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हमारे समय में गांधी

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-गिरीश पंकज
वैसे तो इस देश में अनेक महापुरुष पैदा हुए हैं। लेकिन समय बीतने के साथ उनमें अधिकतर लोग कहीं न कहीं गुम हो जाते हैं। जब कभी अचानक उनकी जरूरत पड़ती है, तो उन्हें खंगाल कर हम निकालते हैं और धो पोंछ उनकी तस्वीरें निकाल कर जयंती या पुण्यतिथि मना लेते हैं। इस तरह अपने कर्तव्य की इतिश्री भी कर लेते हैं। लेकिन मुझे लगता है गांधी ही ऐसे इकलौते शख्स हैं जो कभी गुम नहीं हुए। वह हर घड़ी, हर समय हमारे साथ रहते हैं। मैं व्यंग्य भी लिखता हूं इसलिए उस शैली में कहूँ तो ऐसा कोई शख्स नहीं होगा जिसकी जेब में गांधी न पड़े हों। हमने गांधी को अपने साथ रखने का एक अच्छा जतन कर लिया है । उनको नोटों पर छाप दिया है। अब तो अनेक ऐसे लोग भी हैं जो दावे के साथ कहते हैं कि मैं गांधी के रास्ते पर चल रहा हूं। कुछ लोग रोज गांधी मार्ग पर चलते, क्योंकि उनका घर ही गांधी मार्ग पर अवस्थित है । यह और बात है कि वे उसे महात्मा गांधी मार्ग न कहकर एमजी रोड कह देते हैं। तो गांधी के साथ हमारा इस तरह का भी रिश्ता कायम है।  मित्रो, गांधी के बगैर हमारी मुक्ति नहीं। अगर आप हम एक महान समाज और महान भारत बनाना चाहते हैं, तो गांधी के साथ ही चलना होगा। गांधी के स्वराज्य को समझना होगा । गांधी के रामराज्य को समझना होगा। गांधीजी आजादी की लड़ाई ही नहीं लड़ रहे थे। उस दौर में वे भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत भी थे। उनका लक्ष्य केवल भारत को आजाद कराना ही नहीं था, वरन आजाद भारत की कैसी सुंदर तस्वीर बनेगी, इसकी चिंता भी कर रहे थे। यही कारण था कि गांधी जी ने केवल एक विषय का संस्पर्श नहीं किया, वरन अनेक विषयों पर वे लगातार काम करते रहे । जैसे उन्होंने सत्य के प्रयोग किए, अपनी आत्मकथा लिखी, उसी तरह के कदम कदम पर नये भारत के निर्माण का वह प्रयोग कर रहे थे। अपने कर्म से वे उन लोगों को निरंतर संदेश दे रहे थे। अपने अखबार ‘यंग इंडिया’हो चाहे ‘हरिजन’ उस के माध्यम से वे समय-समय पर जो लेख लिखा करते थे, उन लेखों को हम अगर ध्यान से देखें, तो वे आज भी तरोताजा हैं। उनकी स्थापनाएं बासी नहीं पड़ी। विचारोत्तेजक लगती हैं। उनको पढ़कर यही महसूस होता है कि अगर हम उन सब को आत्मसात करके एक सामाजिक ढांचा बनाएं तो हम आदर्श राम राज्य की स्थापना कर सकते हैं। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो रहा है क्योंकि एक घिसा पिटा जुमला है कि हम गांधी ‘को’ तो मानते हैं, ‘गांधी’ की नहीं मानते। जिस दिन हम गांधी की माने लेने लगेंगे, तब हमारे गांव हरे-भरे भरे हो जाएंगे। खुशहाल हो जाएंगे। गंदगी से मुक्त हो जाएंगे। किसान आत्महत्या नहीं करेंगे। पुलिस का अत्याचार खत्म हो जाएगा। अँगरेज़ी और अंग्रेज़ियत से हम मुक्त हो कर हम अपनी राष्ट्रभाषा को स्थापित कर सकेंगे। हमारी पत्रकारिता नैतिक पत्रकारिता हो जाएगी। हम स्त्री का सम्मान करने लगेंगे । बलात्कार की घटनाएं लगभग खत्म हो जाएंगी ।और हमारे राजनेता जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं, वे भी पाक साफ हो जाएंगे। छुआछूत, जात पात, धर्म के झगड़े : सब खत्म हो जाएंगे, लेकिन यह सब अब हमें एक यूटोपिया लगता है , क्योंकि आजादी के सात दशकों बाद हमने राजनीति की जो पीढ़ी तैयार की है, वह पीढ़ी गांधी का नाम तो लेती है, राजघाट पर जाकर उन्हें प्रणाम तो करती है, लेकिन गांधी उनकी आत्मा का हिस्सा नहीं बन पाता। गांधी उनकी जेब में रुपये पर छपे चित्र के रूप में पड़ा तो रहता है, मगर आचरण में उतर नहीं पाता। मैंने कभी लिखा था, आदर्श केवल उद्धरण में  आ सका न आचरण में।  जब तक आदर्शवाद जुमला बना रहेगा,तब तक हम गांधी से दूर ही रहेंगे । अगर हम अपने इस समय को गांधीमय करना चाहते हैं, तो उनके बताए फार्मूले पर चलना ही पड़ेगा। गांधी का हर फार्मूला बहुत सरल है मगर इच्छाशक्ति के अभाव में वह सफल नहीं हो पाता। 
भाषा का सवाल
जैसे भाषा के सवाल को ही ले लें। गांधीजी की मातृभाषा गुजराती थी, लेकिन उन्होंने हिंदी के महत्व को समझा। वह जान गए थे कि इस देश की आत्मा हिंदी में बसती है। इसलिए उनके ज्यादातर भाषण हिन्दी में ही होते थे। वह बहुत अच्छी अंग्रेजी जानते थे। दूसरी भाषाएं भी उन्हें पता थीं, लेकिन जहां कहीं भी जाते थे हिंदी में ही उद्बोधन देते थे । और बार बार इस बात को कहते थे कि देश जब आजाद होगा, तो इस देश की मुख्य राष्ट्रभाषा हिंदी ही होगी। हिंदी के मामले में उन्होंने अपने आचरण के विपरीत जाकर बात कही थी कि इस देश में ”अगर हिंदी लागू करने के लिए मुझे तानाशाह भी बनना पड़े ,तो मैं बनने से हिचकूँगा नहीं। मैं विदेश भाषा के जरिए होने वाली शिक्षा को बंद करा दूँगा और सारे शिक्षकों से कहूंगा कि हिंदी माध्यम से पढ़ाएं अन्यथा उन्हें बर्खास्त कर दूँगा।” वह गुलाम भारत के दौर में भी भारतीय लोगों को अंग्रेजी और अंग्रेजियत के मोह में पड़े हुए देखते थे और इस मानसिकता की निंदा किया करते थे। गाँधीजी यह भी चाहते थे कि दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार-प्रसार हो इसलिए उन्होंने अपने युवा बेटे देवदास को दक्षिण भारत में जाकर हिंदी प्रश्न का प्रचार करने के लिए भेज दिया। और यह काम उन्होंने दूसरी बार भारत आने के 3 साल बाद ही शुरू कर दिया था 1915 में गांधी भारत लौटे और जब उन्होंने देश का भ्रमण किया तभी उनके समझ में यह बात आ गई थी कि इस देश में अभिव्यक्ति की कोई भाषा सर्वमान्य भाषा कोई हो सकती है तो वह हिंदी हो सकती है इसलिए 1916 में जब जब कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने हिंदी में भाषण देना शुरू किया, तो हिंदी भाषी लोग विचलित हुए और उन्होंने गांधी को ठोकर कहा कि आप अंग्रेजी में बोलिए तब गांधी जी ने अंग्रेजी में भाषण तो दिया लेकिन यह भी आग्रह किया कि आप सब लोग भी धीरे-धीरे हिंदी बोलना सीख लें। गांधीजी के प्रयास का ही नतीजा है कि आज दक्षिण में हिंदी प्रचार सभा बेहतर काम कर रही हैं। गांधी ने अपनी युवा पुत्र को 1936 में गांधी जी ने वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की। लेकिन यही गांधी हैं जिन्होंने बाद में हिंदुस्तानी प्रचार सभा की भी स्थापना की, क्योंकि गांधी सिर्फ हिंदी का उन्नयन नहीं चाहते थे। वे चाहते थे कि हिंदी के साथ उर्दू भी आगे बढ़े। इसीलिए वे हिंदी या हिंदुस्तानी की ही बात किया करते थे करते थे। लेकिन ऐसा कहते हुए वे भारतीय भाषाओं की भी चिंता करते थे। इसलिए उन्होंने एक बार अपने भाषण में यह स्पष्ट किया था कि ”हिन्दी या हिंदुस्तानी का उद्देश्य नहीं है कि वह प्रांतीय भाषाओं की जगह लेगी। वह अतिरिक्त भाषा होगी और अंतर प्रांतीय संपर्क में काम आएगी।” गांधी की इस उदारता को अगर समय रहते हमने आत्मसात कर लिया होता, तो इस देश की राष्ट्रभाषा हिंदी बन सकती थी। लेकिन अब तो काफी विलंब हो गया है और अंग्रेजी इस कदर घर कर गई है कि उसे देश निकाला देना संभव नहीं है। गांधी हिंदी को लेकर कितने भावुक थे, इसे समझने के लिए वह दृष्टांत भी हमें याद रखना चाहिए, जब आजाद भारत के बाद विदेशी पत्रकार ने उनसे अंग्रेजी में प्रश्न किया, तो गांधीजी ने हिंदी में उत्तर देते हुए कहा था कि पूरी दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है । गांधी तो अंग्रेजी भूल गए थे लेकिन दुर्भाग्य की बात यह थी कि 15 अगस्त 1947 की रात को हमारे पहले प्रधानमंत्री ने अपना भाषण अंग्रेजी में दिया । अगर उस वक्त वह भी गांधी जी की तरह हिंदी में भाषण देते, तो पूरे देश में यह संदेश जाता कि इस देश की राष्ट्रभाषा हिंदी है। गांधी जी ने तो 1917 में ही कहा था कि ”वही भाषा इस देश की राष्ट्रभाषा बनने योग है, जिसे देश के अधिकतर लोग बोलते हैं। जिसके कारण सरकारी कामकाज आसानी से हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र भाषा के बिना तो हमारा स्वराज ही अधूरा रहेगा। हिंदी जल्दी से जल्दी अंग्रेजी का स्थान ले ले।”

ग्राम-स्वराज पर जोर
गांधी ने अपने चिंतन में सबसे ज्यादा जोर गांव पर ही दिया। यत्र तत्र सर्वत्र अपने भाषणों में वे गांव की बात ही अधिक करते थे । ग्राम विकास को लेकर के उनके दिमाग में एक पूरा खाका था, जिसे उन्होंने ‘हरिजन सेवक’ में भी अभिव्यक्त किया था। 1942 के अपने एक अंक में उन्होंने जो कुछ लिखा उसका सार यही है कि ग्राम स्वराज का मतलब है वहां का प्रजातंत्र। जहाँ गांव में ही रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें उत्पादित होंगी। अनाज उत्पादित होगा। कपड़े बनेंगे। गांव की अपनी पाठशाला होगी । सभा भवन होंगे। एक नाटक शाला होगी। मनोरंजन के केंद्र होंगे। खेलकूद के मैदान भी होंगे। गांधीजी ने शुद्ध जल की व्यवस्था के लिए गांव में टंकी बनाने की बात कही। कुओं और तालाबों पर गांव के नियंत्रण की बात कही। उन्होंने गांव में पशुपालन पर भी जोर दिया । खासकर गोपालन पर उनका काफी जोर था। गाय को लेकर उन्होंने जो बातें कहीं हैं, वे भी अद्भुत है । उन्होंने गाय को माता का दर्जा दिया। उन्होंने कहा कि अपनी माता का दूध तो हम तीन साल तक पीते हैं लेकिन गाय का दूध जीवन भर पीते हैं इसलिए गाय हमारी माता है । मगर आज हम गायों की हालत देख रहे हैं। वह अपने भोजन के लिए कुत्ते और सूअरों के साथ संघर्ष करती हुई किसी भी शहर के मुक्कड़ में आसानी से देखी जा सकती है। खैर, यह एकदम अलग विषय है लेकिन गांधी दर्शन से अलग भी नहीं है। गांधी ने ग्राम स्वराज में तमसम बायो के साथ यह भी जोड़ा कि गांव छुआछूत से मुक्त होंगे। आज हम देखते हैं कि गांव कितनी बुरी स्थिति में है । राजनीति का जहर गांव गांव तक पसर गया है। इसलिए जब कभी चुनाव की स्थिति आती है, गांवों में भी हिंसक वारदातों की खबरें मिलती रहती हैं।
दुख की बात है कि आजादी के सात दशक बाद भी गांव का जैसा विकास होना था, नहीं हो सका है। हर गांव में पंचायत है लेकिन ग्राम विकास के लिए जो पैसे आते हैं, उसे पंच सरपंच और अधिकारी मिलजुल कर के हजम कर जाते हैं। गांधीजी ने कुटीर उद्योग पर जोर दिया। पहले और आजादी के बाद भी गांव में लोहार, बुनकर, ठठेरे, बढ़ाई, चर्मकार और कुम्हार आदि शान से रहते थे। उत्पादन करते थे। जिससे गांव आत्मनिर्भर तो थे ही और उनके उत्पाद आसपास के शहरों में भी जाकर बिकते थे । इस के चलते ये लोग आर्थिक दृष्टि से समृद्ध भी थे। उस समय भारत में सात लाख गांव थे । गांधी जी ने कहा था कि सात लाख गांव में सात लाख हुकूमतें बनें। इसका आशय यही था कि हर गांव अपनी स्वतंत्र सत्ता के साथ अपना विकास करे। ग्राम स्वराज उनके लिए एक पवित्र शब्द था। उसे वह वैदिक शब्द कहते थे । और उसका अर्थ भी उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में बताया कि ग्राम स्वराज का अर्थ है, स्वशासन। आज देश में स्वच्छ भारत मिशन का दौर चल रहा है । लेकिन गांधीजी ने आजादी के बहुत पहले से ही स्वच्छता अभियान पर जोर दिया। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी जी ने जब देश भ्रमण किया, तो उन्होंने अनेक गांवों की यात्राएं कीं। तब गांव की गंदगी देख करके वे काफी व्यथित हुए। वे जहां भी जाते थे तो ग्रामवासियों से स्वच्छता की चर्चा करते थे। मलमूत्र का कैसे उपयोग करना है इसकी विधि भी गांधी जी ने विस्तार के साथ बताई। आज गीला कचरा और सूखा कचरे का ज्ञान देने की कोशिश होती है। गांधी जी ने उसी समय देशवासियों को बताया कि सब प्रकार का कूड़ा करकट हटाकर उसे भी स्वच्छ और उपयोगी बना लेना चाहिए । कूड़े का वर्गीकरण कर देना चाहिए। कुछ से तो हम खाद बना सकते है। कुछ को सिर्फ जमीन में गाड़ भर देना चाहिए। हड्डी आदि को पीसकर उससे कीमती खाद बनाया जा सकता है । फटे पुराने चिथड़े कपड़े और बेकार हो चुके कागजों से कागज बना सकते हैं। इधर उधर फैले मल-मूत्र से खेतों के लिए खाद बनाई जा सकती है। कितनी अदभुत बात है कि इस समय हम गांधी के अस्सी नब्बे साल पुराने फार्मूले पर कुछ कुछ सोचना विचारना शुरू कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में तो गोधन न्याय योजना शुरु की गई है, जिसके तहत सरकार दो रुपए किलो के हिसाब से गोबर खरीद रही है और उससे खाद बनाने का काम कर रही है।  आज हमारे प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया की बात कर रहे हैं। लोकल का नारा बुलंद कर रहे हैं। ये सारी बातें गांधी जी ने हमें आजादी के पहले ही सिखा दी थी। लेकिन नवउदारवादी करण के कारण बाजारवाद ज़्यादा मुखर हुआ और इस ने धीरे-धीरे हमें गांव से ही विमुख कर दिया। जबसे ब्रांडेड उत्पाद भारत के बाजार में अपना कब्जा जमाने लगे, तब से धीरे-धीरे चर्मकार, लोहार, बढ़ई कुम्हार आदि सब खत्म होने लगे। बाहर से आने वाली रेडीमेड चीजें, लोगों को भाने लगी । हालत यह हुई कि दिवाली के अवसर पर मिट्टी के दीयों की जगह लोगों ने चीनी झालरों को जलाना शुरू कर दिया। पहले गांव में खिलौने बना करते थे जो शहरों में आकर बिका करते थे। लेकिन चीनी बाजार का ऐसा कब्जा हुआ कि उसी के खिलौने खिलौनों से भारतीय बाजार पट गए ।और हमारे गांव के कुम्हार बेरोजगार होते चले गए। दूसरे कुटीर उद्योग भी दम तोड़ते चले गए। अब तो हालत यह है कि गांव से गांववालों का ही मोह भंग हो रहा है। नई पीढ़ी के लड़के शहरों में जाने के बाद शहरी दुनिया में इतने रम जाते हैं कि गांव की मिट्टी उन्हें नहीं सुहाती। और जब से फोरलेन सड़कों का मायाजाल देश में बिकने लगा है, तब गांव के आम लोग यही सोचते हैं कि कैसे उनकी जमीन फोरलेन सड़क की जद में आ जाए ताकि एक मोटा मुआवजा उन्हें मिले। उसे लेकर वे गांव छोड़कर शहर में जाकर बस जाएं। अनेक लोग ऐसा कर चुके हैं। भले ही शहर में जाकर ग्रामीणजन कहीं चाकरी करने लगे । लेकिन वे भी गांव से मुक्त होना चाहते हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे गांव खेती-किसानी से विमुख हो रहे हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है। गाँवो को बचाने के लिए बहुत जरूरी है कि हम गांधी के बताए ग्राम स्वराज्य को मजबूत करें। गांव की अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि वहां की स्थानीय निकायों को अधिक से अधिक तवज्जो दें। और जो कुटीर उद्योग हैं, उनको प्रोत्साहित करके विदेशी उत्पादों का बहिष्कार करें। पिछले दिनों चीन द्वारा सीमा में निरंतर घुसपैठ की हरकतों के कारण देश में थोड़ा सा राष्ट्रवाद जाग्रत हुआ। सरकार ने भी अपना गुस्सा दिखाया और देश में चीनी माल के आयात का सिलसिला काफी हद तक रुका ।लेकिन यह एक अस्थाई व्यवस्था है। स्थिति सामान्य होने के बाद फिर वही ढर्रा हो जाता है । हम फिर चीन की ओर देखने लगते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि चीन पर हमारी निर्भरता खत्म हो और हम गांव में होने वाले स्थानीय उत्पादों को ज्यादा से ज्यादा महत्व दें। यही है गांधीजी की स्वदेशी भावना, जिसे मजबूत करने की ज़रूरत है। इसलिए मैं कहता हूं कि हमारे समय में भी गांधी बेहद प्रासंगिक हैं। और विकास का बेहतर रास्ता गांधी दर्शन से ही निकलेगा।