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गांधी का सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन दर्शन

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आर.के.पालीवाल

गांधी भले ही औपचारिक रूप से विज्ञान विषयों के विद्यार्थी नहीं थे लेकिन स्वभाव से वे प्रयोग वादी थे। उन्होंने अपनी आत्म कथा में अपने जीवन को भी सत्य के प्रयोग शीर्षक से ही प्रस्तुत किया था। इस वर्ष हम उनके 1920 में शुरू किए असहयोग आंदोलन का शताब्दी वर्ष मना रहे हैं वह भारत की आजादी के संघर्ष में उनका राष्ट्रीय फलक का पहला व्यापक सत्याग्रह आंदोलन के रूप में याद किया जाता है।
गांधी के नेतृत्व के असहयोग आंदोलन की गांधी की तैयारियों की खोजबीन करना बहुत रोचक है। हम सब जानते हैं कि गांधी जब दक्षिण अफ्रीका गए थे तब उनके दिमाग में केवल और केवल अपने परिवार की रोजी रोटी की चिंता थी, हालांकि नियति उन्हें कहीं और ले जाना चाहती थी इसलिए एक के बाद एक ऐसे कारण बनते चले गए कि गांधी पहले दक्षिण अफ्रीका प्रवास के सत्याग्रह और बाद में 1915 में भारत वापसी पर आजादी के संघर्ष में शामिल होकर अपने आश्रम वासी साथियों और देश दुनिया में फैले सहयोगियों के माध्यम से अपने बड़े परिवार को निरन्तर विस्तारित करते चले गए और 1920 आते आते पूरा भारत ही उनका परिवार बन गया था।
गांधी ने यह खुद भी स्वीकार किया है कि सत्याग्रह का पहला पाठ उन्होंने अपनी सहधर्मिणी कस्तूरबा गांधी से सीखा था जो सत्य के प्रति बेहद आग्रही थी। धीरे धीरे इसे गांधी ने सामाजिक राजनैतिक आंदोलन में एक धारदार अस्त्र की तरह सार्वजनिक रूप से जनहितार्थ इस्तेमाल करने की अनूठी कला विकसित की थी जिसका सबसे व्यापक प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर पहले 1920 के असहयोग आंदोलन और उसके बाद 1930 के दांडी मार्च के नाम से मशहूर सविनय अवज्ञा आंदोलन और अंत में 1942 के ऐतिहासिक अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में पहले से बेहतर रूप में इस्तेमाल किया था।
सत्याग्रह दर्शन का पहला प्रयोग गांधी ने दक्षिण अफ्रीका की सीमित भारतीय जनता के साथ होने वाले भेदभाव के विरोध में किया था जिसमें उन्हें लंबे संघर्ष के बाद विजय श्री हासिल हुई थी। उसके बाद ही गांधी पर भारत आकर कांग्रेस के नेतृत्व में 1885 से काफी धीमी गति से चल रहे संवैधानिक सुधार कार्यक्रम को गति देने का दबाव बनने लगा था और गांधी 1915 में भारत आकर उसमें तन मन धन से शिरकत करने का मन बना चुके थे।
भारत वापसी पर गांधी ने अपने राजनीतिक गुरु गोखले की सलाह पर एक साल लगभग पूरे देश में भ्रमण कर यहां की जमीनी हकीकत का गहन अध्ययन किया था जो उनके आगे के सत्याग्रह अभियानों में बहुत लाभप्रद रहा था। 1917 के चंपारण सत्याग्रह में गांधी को बिहार के नील की खेती करने वाले गरीब किसानों की स्थानीय समस्या के समाधान के लिए भारत में सत्याग्रह के प्रयोग का पहला अवसर मिला था।यहां भी गांधी की अथक मेहनत और दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन के लंबे अनुभव के कारण सफलता मिली थी। इसके बाद उन्होंने अपने गृह राज्य गुजरात में पहले अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन और फिर खेड़ा के किसान सत्याग्रह में अपने इस अहिंसक अस्त्र को अपनाया और इन दोनों में भी उन्हें अच्छे साथियों के कारण सफलता मिली। एक के बाद एक सफलता ने निश्चित रूप से गांधी के आत्म विश्वास को शिखर पर पहुंचाया था और उन्हें और व्यापक देश व्यापी सत्याग्रह शुरू करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया था।
गांधी का यह स्वभाव था कि वे जल्दबाजी में कोई बड़ा कदम नहीं उठाते थे और बड़े आन्दोलन शुरू करने के लिए काफी तैयारी और मंथन करते थे। दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में एक के बाद एक तीन स्थानीय सत्याग्रह सफल होने होने के बाद गांधी की भारत और विशेष रूप से कांग्रेस में भी लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी थी और वे इस स्तिथि में आ गए थे जहां उनके युवा साथियों की एक ऊर्जावान टीम उनके कुशल नेतृत्व में किसी भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से सहभागिता करने के लिए उपलब्ध थी।
विनोबा भावे ने क्रांति के लिए दो जरूरी चीज़ों का एक साथ होना जरूरी माना है – एक संक्रमण का समय और दूसरे किसी महान विभूति की ऐसे समय में जनता के नेतृत्व के लिए उपस्थिति। भारत की लंबी गुलामी से आजादी के लिए जनता काफी समय से कसमसा रही थी और गांधी ऐसे संक्रमण काल में उसे नेतृत्व प्रदान करने के लिए पूरी तरह सक्षम थे।
इन्हीं परिस्थितियों में 1920 के असहयोग आंदोलन में गांधी की क्रांतिकारी भूमिका तैयार हुई थी, हालांकि इसे चिंगारी देने के लिए रॉलेट एक्ट और उसके बाद हुआ जलियवाला कांड तात्कालिक प्रमुख कारण बने थे। गांधी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शिखर पुरुष बनाने में जिन प्रमुख कारणों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान था उनमें गांधी की कर्मठता और अनुभव के साथ साथ गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जैसी कांग्रेस के नरम और गर्म दलों के शीर्ष नेताओं मृत्यु के कारण अनुपस्थिति भी महत्वपूर्ण थी। इन दोनों बड़े नेताओं का उनके जीवित रहते हुए ही गांधी को आशीर्वाद मिल चुका था। ऐसी परिस्थिति में गांधी के नेतृत्व में संपन्न राष्ट्रव्यापी हड़ताल को सफल बनाकर भारत की जनता ने भी गांधी के राष्ट्रीय नेतृत्व को मान्यता प्रदान कर दी थी।
1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में मुहम्मद अली जिन्ना आदि उन नेताओं को भी जन समूह ने किनारे कर दिया था जो कांग्रेस की भूमिका को केवल संवैधानिक तरीके से ही प्रतिवेदन आदि देकर आगे बढ़ाने में विश्वास करते थे और असहयोग आंदोलन आदि के पक्ष में नहीं थे। इस अधिवेशन में ही पहली बार लगभग पूरी कांग्रेस की स्थाई कमान गांधी के हाथ में आ गई थी जो आजादी के आंदोलन की समाप्ति तक कमोबेश गांधी के हाथ में ही रही थी।
गांधी के नेतृत्व में उपरोक्त सभी अनुकूल परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ही भारत की आजादी के पहले सबसे बड़े राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन का आव्हान हुआ था। इस आंदोलन की शुरुआत में गांधी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कांग्रेस के नेताओं और भारतीय जनता को सत्याग्रह आंदोलन में असहयोग के प्रमुख तत्वों को स्पष्ट कर इस अहिंसक आंदोलन के दर्शन को समझाया था।
गांधी के अनुसार ऐसा आंदोलन किसी व्यापक सामाजिक राजनैतिक भलाई के पवित्र उद्देश्य से किया जाता है जिसमें अपने विरोधी को अपनी बात शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से बताई जाती है और उनसे असहयोग कर गलत नीतियों का विरोध किया जाता है। इसका उद्देश्य अपने विरोधी का हृदय परिवर्तन कर अपनी जायज मांग पूरी करना होता है और इसके लिए अपने मन में विरोधी के प्रति किसी तरह की दुर्भावना या नफरत की बजाय प्रेम की भावना होती है।
हालांकि दक्षिण अफ्रीका और बाद में भारत में चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में गांधी स्थानीय स्तर पर असहयोग और सत्याग्रह के सफल परीक्षण कर चुके थे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका परीक्षण इतने बड़े पैमाने पर 1920 में पहली बार हो रहा था इसलिए गांधी ने इसके लिए काफी तैयारी की थी और लोगों को विस्तार से समझाया था कि इसमें किसी के प्रति अपमान और दुर्भावना का नकारात्मक भाव नहीं रहता है। उनका यह भी कहना था कि गुलामी की पुरानी और मजबूत जंजीरों में डरी सहमी जनता में निर्भयता का गुण और आत्म विश्वास उत्पन्न करने के लिए गलत को नहीं कहने की अच्छी प्रवृत्ति विकसित करना बहुत जरूरी है।
हालांकि गोखले की संस्था सर्वेंट ऑफ इंडिया में गोखले के उत्तराधिकारी शास्त्री जी, मुहम्मद अली जिन्ना, डाक्टर भीमराव अंबेडकर , रवीन्द्र नाथ टैगोर और कांग्रेस के उदारवादी दल के वरिष्ठ नेता गांधी के सत्याग्रह आंदोलन के असहयोग दर्शन को नकारात्मक और टकराव का रास्ता मानकर गैर जरूरी कहते थे। इन सभी महत्वपूर्ण नेताओं ने इस आंदोलन में हिस्सा लेने से साफ इंकार कर दिया था लेकिन तत्कालीन कांग्रेस के अधिकांश नेता और ब्रिटिश शासन से त्रस्त हो चुकी जनता ने गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर हुए इस पहले सबसे व्यापक और लंबे आंदोलन में खूब बढ़ चढ कर हिस्सा लिया था और बहुत कम समय में गांधी को भारत का सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया था।
गांधी ने पहले लोगों की तैयारी देखकर जिस तरह सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया था उसी तरह जब उन्हें यह अहसास हुआ कि अभी भारतीय जनता उनकी अहिंसा की परिकल्पना को ठीक से आत्मसात नहीं कर पाई है तभी जनता कि हिंसा के बाद उन्होंने इस आंदोलन को अचानक समाप्त करने का भी निर्णय लिया था। गांधी के बहुत से साथी उनके आंदोलन बन्द करने के एकतरफा फैसले से आश्चर्यचकित हुए थे और उन्होंने इसके लिए गांधी की आलोचना भी की थी लेकिन गांधी सत्य और अहिंसा के प्रति इतने अटल थे कि इसके लिए वे कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे।