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बोलेंगे, तो ‘घरौंदे’ पर बुलडोजर

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‘उद्धव ठाकरे! तू क्या समझता है कि मूवी माफिया के साथ मिलकर तूने बदला ले लिया। आज मेरा घर टूटा है, कल तेरा घमंड टूटेगा। यह वक्त का पहिया है, हमेशा घूमता रहता है। मुझे पता था कि कश्मीरी पंडितों के साथ क्या हुआ होगा, लेकिन आज महसूस कर रही हूं। आज देश को वचन देती हूं कि अयोध्या पर ही नहीं, मैं कश्मीर पर भी एक फिल्म बनाऊंगी और देशवासियों को जगाऊंगी। जो क्रूरता और आतंक मेरे साथ हुआ है, उसका भी मतलब है, उसके भी कोई मायने हैं।’ कंगना रनौत ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के लिए तू-तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल किया, लिहाजा उनके गुस्से और आक्रोश को समझना चाहिए। हालांकि हम शिष्टाचार की मर्यादाओं के पक्षधर हैं, लेकिन उनकी चिंता किसने की है? राज्यपाल भगत सिंह कोशयारी ने भी अपनी नाराजगी जताई है और केंद्र सरकार को रपट भेजने की बात कही है। दरअसल कंगना रनौत की अनुपस्थिति में शिवसेना शासित बृहन्मुंबई नगरनिगम (बीएमसी) ने उनके दफ्तर में तोड़फोड़ की, यह बंबई उच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना भी थी, क्योंकि अदालत ने कोरोना वायरस की महामारी के मद्देनजर 30 सितंबर तक मुंबई में सभी तोड़फोड़ पर रोक लगाने का फैसला दिया था। उच्च न्यायालय ने बीएमसी को तलब किया है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार और शिवसेना भीतर से इतनी फुनफुनाई महसूस हुईं कि 50-60 कर्मचारियों को हथौड़ों, कुदालों और रॉड के साथ भेज दिया गया और कंगना के दफ्तर में अनधिकृत निर्माण के 10-12 बिंदुओं को ढहाने का आदेश दिया। गुस्से और प्रतिशोध की आग यहीं शांत नहीं हुई, क्योंकि बीएमसी ने जेसीबी मशीन मंगवा कर अभिनेत्री के ‘घरौंदे’ पर बुलडोजर ही चलवा दिया। उच्च न्यायालय का रोक का नया आदेश जब तक आया, तब तक बहुत कुछ ‘मलबा’ हो चुका था। हैरानी है कि समूची मुंबई नगरी अनधिकृत, अवैध निर्माणों के साथ बसी है और कंगना के दफ्तरी परिसर की बगल में ही अधिकतर ऐसे निर्माणों को देखा जा सकता है, लेकिन शिवसेना तो बदले से उबल रही थी और ऐसी मनःस्थिति में आदमी अपना विवेक खोकर अंधा हो जाता है। शिवसेना सवाल कर रही थी कि एक औसत एक्टे्रस उसके सामने बोल कैसे सकती है या पलटवार कैसे कर सकती है? महाराष्ट्र सरकार के बुनियादी शिल्पकार एवं वरिष्ठ नेता शरद पवार तक ने विध्वंस की इस कार्रवाई को ‘गैर-जरूरी’ माना, क्योंकि उन्होंने भी साफ तौर पर कहा कि मुंबई में काफी अवैध निर्माण हैं। यह सवाल भी बड़ा मौजू लग रहा है कि ठाकरे परिवार का अपना घर ‘मातोश्री’ का एक-एक इंच क्या अधिकृत और वैध है? शिवसेना के संस्थापक प्रमुख बाल ठाकरे मुंबई की राजनीति के ‘सरदार’ थे। अब उनका बेटा उद्धव राज्य के मुख्यमंत्री हैं। बीएमसी पर लंबे अंतराल से शिवसेना का कब्जा है। तो यह जांच कौन करेगा कि अनधिकृत निर्माण किया गया है? बहरहाल शिवसेना फिलहाल सत्ता में है। सत्ता धैर्य, विवेक, सहनशीलता और जनसेवा की भावनाएं पैदा करती है। यह लड़ाई कैसी है कि एक तरफ अकेली औरत है, जिसका पेशा अभिनय और फिल्म निर्माण है। दूसरी तरफ ताकतवर सत्ता, बेलगाम राजनीतिक पार्टी और बदजुबान कार्यकर्ताओं की फौज है! क्या यह समीकरण सही है? क्या सरकार का जनादेश यही होता है कि वह आम नागरिकों को कुचले? शिवसेना समर्थकों की एक भीड़ बंबई एयरपोर्ट पर, काले झंडों के साथ, क्यों हंगामा करती रही और कंगना रनौत को कोसती रही? यदि कुछ अनिष्ट हो जाता, तो…? दरअसल यह अवैध निर्माण और मराठी अस्मिता का मामला नहीं है। मराठी होना शिवसेना की बपौती नहीं है। दरअसल यह ठाकरे सरकार की राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण है। कुछ तथ्य गौरतलब हैं। बीएमसी को बीते तीन साल के दौरान 52,000 से अधिक अवैध निर्माण की शिकायतें मिली थीं। उनमें से 21,000 से ज्यादा को नोटिस भेजे गए, जिनमें से 12,000 से अधिक को रफा-दफा कर दिया गया। कार्रवाई 5400 से ज्यादा पर ही की गई। सवाल है कि सरकार ‘घरौंदों’ पर तो बुलडोजर चला सकती है।