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असफलता के बड़े-बड़े गुण

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-पीके खुराना
किसी भी व्यक्ति से गलती हो सकती है और असफलता हाथ लग सकती है, लेकिन यदि हम उत्साही हों तो असफलता भी जीवन का पाठ बन जाती है। हम कितनी ही बढि़या योजना बना लें, चुनौतियां आ सकती हैं। ऐसे में हमारी कुशलता दो बातों से सिद्ध होती है। पहली, कि हम कितनी चुनौतियों का अंदाजा पहले से लगा सके और उनसे निपटने के लिए कितनी बढि़या तैयारी कर सके, दूसरी यदि हम किसी कठिनाई अथवा चुनौती का पूर्वानुमान न लगा पाए हों तो मौका आने पर हम उस कठिनाई से कितनी कुशलता से निपट पाते हैं…
यह सच है कि गरीबी कोई गुण नहीं है और अमीरी कोई अवगुण नहीं है। फर्क तब पड़ता है जब कोई गरीब व्यक्ति स्वयं को बेबस मानकर प्रयत्न ही करना छोड़ दे और कोई अमीर व्यक्ति अमीरी के नशे में आगे बढ़ने के प्रयास छोड़ दे। कहा जाता है कि एक बार एक अंग्रेज भारत भ्रमण पर आया। पर्यटन के दौरान जब वह एक छोटे से कस्बे में पहुंचा तो कस्बे के बाजार में उसे एक कुम्हार दिखाई दिया जो अपने बर्तन लगाकर बैठा था, लेकिन बाजार में होने के बावजूद वह ऊंघ रहा था। पश्चिमी संस्कृति में इस व्यवहार को असह्य माना जाता है, इसलिए वह अंग्रेज कुम्हार को ऊंघते देखकर हैरत में पड़ गया और उसने कुम्हार को आवाज देकर जगाया। कुम्हार ने जागकर उस अंग्रेज से पूछा, ‘जी बाबूजी, बताइए क्या चाहिए?’ इस पर अंग्रेज ने उससे कहा, ‘भाई, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस यह कहना चाहता हूं कि तुम अपनी दुकान सजाकर बैठे हो तो चुस्त होकर बैठो, आने-जाने वाले लोगों पर निगाह रखो, उनमें से अगर कोई तुम्हारे बर्तनों की तरफ उत्सुकता से देखे तो उसे आवाज लगाकर बुला लो और अपने बर्तनों की खासियत के बारे में बताओ।’ कुम्हार ने अंग्रेज से पूछा, ‘इससे क्या होगा बाबूजी?’ अंग्रेज ने हैरान होकर कहा, ‘अरे भाई, तुम पूछते हो इससे क्या होगा। भाई, जब ज्यादा लोग तुम्हारे बर्तन देखेंगे तो तुम्हारी बिक्री बढ़ेगी।’ कुम्हार ने फिर पूछा, ‘फिर क्या होगा बाबूजी?’ कुम्हार के इस भोले सवाल पर अंग्रेज को गुस्सा भी आया और कुम्हार पर तरस भी, लेकिन उसने खुद को संभाल कर कहा, ‘भाई, जब तुम्हारी बिक्री बढ़ेगी तो तुम ज्यादा बर्तन बनाओगे, तुम्हारे पास ज्यादा पैसे आएंगे और तुम किसी पक्की दुकान पर बैठ कर बर्तन बेच सकोगे।’ कुम्हार शायद किसी और ही दुनिया का बाशिंदा था। उसने अपना वही सवाल फिर दाग दिया, ‘फिर क्या होगा बाबूजी?’ अंग्रेज ने भी सोच ही लिया था कि वह इस भोले कुम्हार को उद्यमिता का पाठ पढ़ा कर ही मानेगा, सो वह बोला, ‘फिर तुम्हारी बिक्री और बढ़ेगी, व्यवसाय और बढ़ेगा, परिवार में खुशहाली आएगी और धीरे-धीरे तुम ज्यादा बड़ी और बढि़या दुकान ले सकोगे।’ कुम्हार ने अब भी पूछा, ‘फिर क्या होगा बाबूजी?’ अंग्रेज न झुंझलाया, न गुस्सा हुआ। उसने सधे स्वर में कहा, ‘फिर तुम्हारे पास नौकर-चाकर होंगे। सारा काम वे करेंगे और तुम आराम करोगे।’ कुम्हार अब सीधा होकर बैठा और उसने कहा, ‘वाह, वाह, यानी ये सब करने के बाद मैं आराम कर सकूंगा?’
अंग्रेज को लगा कि आखिरकार उसकी बात कुम्हार को समझ में आ गई है। वह उत्साह से बोला, ‘हां, हां, बेशक!’ अब कुम्हार ने अपना आखिरी सवाल पूछा, ‘लेकिन बाबूजी, यह तो बताइए कि जब आपने मुझे जगाया था तो मैं क्या कर रहा था?’ यह कहानी सिर्फ एक कहानी है। हम कुम्हार के चतुराईपूर्ण सवालों का आनंद ले सकते हैं, हंस सकते हैं या इस कहानी से एक बड़ी शिक्षा ले सकते हैं और वह शिक्षा यह है कि आराम और आलस्य में अंतर है। सफलता से पहले का आराम, आराम नहीं, आलस्य है। सफलता से पहले ही हम आरामपरस्त हो जाएं तो हम सड़क किनारे बैठे रह जाएंगे और यदि उस दौर में हम मेहनत करें तो साधन और सुख-सुविधाएं जुटा सकेंगे और फिर आराम हमारा अधिकार होगा! कुछ वर्ष पूर्व जब पहली बार मुझे थायरोकेयर टैक्नालॉजीज के चेयरमैन ए. वेलुमनी को सुनने का मौका मिला तो उनकी बातों से मेरा यह विश्वास एक बार फिर पक्का हो गया कि गरीबी अपने आप में न गुण है न अवगुण, फर्क सिर्फ हमारे नजरिए का है।
एक छोटे से गांव में जन्मे वेलुमनी का बचपन और किशोरावस्था अभावों, कठिनाइयों और चुनौतियों से भरे थे। लेकिन आज वह एक सफल उद्यमी हैं। देश भर से आए 500 से भी अधिक जनसंपर्क उद्यमियों की एक सभा को संबोधित करते हुए थायरोकेयर टैक्नालॉजीज के चेयरमैन ए. वेलुमनी ने कहा कि जब आप गरीब होते हैं तो आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता। यह एक बहुत बड़ी सुविधा है क्योंकि इससे आप कैसा भी जोखिम लेने को तैयार हो सकते हैं। इसी तरह जब आप सफल नहीं हैं और मंजिल को पाने के प्रयास में हैं तो आप काम से जी चुराने के बजाय ज्यादा प्रयत्न करते हैं, लोगों की बातें और ताने भी बर्दाश्त कर लेते हैं, काम में नखरे नहीं करते, गलतियों का विश्लेषण करके अगली बार उनसे बचने की योजना बनाते हैं, जबकि सफलता मिलने पर अक्सर व्यक्ति आरामपसंद हो जाता है, घटनाओं का उथला विश्लेषण करके संतुष्ट हो जाता है और फिर एक ऐसा समय आता है जब कोई अन्य उद्यमी व्यक्ति उससे आगे निकल जाता है। इन्फोसिस के चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास भी धन नहीं था, लेकिन धन का अभाव उनकी प्रगति में आड़े नहीं आया। प्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान के पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था, प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर को बचपन से ही परिवार की सारी जिम्मेदारियां उठानी पड़ी थीं, केएफसी के मालिक ने 60 साल की उम्र में पहला रेस्तरां खोला था, प्रसिद्ध क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर लंबे नहीं हैं।