरि बल है। वह जब तोप बल से ज्यादा काम करता है, तो फिर कमजोरों का हथियार कैसे माना जाएगा ? सत्याग्रह के लिए जो हिम्मत और बहादुरी चाहिए, वह तोप का बल रखने वाले के पास हो ही नहीं सकती। क्या आप यह मानते हैं कि डरपोक और कमजोर आदमी नापसंद कानून को तोड़ सकेगा? ‘ एक्सट्रीमिस्ट’ तपोबल पशु बल के हिमायती हैं। वे क्यों कानून को मानने की बात कर रहे हैं ? मैं उनका दोष नहीं निकालता। वे दूसरी कोई बात कर ही नहीं सकते। वे जब अंग्रेजों को मारकर राज करेंगे, तब आप से और हम से (जबरन) कानून बनवाना चाहेंगे । उनके तरीके के लिए यही कहना ठीक है। लेकिन सत्याग्रही तो कहेगा कि जो कानून उसे पसंद नहीं है उन्हें वह स्वीकार नहीं करेगा, फिर चाहे उसे तोप के मुंह पर बांधकर उसकी धज्जियां उड़ा दी जाएं”। तो गांधी सत्याग्रह को इस तरह से एक गरिमा प्रदान करते हैं। कोई भी सत्याग्रही सत्य के रास्ते पर चलेगा। सत्य के लिए जीएगा, सत्य के लिए मरेगा।
आज भी जो आंदोलन होते हैं, वे सत्याग्रह की परंपरा के आंदोलन हैं, लेकिन उसे तोड़ने के लिए जब लाठी या गोली चलती है, तो तो यह दरअसल महात्मा गांधी के ही सीने को छलनी करती नजर आती है। इसलिए लोकतांत्रिक सरकारों का दायित्व है कि वह शांतिपूर्ण तरीके से होने वाले किसी भी आंदोलन का दमन न करें । मैं तो यह बात भी कहता हूं कि अगर प्रदर्शनकारी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या संसद भवन का घेराव करने भी जा रहे हैं, तो उन्हें दरवाजे तक जाने देना चाहिए । यही गांधीवाद है कि जो विरोध हो रहा है , उसका भी सम्मान किया जाए। लेकिन देखा यह गया है कि प्रदर्शनकारियों को बीच में ही कहीं रोक दिया जाता है ।
और जब भीड़ उत्तेजित होती है, तब यह कहा जाता है कि वह उत्तेजित हो गई थी इसलिए हमें मजबूरन लाठी चलानी पड़ी या गोली चलानी पड़ी। आखिर यह नौबत आती ही क्यों है? क्यों नहीं जन भावनाओं का सम्मान करके उन्हें आंदोलन करने दिया जाता है । आंदोलन करने वाले आकाश से उतरे हुए खलनायक नहीं होते। वे इसी लोक के निवासी होते हैं जिनके अपने कुछ मुद्दे होते हैं। और वे मुद्दे जेनुइन भी होते हैं । जब उनकी बात नहीं मानी जाती, तभी आंदोलन करने पर मजबूर होते हैं । लोकतंत्र चलाने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर है, उनका दायित्व है कि वे जन भावनाओं का सम्मान करें और उनकी समस्याओं का तत्काल निराकरण करने की कोशिश करें ताकि आंदोलन ज्यादा न खिंचे। लेकिन देखा गया है कि लोग निरन्तर आंदोलन करते रहते हैं और व्यवस्था के कानों में जूं तक नहीं रहती। यही कारण है कि अंततः शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसक हो जाते हैं। इसलिए मेरा अपना कहना है कि गांधी के हर आग्रह को हम मंत्र की तरह आत्मसात करें। अगर ऐसा कर सकें तो कानून व्यवस्था भी सुचारू ढंग से चलती रहेगी और जनता को मिले सत्याग्रह के बुनियादी अधिकार का आदर भी होगा। और यही है गांधी का सच्चा लोकतंत्र और रामराज्य भी, जिसमें अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है।