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चरखा – गांधी की अहिंसक क्रांति का अस्त्र

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योगेश डाबरा

मार्को पोलो दुनिया का पहला आदमी था, जिसने पूरी दुनिया का चक्कर लगाया था, जिसमें उसे 24 साल (1271 से 1295) लगे थे. वापिसी में, भारत में वो मद्रास और केरल के तटीय इलाकों में भी रुका था. अपने संस्मरणों में उसने बहुत सी बातों का जिक्र किया है, जिसमें चरखे और खादी का भी उल्लेख है.
सन 1500 में भारत में चरखा और हथकरघा उद्योग पूरी तरह विकसित अवस्था में था. इतिहास में यह दर्ज है कि सन 1702 में, औरंगजेब के शासन काल में, 10,53,725 ब्रिटिश पाउन्ड की खादी का निर्यात हुआ था. उस समय चरखा, हथकरघा और कृषि हमारी अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी थे. उस समय भारत संसार का पहले नंबर का कपड़ा निर्माता था.
अंग्रेजों का राज आया, मशीनीकरण का युग शुरू हो चुका था, उन्हें कपड़ा बनाने के लिए कच्चा माल चाहिए था, तो वे जबरदस्ती कच्चा माल कोड़ियों के भाव भारतीय किसानों से लेकर इंग्लैंड भेजने लगे और मशीन से बुना कपड़ा बहुत महंगे दामों में भारत में बेचना शुरू कर दिया. किसानों और आम आदमी की आमदनी कम हो गई और खर्च बढ़ गए और इस तरह आई गरीबी की वजह से साथ में तरह तरह की तकलीफें भी बढ़ गई.
1857 की पहली स्वतन्त्रता की लड़ाई में हम पहले चरण में जीत कर भी, हार गए थे, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण था – आपसी समन्वय की कमी. गांधी जी के आगमन से पहले कुछ पढ़े लिखे लोग, जिनमें बैरिस्टर अधिक थे, कुछ राष्ट्र वादी नेता, उनके समर्थक और कुछ जुनूंनी जाबांज युवक ही प्रमुखता से आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे. आम आदमी को तो अपनी रोजी रोटी की चिंता प्रमुख थी. एक अनुमान के अनुसार जो भारतीय अंग्रेजो से पूर्ण कालिक रूप से लोहा ले रहे थे, वो लाखों में ही थे.
एक और अनुमान के मुताबिक उस समय भारत की आबादी 25 करोड़ के आसपास थी. इसमें 8 करोड़ तो महिलाएं होंगी. गांधी जी ने चरखे के एक स्ट्रोक से धीरे-धीरे बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ दिया. जिससे :-
* परिवार का कपड़ों पर खर्च बंद हो गया.
* बहुत सी महिलाएं खर्च करने के विपरीत चरखे के माध्यम से पैसे कमाने लगी.
* महिलाओं का आत्मसम्मान बढ़ गया क्योंकि उनका भी घर चलाने में वित्तीय योगदान शुरू हो गया.
* जब सूत जमा करवाने महिलाएं खद्दर भंडार जाती तो आपस में बात करती इसलिए उनमें आपस में ग़ज़ब की बॉन्डिंग हो गई. देश के प्रति सेवा और बलिदान देने के लिए उनमें भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई और वो बैठकों आदि में जाने लगी.
* परिवार के बच्चे भी अब मां, बुआ, बड़ी बहन और दादी की मदद करने लगे और उनके मन में भी देश प्रेम की ज्वाला के बीज बचपन में ही बो दिए गए.
*चरखा कातना एक गर्व का विषय हो गया. अमीर घर की महिलाएं भी चरखा कातने लगी. अमीरी गरीबी का अंतर भी धीरे धीरे काफी कम हो गया.
* जब किसी देश की महिलाएं स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ जाएं तो लगभग सारा परिवार ही उससे जुड़ जाता है, इससे घर के पुरुष सदस्यों को भी हौंसला, बल और प्रेरणा मिलती है.
*इंग्लैंड की कपड़ा मिलें कुछ बंद हो गई, कुछ बंद होने की कगार पर आ गई. वहां कपड़ा मिलों के कामगारों में बड़े पैमाने पर असंतोष फैल गया.
इस तरह भारत की 25 करोड़ आबादी में, एक विवादास्पद अनुमान के अनुसार, 15 करोड़ तो परोक्ष और अपरोक्ष रूप में चरखे से जुड़ने की वज़ह से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे. कहाँ कुछ लाख, कहाँ करोड़ों आम इंसान, पढ़े लिखों और अमीरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी के यज्ञ में अपनी आहुति डालने को इकठ्ठे हो गए.
इस तरह गांधी जी ने चरखे को अंग्रेजों की राक्षसी और अधार्मिक शक्ति के खिलाफ दैवीय अस्त्र के रूप में प्रयोग किया और इस विविधतापूर्ण देश में, विभिन्न व्यक्तित्व, विभिन्न परिवेश, विभिन्न प्रदेश, विभिन्न सोच वाले व्यक्तियों को एक माला में पिरो दिया. इस तरह भारतीयों ने चरखे से सूत नहीं, देश की स्वतंत्रता का परिधान बुना. भारत माता के शरीर को ज़ख्म देती कांटों की विदेशी पोशाक को उतारकर खुद्दारी और स्वाभिमान की नैसर्गिक खद्दर को चुना. इस तरह चरखा आजादी के आंदोलन में गांधी की अहिंसक क्रांति का बेहद प्रभावशाली अस्त्र बन गया।