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गांधी का वास्तविक कद : योगेश डाबरा

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-योगेश डाबरा
आजकल, विशेष रूप से सोशल मीडिया के गप्प बाज़ार में, जिसे अक्सर व्हाट्स एप युनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है, वहां एक वर्ग में गांधीजी को लेकर बहुत आक्रोश है कि आजादी का सारा श्रेय गांधीजी को दे दिया गया. सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज के योगदान और भगतसिंह की कुर्बानी को नजरअंदाज कर दिया गया. गांधी जी पर यह भी इल्जाम है कि उन्होंने विभाजन होने दिया और भगत सिंह को नहीं बचाया. यह भी कहा जा रहा है कि क्या चरखे से भी आजादी आ सकती है?
सोशल मीडिया पर, बिना प्रमाणिक तथ्यों के किया गया यह प्रचार उन लेखों पर आधारित है जिनके लेखक या तो किसी एक विशेष विचारधारा से जुड़े हैं या किसी महान हस्ती की निंदा करके थोड़े समय के लिए मशहूर हो जाते हैं और उनकी किताबें बिक जाती हैं. इसी तरह की खबरों से मीडिया की टीआरपी बढ़ती है. अगर इसमें राजनीतिक एजेंडा जुड़ जाए तो यह दुष्प्रचार और भी अधिक गति पकड़ लेता है.
इस सम्बन्ध में गांधीजी के बारे में कुछ उन तथ्यों को देखना जरूरी हो जाता है जो पूरे विश्व में प्रमाणिक तौर पर स्वीकार किए गए हैं:-
1. टाइम मैगजीन ने गांधी जी को “मैन ऑफ़ द ईयर” के खिताब से नवाज़ा था. अल्बर्ट आइंस्टाइन को ‘पर्सन ऑफ द सेंचुरी’ का अवार्ड दिया था, गांधी जी इसमें दूसरे नंबर पर थे. यहां यह गौर तलब है कि आइंस्टाइन ने खुद गाँधी जी के बारे में कहा था कि “आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़ मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी कभी धरती पर चलता फिरता था”
2. 150 से अधिक देशों में 800 से अधिक प्रकार के डाक टिकट गांधीजी के नाम पर जारी किए गए हैं. पहली बार आधुनिक ब्रिटेन के डाक टिकट पर शाही खानदान के इलावा किसी अन्य व्यक्ति की फोटो लगी थी. लगभग सभी डेमोक्रेटिक देशों में, इंग्लैंड के पार्लियामेंट स्क्वायर में भी, गांधीजी की मूर्तियां लगी हैं. 10 देशो में गाँधी जी के स्मारक हैं. 45 फिल्में, 500 से अधिक डॉक्युमेंट्री और 90000 से अधिककिताबें गांधी जी पर लिखी गई हैं.
3. दक्षिण अफ्रीका की जेल में, कैदी की हैसियत से गांधी जी ने जो चमड़े की सैंडिल बनाई थी, उसे 1914 में दक्षिण अफ्रीका छोड़ते समय, उन्होंने जनरल स्मट्स को तोहफे में दी थी. 1939 में गांधीजी के 70 वें जन्मदिवस पर स्मट्स ने जो तब दक्षिणी अफ्रीका का प्रधानमंत्री निर्वाचित हो चुका था, यह कह कर सैंडल वापिस कर दी, “ये सैंडिल मैंने गर्मियों में कई बार पहनी थी पर बहुत कोशिश के बावजूद भी मैं आप जैसी महान हस्ती के पद चिन्हों पर नहीं चल पाया.” कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी कैदी के बनाये सैंडिल को 25 साल तक संभाल कर रखें, ऐसा उदाहरण दुनिया में दूसरा नहीं है.
4. गांधी जी से प्रेरणा लेकर मार्टिन लूथर किंग, लेक वालेसा, नेलसन मंडेला और ओंगसान सू नोबल प्राइज पा चुके हैं. नोबेल कमेटी के तत्कालीन सचिव ने 2006 में भारत आकर इस बात पर खेद व्यक्त किया कि गांधीजी को नोबेल प्राइज ना देना उनकी बहुत बड़ी भूल थी.
5. जो भी व्यक्ति गाँधी जी के साथ कुछ दिन रह लेता था वो अपना काम धंधा छोड़कर उनके साथ काम करने लगता था. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जैसे कैलन्बाख (दक्षिण अफ्रीका का सबसे बड़ा आर्किटेक्ट), लुइ फिशर (न्यूयॉर्क टाइम्स का संवाददाता जिसने नौकरी छोड़ कर गांधीजी के साथ रहकर उनकी जीवनी लिखी), मीराबेन (ब्रिटिश एडमिरल की बेटी) आदि.
6. गाँधी जी कि टूटी चप्पल, टूटा चश्मा, टूटा चरखा आज भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में करोड़ों रुपयों में बिक सकते हैं. आप कोई भी दुनिया की महान से महान हस्ती के बारे में सोचें कि क्या उसकी प्रयोग की हुई वस्तु की कोई मार्किट है?
यह सब तो विदेशी प्रसंग थे. भारतीय प्रसंग तो अनगिनत हैं. जब सारा संसार किसी आदमी की तारीफ कर रहा है तो उसमे कुछ तो बात होगी. इसलिए सच्चाई जानने के लिए गाँधी जी की मौलिक किताबें पढ़नी चाहिएं. वास्तविकता जानने के लिए उन लोगों के भी लेख पढ़ने चाहिए जिन्होंने गांधी जी के साथ काफी समय बिताया था.
सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर गाँधी जी से विवाद के समय कहा था – मैं पूरी दुनिया को खुश कर लूँ लेकिन सबसे महानतम और पवित्रतम व्यक्ति को मुझ से दुःख हो तो सब की ख़ुशी किस काम की”.
आज़ाद हिन्द फौज की एक टुकड़ी का नाम उन्होंने रखा था “गाँधी ब्रिगेड”. 1944 के अपने रेडियो प्रसारण में गाँधी जी को सुभाष चन्द्र बोस ने ही राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था. भगत सिंह ने गाँधी जी के आह्वान पर ही पढाई छोड़ दी थी, और कहा था कि महात्मा जी ने सारे देश को जगा दिया है.
यदि हम उपरोक्त देशी विदेशी लोगों और महत्वपूर्ण जानकारियों के परिप्रेक्ष्य में गांधी जी का असली कद देखने की कोशिश करते हैं तब हम यह सहज आभास कर सकते हैं कि बीसवीं शताब्दी ही नहीं बल्कि पिछली कई शताब्दियों में हमारे देश में ही नहीं बल्कि विश्व में गांधी के कद की शायद कोई दूसरी हस्ती नहीं हुई जो कभी किसी राष्ट्र का प्रमुख होना तो दूर किसी देश के किसी संवैधानिक पद पर भी विराजमान नहीं रही फिर भी संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया के तमाम देश उसे इतने सम्मान के भाव से देखते हैं।
यह सब गांधी के साथ उन दिनों भी हो रहा था जब आज की तरह सहज रूप से हर जगह उपलब्ध सोशल मीडिया तो दूर फोन जैसी सुविधा भी केवल चन्द लोगों को उपलब्ध थी। यह कल्पना करना मुश्किल है कि यदि आज के दौर में गांधी जीवित होते तो दुनिया भर में हर देश में उनके कितने प्रशंसक होते। गांधी निश्चित रूप से हमारे ऐसे गौरव हैं जिनका नाम लेकर हम आम भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में गर्व से अपना सिर ऊंचा कर खड़े हो जाते हैं।