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गांधी का समग्र व्यक्तित्व : आर के पालीवाल

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गांधी के समग्र व्यक्तित्व के इतने ज्यादा पहलू हैं कि वे सब गांधी को समग्रता में समझने में किसी प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए भी कठिन पहेली बन जाते हैं। हम में से अधिकांश लोग किसी महान व्यक्ति के व्यक्तित्व को किसी खास नजरिए से देखने की कोशिश करते हैं, मसलन कोई उनका आंकलन राजनेता के रूप में करना चाहता है, कोई समाज सुधारक के रूप में तो कोई आध्यात्मिक सखशियत के रूप में। गांधी के व्यक्तित्व में एक तरफ हम गजब की सादगी और सहजता पाते हैं जो उनकी सहज सरल भाषा से लेकर सहज सरल वेशभूषा और किसान एवं मजदूर की तरह कताई आदि कार्य करने में दिखाई देती है। दूसरी तरफ वे उस अंग्रेज़ शासन से लोहा लेते हुए दिखाई देते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि उनके राज में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। इस हिसाब से गांधी के अभियान बहुत जटिल लगते हैं जो बाहर से देखने में सतही तौर पर भले ही बहुत साधारण लगते हैं लेकिन वे बहुत असाधारण प्रभाव पैदा करते हैं। इस दृष्टि से गांधी का समग्र व्यक्तित्व सतही सरलता में निहित जटिलता का आभास दिलाता है। इसका कारण संभवत: गांधी के व्यक्तित्व का बहु आयामी होना है जो उनके जीवन के विविध अनुभवों के संचय का प्रतिफल था।
गुजरात के एक उच्च मध्यम वर्गीय सात्विक शाकाहारी वैष्णव शहरी वणिक परिवार में पले बढे गांधी ने लंदन में बैरिस्टरी की पढ़ाई करते समय पश्चिमी सभ्यता को आत्म सात किया था। उसके बाद दक्षिण अफ्रीका प्रवास में उनके व्यापक अनुभवों का दायरा भारतीय समुदाय के लिए संघर्ष करते समय और व्यापक हो गया था। भारत की आजादी की लड़ाई में नेतृत्व के दौरान गांधी ने भारत की ग्रामीण संस्कृति पर भी अच्छी खासी पकड़ बना ली थी। इस तरह गुजरात, लंदन, दक्षिण अफ्रीका और अविभाजित सम्पूर्ण भारत की लंबी यात्रा करते हुए गांधी सही अर्थों में वैश्विक व्यक्तित्व बन गए थे। ऐसे विराट व्यक्तित्व को समझने के लिए हमें भी व्यापक जीवन दृष्टि की जरूरत होती है तभी हम गांधी को समग्रता में समझ सकते हैं। गांधी के व्यक्तित्व का एक जटिल पहलू यह भी था कि उनके व्यक्तित्व में कई चीजें इस तरह घुल मिल गई थी जैसे दूध में पानी और चीनी इस तरह एकमेव हो जाते हैं कि उन्हें अलग करके देखना संभव नहीं होता। गांधी के व्यक्तित्व में निजता और सार्वजनिकता एकमेव हो गई थी। वे जैसे निजी जीवन में थे वैसे ही सार्वजनिक जीवन में हो गए थे। उन्होंने राजनीति और धर्म एवं आध्यात्मिकता को भी संयुक्त कर दिया था। उनके आजादी के आंदोलन में सत्य और अहिंसा के साथ साथ रचनात्मक कार्यों पर भी बराबर जोर रहता था। यह दूसरी बात है कि उनमें कभी आंदोलन पक्ष हावी हो जाता था और कभी रचनात्मक पक्ष। इसका सबसे सुंदर उदाहरण उनके असहयोग आंदोलन और दांडी मार्च के बीच के समय देखने को मिलता है। जब गांधी स्वास्थ्य या किसी अन्य कारण से सक्रिय राजनीति में नहीं रहते थे तब भी वे किसी न किसी तरह अप्रत्यक्ष तौर पर भारतीय जनमानस को प्रभावित करते रहते थे।
1922-24 में असहयोग आंदोलन में हिंसा भडकने के आरोप में गांधी जेल में बन्द कर दिए गए थे। 1923 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन गांधी के मित्र मोहम्मद अली की अध्यक्षता में हुआ था। उन्होंने गांधी की अनुपस्थिति में उनकी प्रशंसा करते हुए कहा था कि देश को उनकी बहुत जरूरत है। दुर्भाग्य से इस ईसाई सरकार ने इसामसीह जैसे इंसान को जेल में बंद किया है। गांधी के लिए किसी मुस्लिम नेता द्वारा यह सबसे बड़ा विशेषण है। 12 जनवरी 1924 के एपेंडिक्स के आपरेशन के बाद गांधी के स्वास्थ्य को लेकर कांग्रेस के नेताओं और जनता में चिंता और तरह तरह की अफवाहें फैलने लगी थी। बंबई में जिन्ना सहित कई गणमान्य नागरिक सरकार से गांधी की रिहाई की मांग कर रहे थे। नए गवर्नर एल विल्सन ने जनता की नब्ज भांपकर गांधी को 4 फ़रवरी 1924 को बिना शर्त रिहा कर दिया था। अब गांधी की वही पुरानी चिंता जग गई थी जो सजा से पहले थी और जिनका जिक्र उन्होंने मोहम्मद अली को पत्र में लिखा था। इस पत्र में मुख्य रूप से सांप्रदायिक एकता, छुआछूत, चरखा और लेजिस्लेटिव कॉन्सिल में प्रवेश के मुद्दे उठाए थे। गांधी स्वास्थ्य लाभ के लिए बंबई के जुहू इलाके में समुद्र किनारे बनी कोटेज में रहने आ गए थे। वहां उनकी पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई थी। सुबह की प्रार्थना के बाद दिन में चिट्ठी पत्री और लेख लिखना, आगंतुकों से मिलना, साथियों से विचार विमर्श करना आदि। दिनो दिन भीड़ बढ़ती देख कर गांधी ने दर्शन किस्म की सामान्य मुलाकात करने वालों के लिए शाम पांच से छह का समय नियत कर दिया था। इस दौरान जिन्ना की पत्नी रती जिन्ना ने भी एक भावुक पत्र लिखकर गांधी से मिलने के लिए समय मांगा था। गांधी की दिनचर्या देखकर राजाजी ने कहा था कि जब गांधी अस्पताल में स्पेशल वार्ड में भर्ती थे तब अस्पताल के नियमों के चलते कम मुलाकाती आते थे अब यहां जनरल वार्ड हो गया है। सब आ जाते हैं।
गांधी के लिए यह थोड़े से आराम, चिंतन मनन और ठंडे दिमाग और तटस्थ भाव से कांग्रेस और देश भर में चल रही अच्छी बुरी गतिविधियों पर विचार करने का था।वे उनसे मुलाकात के लिए आने वाले मित्रों के साथ बातचीत और चिट्ठी पत्री और लेखों के माध्यम से जनता की नब्ज टटोल रहे थे। कांग्रेस के दो खेमों में बंटने और आंदोलन बन्द होने से उन युवाओं का मोह भंग होने लगा था जिन्हें गांधी के उस बडबोले बयान ने आशा दिलाई थी जिसमें उन्होंने कहा था कि एक साल में स्वराज आ जाएगा। वे अब आंदोलन और कांग्रेस की गतिविधियों से अलग होकर अपने काम धंधे में लिप्त हो गए थे। कांग्रेस कमजोर पड़ रही थी। हिन्दू मुस्लिम एकता बिखरने लगी थी, छुआछूत आंदोलन धीमा हो गया था और खादी आदि के बाकी रचनात्मक कार्य भी काफी शिथिल पड़ गए थे। कांग्रेस के काफी कार्यकर्ता कांग्रेस की पुन: सक्रियता के लिए गांधी की पुनर्वापसी का इंतजार कर रहे थे। इस बीच केरल में त्रावनकोर राज्य के वायकॉम में प्रसिद्ध शिव मन्दिर के पास की सड़क अछूत कहलाने वाली जातियों के लिए खोलने के लिए एक सशक्त छुआछूत विरोधी आंदोलन शुरू हुआ था। इस अहिंसक आंदोलन ने सबका ध्यान खींचा था। इसकी शुरुआत वहां के लोकप्रिय समाज सुधारक नारायण गुरु के अनुयाई टी के माधवन ने की थी। उनका साथ एक लोकप्रिय स्थानीय कांग्रेसी नेता केशव मेनन भी दे रहे थे।
माधवन ने पहले भी गांधी से अंतर्जातीय विवाहों और मन्दिरों में अछूतों के प्रवेश के लिए एक आंदोलन का जिक्र किया था लेकिन गांधी ने कहा था कि उनकी प्राथमिकता पहले दलितों के बच्चों के लिए स्कूल और पीने के पानी के लिए कुएं आदि खोलने की है। उन्होंने माधवन को भी यही सलाह दी थी कि वे भी इन कार्यों को प्राथमिकता दें। वायकॉम आंदोलन में भी आंदोलनकर्ता गांधी को जोड़ना चाहते थे जिससे इस आंदोलन में शामिल लोगों का उत्साह वर्धन हो। माधवन और मेनन संयुक्त रूप से 30 मार्च को अहिंसक तरीके से अपना बड़ा जन आंदोलन शुरू कर रहे थे। गांधी ने इस आंदोलन के लिए अपना आशीर्वाद देते हुए कहा था कि आपके लोग किसी भी सूरत में बल प्रयोग नहीं करेंगे। गांधी के संदेश के साथ बहुत से लोगों ने इस आंदोलन में भागीदारी की थी। आंदोलन के दोनों प्रमुख नेताओं सहित काफी स्थानीय लोगों ने गिरफ्तारी दी थी।
जब इस आंदोलन में शामिल लोग उपवास करने लगे तो गांधीजी ने उन्हें उपवास करने से रोकते हुए कहा कि उपवास हम उन शोषकों के खिलाफ नहीं कर सकते जो हमें अपना दुश्मन मानते हैं। उपवास हम उनके लिए करते हैं जिनसे हम प्रेम करते हैं और जिन्हें हम सुधारना चाहते हैं। गांधी ने अपने मंतव्य को और स्पष्ट करते हुए कहा कि बंबई और बारडोली मे मैंने इसलिए उपवास किया कि वहां जिन लोगों ने हिंसा की थी वे मुझे प्यार करते थे। मैं जनरल डायर जैसे व्यक्ति के लिए उपवास नहीं करूंगा जो मुझे प्यार नहीं करता उल्टे मुझे अपना दुश्मन समझता है।
उपवास के बारे में यह गांधी का ऐसा स्पष्टीकण है जो उनके तमाम उपवासों की सार्थकता बताता है। दक्षिण अफ्रीका से लेकर अपनी हत्या के कुछ समय पहले किए गए गांधी के सभी छोटे बड़े उपवासों को इस कसौटी पर कस सकते हैं। माधवन और मेनन की गिरफ्तारी के बाद इस आंदोलन की कमान जॉर्ज जोसेफ ने संभाली थी जिन्होंने विगत वर्षो में यंग इंडिया का संपादन किया था। गांधी ने उन्हें इस आंदोलन से अलग रहने की सलाह दी थी। गांधी का कहना था यह हिन्दू धर्म का मामला है इसलिए इसे हिन्दुओं को ही उठाना चाहिए। दूसरे धर्म के लोग आंदोलन कारियों से सहानुभूति रख सकते हैं, उनके बारे में लेख लिख सकते हैं लेकिन आंदोलन उसी धर्म के लोगों को करना चाहिए। गांधी का यह सिद्धांत भी एक धर्म के लोगों के मामले में दूसरे धर्म के लोगों की रुचि की लक्ष्मण रेखा तय करता है। भारतीय परंपरा में यह उचित भी लगता है। जैसे पति पत्नी और परिजन निजी और पारिवारिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप उचित नहीं मानते इसी तरह धर्म के मामलों को लेकर भी लोग संवेदनशील होते हैं और दूसरे धर्म के लोगों द्वारा अपने निजी मामलों में हस्तक्षेप से नाराज़ होते हैं। वायकॉम आंदोलन के सत्याग्रहियों के लिए गांधी ने कुछ और भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। उनका कहना था कि आंदोलन के साथ साथ उन्हें राज्य के सम्बन्धित अधिकारियों को पिटिशन आदि भी देते रहना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी हिदायत दी थी कि वायकॉम से त्रिवेंद्रम तक के प्रस्तावित पैदल मार्च के समय आंदोलनकारियों को गांव से दूर पड़ाव डालने चाहिए और रास्ते में अपने खाने आदि की व्यवस्था खुद करनी चाहिए।
इस आंदोलन में हालाकि गांधी चंपारण की तरह खुद अपने करीबी सहायकों और परिजनों की टीम के साथ उपस्थित नहीं थे लेकिन वे अपने दक्षिण अफ्रीका और भारत के आंदोलनों के लंबे अनुभवों का पूरा लाभ इस आन्दोलन के कर्ता धर्ताओं को पहुंचा रहे थे। कहने के लिए वे डाक्टर की सलाह पर आराम कर रहे थे लेकिन हकीकत में गांधी और आराम दो विरोधाभासी चीजें हैं।गांधी आराम के इस समय का पूरा सदुपयोग टेली मेडिसिन की तरह दूर से रोग मुक्ति की सलाह देकर और अपने पुराने आंदोलन की खामियों पर चिंतन मनन कर आगे की रणनीति बनाने में कर रहे थे।
जिस तरह गांधी अपने समय में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनमानस को प्रभावित करते थे वही स्थिति कमोबेश आज भी है जब वे भारत ही नहीं पूरे विश्व के जनमानस को प्रभावित कर रहे हैं। यही गांधी के विलक्षण व्यक्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है। चाहे हमारा वर्तमान राष्ट्रीय सफाई अभियान हो या विश्व अहिंसा की परिकल्पना गांधी विचार और जीवन दर्शन इन सबमें सबसे आगे है।