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गांधी और वैज्ञानिकता

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-आर.के.पालीवाल
महात्मा गांधी ने विज्ञान की उच्च शिक्षा नहीं ली थी लेकिन उनके जीवन में विज्ञान के कई पहलुओं का साफ असर दिखाई देता है। यह अकारण नहीं है कि गांधी ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक “सत्य के प्रयोग” रखा है। प्रयोग और विज्ञान का चोली दामन का साथ होता है। गांधी और दूसरे वैज्ञानिकों में अंतर सिर्फ इतना है कि वैज्ञानिक विज्ञान सम्बन्धी किसी खास विषय की जड़ तक पहुंचने के लिए प्रयोग करते हैं जिससे उस विषय को समझने में मदद मिले जबकि गांधी मानवता को समग्रता में समझने के लिए विविध विषयों के प्रयोग कर रहे थे।
गांधी ने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में बहुत से प्रयोग किए थे जिनमें राजनीति, समाज और आध्यात्मिकता आदि विषय शामिल थे। दूसरी तरह से कहें तो गांधी की वैज्ञानिकता बहुत व्यापक थी। वह भौतिक विज्ञान, रसायन या जीव विज्ञान के प्रयोगों की तरह किसी खास विषय तक सीमित नहीं थी।
वैसे तो गांधी ने अपने जीवन में विभिन्न प्रयोग किए थे जिनमें राजनीति में धर्म, सत्य और अहिंसा के प्रयोग से लेकर निजी जीवन में ब्रह्मचर्य के प्रयोग और भोजन से लेकर, किसान जीवन और प्राकृतिक चिकित्सा तक के प्रयोग शामिल थे। इन प्रयोगों की यह भी खासियत थी कि गांधी सबसे पहले ऐसे प्रयोग खुद पर, अपने परिजनों और आश्रम में साथ रहने वाले लोगों पर करते थे और जब उन्हें यह अहसास हो जाता था कि अमुक प्रयोग से जीवन के किसी पहलू में लाभ हो रहा है तब उन्हें वे अपने लेखों और प्रार्थना सभा के समय वार्ता करते हुए जन समूह के साथ भी साझा करते थे जिससे सब लोगों तक उनका लाभ पहुंच सके।
गांधी ने सत्याग्रह को भी एक प्रयोग की तरह ही शुरू किया था। सबसे पहले उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ इस अस्त्र का प्रयोग किया था जिसे बाद में बहुत बड़े पैमाने पर स्थानीय स्तर पर किए चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह से लेकर राष्ट्रीय फलक के असहयोग आंदोलन और अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन तक लगातार मांझा था।
सामान्यतः यह भी एक धारणा है कि गांधी आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के खिलाफ थे। इसका एक बड़ा उदाहरण यह भी दिया जाता है कि उन्होंने “हिंद स्वराज” पुस्तक में रेल के विरोध में लिखा है और कस्तूरबा गांधी के ईलाज के लिए पेंसिलिन के इंजेक्शन के प्रयोग के लिए अपनी सहमति नहीं दी थी आदि आदि। यह सच है कि गांधी भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में बड़ी औधोगिक मशीनों की जगह आम जनता को रोजगार उपलब्ध कराने वाले हथकरघा आदि श्रम आधारित लघु ग्रामोद्योग की वकालत करते थे। गांधी की इस सोच के पीछे विज्ञान या वैज्ञानिकता का विरोध नहीं था अपितु वे हर हाथ के लिए काम चाहते थे जिससे समता मूलक समाज का निर्माण हो सके। उन्होंने मनुष्य के भारी श्रम में सहायता करने वाली सिलाई मशीन आदि की वकालत भी की थी इसलिए उन्हें मशीन विरोधी कहना उचित नहीं है।
गांधी के जीवन दर्शन पर गौर करें तो हम पाते हैं कि उन्होंने जन जीवन के लगभग हर पहलू पर प्रयोग किए हैं। शिक्षा के बारे में भी गांधी ने नई तालीम की वकालत की थी जिसमें बच्चों को उनकी सहज समझ में आने वाली मातृ भाषा में शिक्षा का प्रावधान था क्योंकि गांधी ने महसूस किया था कि शुरुआत में अंग्रेजी की पढ़ाई भारतीय बच्चों पर भारी पड़ती है और स्कूल कालिजों की सामान्य शिक्षा उनमें रोजगार का हुनर पैदा करने में अक्षम है।
अध्यात्म के क्षेत्र में भी गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा के माध्यम से सर्व धर्म समभाव बढ़ाने के लिए लगभग हर धर्म की पवित्र कृतियों यथा गीता और रामायण के साथ साथ बाईबल, कुरआन और जैन एवं बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथों के महत्वपूर्ण श्लोक आदि भी शामिल किए थे।
गांधी के जीवन को गहराई से देखने पर यह सहज आभास होता है कि वे जिस तरह एक साथ भारत की आजादी के राजनैतिक आंदोलन के साथ साथ सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक क्षेत्र के रचनात्मक कार्यों को भी आगे बढ़ा रहे थे, उसी तरह वे एक साथ व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में नए नए प्रयोग भी कर रहे थे जिससे समग्रता में मानवता का समुचित विकास हो सके। ऐसे में गांधी को विज्ञान विरोधी कहना सर्वथा अनुचित और बचकाना लगता है। गांधी को हम हरफनमौला वैज्ञानिक जरूर कह सकते हैं जिनकी व्यापक जीवन दृष्टि के प्रयोगों की जद में पूरी मानवता थी। इस लिहाज से गांधी समग्र जीवन के वैज्ञानिक हैं।