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आजादी की बेला पर गांधीजी

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आर.के.पालीवाल

भारत की आजादी और सांप्रदायिक आधार पर विभाजन के समय गांधीजी की मनोदशा बहुत विचित्र सी हो गई थी। इन दिनों जिन चार सूबों, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस, पंजाब, सिंध और बंगाल की मांग पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग काफी समय से करती आई थी और जिसे भारत छोड़ने के पहले ब्रिटिश सरकार ने पूरा करने का मन बना लिया था , वहां जबरदस्त सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। जिस हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए गांधी ने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के समय से अपनी अंतिम सांस तक निरंतर प्रयास किया था वह गांधी की आंखों के सामने तार तार हो गई थी। यह वैसा ही था जैसे ताउम्र मेहनत कर पाई पाई जोड़कर कोई परिश्रमी व्यक्ति अपना आशियाना बनाता है और तभी कोई ऐसा अजाब आता है जिसमें वह आशियाना जमींदोज हो जाता है। वह तो गांधी का व्यक्तित्व अलग मिट्टी का बना था जो किसी भी विषम से विषम परिस्थितियों में जूझकर फिर से खड़ा होने की फिनिक्स जैसी अद्भुत क्षमता रखता था अन्यथा ऐसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति विक्षिप्त हो सकता है। विभाजन और सांप्रदायिक दंगों के पागलपन की मर्माहत करने वाली मनस्थिति में गांधी के लिए दिल्ली में जोर शोर से होने वाले जश्ने आजादी में शिरकत करना संभव नहीं था इसलिए वे सांप्रदायिक सौहार्द के नोआखली के अपने अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए बंगाल आ गए थे लेकिन गांधी के कलकत्ता पहुंचने तक कलकत्ता में दोबारा सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे।
एक साल पहले कलकत्ता में मुस्लिम लीग सरकार थी जिस पर अपने समर्थक गुंडों के प्रति नरमी बरतने का आरोप था। बदली हुई परिस्थितियों में बंगाल के कलकत्ता वाले हिस्से में कांग्रेस की सरकार बनने की तैयारियां पूरी हो चुकी थी। इस बार यह आरोप था कि पहले दंगे में पीड़ित पक्ष अपना बदला ले रहा है। गांधी इस वक्त अहिंसा के सिद्धांत की और ज्यादा जरूरत महसूस कर रहे थे क्योंकि जिस तरह नोआखाली के दंगों की प्रतिक्रिया में बिहार में दंगे हुए थे उसी तरह लगभग पूरा देश इस तरह की सांप्रदायिक आग में झुलसने की तरफ बढ़ रहा था। गांधी 1946 – 47 के दौरान काफी समय बंगाल में रहे थे जहां वे सबसे पहले शुरू हुई सांप्रदायिक आग को शांत करने के लिए अपने अहिंसा के प्रयोग की परीक्षा कर रहे थे। हालांकि नोआखाली, कलकत्ता और बिहार में गांधी की लंबी उपस्थिति ने दंगों की विभीषिका को काफी हद तक कम कर दिया था जिसके लिए उनकी राजगोपालाचारी से लेकर माउंटबेटन तक ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी, लेकिन यह भी जमीनी सच था कि इस दौरान भारत के दो सबसे बड़े सम्प्रदायों के बीच आपसी विश्वास की कड़ी काफी हद तक ध्वस्त हो गई थी और गांधी के आहत होने का यही सबसे बड़ा कारण था जो उन्हें विभाजन और दंगों के बीच आजादी के जश्न में शामिल होने से रोक रहा था।
बंगाल के काफी लोग यह चाहते थे कि बंगाल का विभाजन नहीं होना चाहिए लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग बंगाल के अधिकांश हिस्से या पूरे बंगाल को भारत और पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सोहरावर्दी संयुक्त आजाद बंगाल की मुहिम चला रहे थे लेकिन पिछले दंगों में उनकी अकर्मण्यता और किसी हद तक संलिप्तता के कारण पश्चिम बंगाल के हिन्दू उन पर विश्वास नहीं करते थे और इस दौरान मुस्लिम लीग में भी उनका कद कम हो गया था। इसके चलते बंगाल का विभाजन ही एकमात्र हल बन गया था और संयुक्त बंगाल मुहिम भी संयुक्त भारत मुहिम की तरह धरासाई हो गई थी। देश की तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनजर अब गांधीजी के लिए यही काम रह गया था कि वे जहां भी रहें वहां सांप्रदायिक सौहार्द बनाने में जुटे रहें। आजादी के कुछ दिन पहले गांधी कलकत्ता आ गए थे जहां उनके साथ प्रोफेसर निर्मल कुमार बोस साए की तरह रहते थे जो उनके बंगाली भाषा के शिक्षक और शिष्य दोनों थे। निर्मल कुमार बोस ने अपनी किताब माई डेज विद गांधी में इन दिनों गांधी की मनस्थिति का बहुत मार्मिक चित्रण किया है।
निर्मल कुमार बोस लिखते हैं कि आजादी की पूर्व संध्या के लिए गांधीजी का संदेश लेने के लिए भारत सरकार के सूचना विभाग का एक अधिकारी गांधी से मिला था। गांधी ने उसे यह कहकर बैरंग लौटा दिया था कि मेरे पास कोई संदेश नहीं है। इसके बाद दो अधिकारी गांधी से संदेश लेने आए थे। उनका कहना था कि गांधी जी संदेश नहीं देंगे तो इसका खराब असर पड़ेगा। गांधीजी ने झल्लाते हुए उन्हें भी कह दिया था कि खराब असर पड़े तो पड़े मेरे पास इस वक्त देश के लिए कोई संदेश नहीं है। गांधी का यह व्यवहार इस आशय का प्रतीक है कि विभाजन और विभाजन के समय हो रहे भयंकर सांप्रदायिक तनाव ने गांधी के मन से आजादी की खुशी समाप्त कर दी थी। गांधी 1920 से बार बार लगातार यह कहते आए थे कि आजादी प्राप्त करने के पहले हमें अपने चरित्र का विकास करना होगा। छुआछूत और सांप्रदायिक वैमनस्य को खतम करना होगा अन्यथा आजादी का कोई अर्थ नहीं होगा।
हिंसा के खिलाफ गांधी की पुरानी चेतावनी और भविष्यवाणी सच साबित हो रही थी। इसीलिए 14 अगस्त 1947 की रात और 15 अगस्त 1947 की सुबह गांधी दिल्ली के जश्ने आजादी से बहुत दूर कलकत्ता की संवेदनशील बस्ती के हैदर मंजिल के भुतहे एकांत में रहकर आहत मन के साथ सांप्रदायिक सौहार्द के प्रयास कर रहे थे।