Home Articles अमरीकी चुनाव में गृहयुद्ध !

अमरीकी चुनाव में गृहयुद्ध !

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आज तीन नवंबर को अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव होना है। मतदान की अधिकृत तिथि से पहले ही करोड़ों अमरीकी ई-मेल या डाक के जरिए अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुके हैं। करीब एक वर्ष पहले वाशिंगटन से हमारे भारतीय मित्र दिल्ली आए थे। अब वह पूरी तरह अमरीकी नागरिक हैं और लंबा-चौड़ा व्यापार चलाते हैं, लिहाजा सत्ता और सियासत के गलियारों तक उनकी धमक है। तब हमने भावी राष्ट्रपति के बारे में पूछा, तो उनका साफ जवाब था-‘ट्रम्‍प्‌ का कोई विकल्प ही दिखाई नहीं देता।’ जाहिर है कि उस आकलन के आधार पर राष्ट्रपति ट्रम्‍प्‌ को एक और कार्यकाल मिलना चाहिए था, लेकिन कोरोना वायरस और उसके नतीजतन अर्थव्यवस्था के ढहने से हालात और आसार ऐसे बदले कि अब आकलन ट्रम्‍प्‌ के पक्ष में बहुत कम हैं। बेशक अमरीका में बदलाव की हवाएं महसूस की जा सकती हैं, लेकिन बहुत कुछ अप्रत्याशित और अनिष्ट की आवाजें भी, मीडिया के जरिए, सुनाई दे रही हैं। अमरीकी चुनाव हिंसक और गृहयुद्ध के आसार वाला भी हो सकता है! दुनिया के सबसे पुराने और सशक्त लोकतंत्र के संदर्भ में ऐसे आकलन अजीब लगते हैं और डराते भी हैं, क्योंकि किसी भी लोकतंत्र पर हिंसा नहीं मंडरानी चाहिए। राष्ट्रपति ट्रम्‍प्‌ तक से ऐसे सवाल पूछे गए कि क्या सत्ता का हस्तांतरण लोकतांत्रिक ढंग से, सहज तौर पर, हो जाएगा? उन्होंने कभी भी इसका सटीक जवाब नहीं दिया, बल्कि ‘फर्जी मतदान’ का दावा करते रहे। चुनाव के हिंसक होने की चिंता इन तथ्यों से होती है कि अमरीका में बंदूक, पिस्टल या रिवॉल्वर खरीदने की होड़ मची है। करीब 40 फीसदी खरीददार ऐसे सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए बंदूक या पिस्टल खरीदी हैं। बीते साल की तुलना में भी ऐसे खरीददार बढ़े हैं। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की है कि यदि वह अमरीका के राष्ट्रपति चुने गए, तो ऐसे हमलावर हथियारों पर पाबंदी लगाएंगे। अमरीका की फिजाओं में तनाव ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ (अश्वेत जिंदगी भी मायने रखती है) आंदोलन के कारण है। अमरीका का बड़ा हिस्सा ‘श्वेत बनाम अश्वेत’ में विभाजित हो गया है। अमरीका में पहले भी यह सामाजिक विभाजन बहुत प्रबल रहा है। बहरहाल इस आंदोलन के समानांतर असंख्य लोगों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जिनके हाथों में टं्रप की रिपब्लिकन पार्टी का झंडा है। स्पष्ट है कि वे कौन हैं? दो विरोधी और हिंसक विचारधाराओं के बीच हालात क्या बन जाएं, इन आशंकाओं के मद्देनजर ही लोग हथियार खरीद रहे हैं। अमरीका में बीते साल से अब तक सामाजिक बेचैनी बढ़ी है, बुनियादी मूल्यों पर सवाल किए गए हैं और कोरोना महामारी अब भी बहुत तेजी से फैल रही है, लिहाजा इन परिस्थितियों में आपसी तनाव और भी बढ़ सकता है। यहां तक के विश्लेषण मीडिया में छपे हैं कि गृहयुद्ध तक की नौबत आ सकती है। अमरीका का जनादेश 3-4 नवंबर को घोषित हो जाना चाहिए। उसमें भी अराजकता की आशंकाएं जताई जा रही हैं। क्या यह दुनिया के सबसे पुराने और ताकतवर लोकतंत्र की भी ‘अग्निपरीक्षा’ का दौर है? भारत के संदर्भ में अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव बेहद महत्त्वपूर्ण है। हम राष्ट्रपति ट्रंप का कार्यकाल देख चुके हैं, लिहाजा उनकी नीयत, नीति और कूटनीति से अच्छी तरह अवगत हैं। भारत और अमरीका दुनिया के सबसे अंतरंग और सशक्त, भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारों में हैं। भारत अमरीकी हथियारों और विमानों का सबसे बड़ा खरीददार है। दोनों देशों ने आपस में 2019 में 146 अरब डॉलर से अधिक का कारोबार किया। कोई भी राष्ट्रपति बने, वह भारत के अंतरराष्ट्रीय सरोकारों की अनदेखी नहीं कर सकता। वैश्विक समीकरण भी ऐसे बन गए हैं। अमरीका को चीन के विरोध में भारत सरीखा सहयोगी देश भी चाहिए और समंदर में उसकी मदद भी चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भी भारत और अमरीका साथ-साथ हैं। पाकिस्तान के खिलाफ भारत को अमरीका के समर्थन की दरकार रहती ही है।