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खोखली व्यवस्था की हाजिरी

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सेवा क्षेत्र का विस्तार और सही प्रबंधन की दृष्टि से हिमाचल की एक बड़ी खाई स्वास्थ्य सेवाओं में निरुपित हुई है। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला बताता है कि किस तरह खोखली व्यवस्था की हाजिरी में प्रदेश का स्वास्थ्य महकमा काम कर रहा है। प्रदेश के 28 पीएचसी में अगर न डाक्टर और न फार्मासिस्ट हैं, तो यह क्या प्रमाणित करता है। क्या यह इमारतों और वहां खड़ी पट्टिकाओं की नुमाइश का चित्रण है या क्षमता से अधिक विस्तार ने कभी गुणवत्ता पर विचार ही नहीं किया। हिमाचल ने बेशक आंकड़ों में बेशुमार तरक्की की है, लेकिन न संस्थानों-संस्थाओं का संरक्षण हो रहा है और न ही इन्हें गुणवत्ता अर्जित करने का कोई प्रमाणिक आधार मिल रहा है। राज्य में 589 पीएचसी का ढांचा मूलतः चिकित्सकीय सेवाओं का बेहतरीन आश्वासन है, लेकिन इनके बीच अगर दस संस्थानों में चुतर्थ श्रेणी कर्मी ही हाजिरी लगा रहे हैं, तो हमारा वास्तविक लक्ष्य क्या है। पूरी फेहरिस्त को खंगालेंगे तो यह साबित हो जाएगा कि किस तरह पूरे ढांचे को उद्देश्यहीन बनाया जा चुका है। यह मात्र पीएचसी का वर्णन नहीं, जिला अस्पतालों को भी क्षेत्रीय दर्जा देने के बावजूद कोई अंतर नहीं आया। तीनों जोनल अस्पताल रेंग रहे हैं, जबकि तमाम मेडिकल कालेज अपने होने का सबूत नहीं दे पा रहे। अदालती दखल से कुछ खामियां दूर की जा सकती हैं, लेकिन यहां बड़ा सवाल चिकित्सकीय सेवाओं के प्रबंधन का है। क्या चिकित्सा संस्थान किसी रैफरल सिस्टम को पूरा कर रहे हैं या आबादी के आधार पर इनका आबंटन हुआ है। अगर ऐसा होता तो नेरचौक के बगल में एम्स की पृष्ठभूमि तैयार न होती। विडंबना यह है कि चंबा मेडिकल कालेज को चाह कर भी फैकल्टी की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। हर बार किसी बड़े संस्थान के लिए छोटे को कुर्बान होना पड़ रहा है या सारे सरकारी तामझाम के बावजूद लोगों को निजी अस्पतालों पर भरोसा करना पड़ता है। कोविड अस्पतालों की भूमिका में आपदा की वर्तमान चुनौती, हिमाचल की चिकित्सा व्यवस्था की समीक्षा कर रही है। कुछ दिन पहले शिमला के अस्पताल में मरीज द्वारा की गई खुदकुशी दरअसल सारी पोल खोलती है। इसी तरह अब तक कोरोना के खाते में मारे गए पौने दो सौ के करीब लोगों का विवरण बता रहा है कि कहीं तो बचाव में चूक रही होगी। आम बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए चिकित्सा विभाग की काबिलीयत क्यों ताले में बंद कर रखी गई, जरा इसके ऊपर सर्वेक्षण करवा कर देख लें। बहरहाल हाई कोर्ट तक पहुंचा यह महज एक मामला नहीं, ऐसी अनेक शिकायतें राजनीतिक घोषणाओं को कुरेद रही हैं। यही स्थिति शैक्षणिक संस्थानों की भी है। कहीं जरूरत से ज्यादा अध्यापक या कहीं औचित्य से कम छात्रों के लिए भी शिक्षक बने हुए हैं। दरअसल प्रदेश में स्थानांतरण नीति व नियमों का कारगर न होना भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। स्थानांतरण की जरूरत या स्थानांतरण के माध्यम से सरकारी मशीनरी की जरूरत इस कद्र नजरअंदाज है कि कार्य संस्कृति के सन्नाटे में गुणवत्ता का प्रश्न ही गौण है। सरकारी सेवाओं या संस्थानों के उद्देश्यों में गुणवत्ता का अभाव अगर यूं ही जारी रहा, तो इमारतें डराती रहेंगी। चिकित्सा विभाग के अनावश्यक विस्तार ने यही सब किया। जैसे ही चिकित्सा संस्थान स्तरोन्नत होकर मेडिकल कालेजों में बदल गए, नीचे का ढांचा चरमरा गया और बीमार रैफर होकर भटकते-भटकते निजी अस्पतालों में बढ़ गए। पीएचसी संस्थानों की जरूरत व लक्ष्य आज भी बरकरार हैं, लेकिन पद्धति में अनेक सुराख हो गए। ऐसे में चिकित्सा प्रबंधन की दृष्टि से व्यवस्था में नए प्रयोग होने चाहिएं, साथ ही डाक्टर व अन्य स्टाफ की रैंकिंग को परिणामों से जोड़ते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि राजनीतिक तौर पर उन्हें स्थानांतरण का खौफ न सताता रहे। प्रदेश अब ऐसे दौर में पहुंच गया है जहां विभागीय व संस्थागत विस्तार के बजाय सरकारी सेवाओं में गुणवत्ता लाने के लिए प्रयास बढ़ाए जाएं।