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मंत्र और माला के साथ जरुरी जन विश्वास

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-आलोक मेहता
बिहारऔर देश के कई हिस्सों में पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण सामंती – जमींदारी व्यवस्था रही है | इन क्षेत्रों में पुरुषार्थ प्रायः मर सा गया |जब पुरुषार्थ ही नहीं रहा , तो परिश्रम , पहल तथा जोखिम उठाने का साहस ही नहीं रहा | दूसरा कारण बिहार में जातिवाद का असर कुछ ज्यादा ही है | राज्य की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा काम करता ही नहीं है |
मुंह से मंत्र और हाथ में माला हो , जाप कर्पूरी ठाकुर और गाँधी का हो , लेकिन केवल सत्ता के माल पर नज़र रखेंगे तो जनता कितना विश्वास करेगी ? बिहार के चुनाव में असली समस्या यही है | अधिकांश राजनीतिक दल और उनके नेता जन नायक कर्पूरी ठाकुर का नाम लेकर गरीबों और पिछड़ों का जीवन बदलने का वायदा करते दिखते हैं , लेकिन क्या उनका संकल्प और व्यवहार कर्पूरीजी की तरह है ? कर्पूरी ठाकुर ने इमर्जेंसी के बाद मुख्यमंत्री बनने पर मुझे सप्ताहिक हिंदुस्तान के लिए दिए गए अपने पहले इंटरव्यू में जुलाई 1977 में कहा था – हम भ्रष्टाचार पर चौतरफा प्रहार करेंगे| भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए जनता की सतर्कता नितांत जरुरी है | सत्ता के आसपास भ्रष्ट अवसरवादियों को शरण या तरजीह बिलकुल नहीं मिलनी चाहिए , वरना वे मुझे नहीं तो मेरे बेटे या सम्बन्धियों को भ्रष्ट करेंगे | बिहारऔर देश के कई हिस्सों में पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण सामंती – जमींदारी व्यवस्था रही है | इन क्षेत्रों में पुरुषार्थ प्रायः मर सा गया |जब पुरुषार्थ ही नहीं रहा , तो परिश्रम , पहल तथा जोखिम उठाने का साहस ही नहीं रहा | दूसरा कारण बिहार में जातिवाद का असर कुछ ज्यादा ही है | राज्य की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा काम करता ही नहीं है |कम से कम काम और अधिक से अधिक पाने – खाने की प्रवृत्ति प्रगति में बाधक ही तो है |
चार दशकों के बाद भी उनकी यह स्पष्टोक्ति एक हद तक आज भी सही है | भ्रष्टाचार , जातिवादी राजनीति प्रदेश की प्रगति में बाधक है | लालू यादव , नितीश कुमार , सुशील मोदी जैसे सभी नेता ही नहीं अन्य दलों के कई नेता कर्पूरीजी के बल पर सत्ता तक पहुंचे हैं | लेकिन उनकी तरह सादगी , ईमानदारी और जनता का विश्वास कितनों के पास है ? कर्पूरीजी और भोला पासवान शास्त्री शीर्ष पदों पर रहे , लेकिन मैंने उन्हें दिल्ली में भी राजपथ की सड़कों पर अकेले बहुत साधारण धोती कुर्ते में पैदल आते जाते देखा था | पटना या दिल्ली में भी सुबह आठ से रात बारह बजे तक उनके दरवाजे न केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं बल्कि सामन्य लोगों की गुहार के लिए खुला रहता था | यही नहीं आगंतुक को वह स्वयं कहतज थे , अगली बार फिर आइयेगा तो और बात होगी | अब ऐसे कितने नेता मिलते हैं ? तभी तो जनता दुखी , भ्रमित होकर किसी एक दल को भारी बहुंमत नहीं दे पाती है |
बिहार में श्रीकृष्ण सिंह और भागवत झा आज़ाद जैसे ईमानदार कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी रहे , लेकिन पार्टी के ही भ्र्ाष्ट और प्रदेश में सक्रिय माफिया ने उन्हें अधिक समय सत्ता में टिकने नहीं दिया | इसे दुर्भाग्य कहा जायेगा कि जयप्रकाश नारायण और कर्पूरीजी का नाम लेकर सत्ता में आने वाले लालू यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही लूट शुरू कर दी , फिर 15 वर्षों के राज में गरीबों को जुबान जरूर दी , उनकी रोजी रोटी छीन ली | आज अपने पापों की सजा पाने के बावजूद उनके इशारों पर चलने वालों के रंग ढंग वैसे ही लग रहे हैं | सत्ताधारियों ने जमीन , पानी , खेती के सही उपयोग और छोटे लघु मध्यम श्रेणी के उद्योगों की स्थापना के लिए पूरा ध्यान नहीं दिया | अंग्रेज राज की तरह आज भी बिहार ही नहीं उत्तर भारत के लोग सरकारी नौकरी – बाबु , सिपाही , चपरासी बनने के लिए घर जमीन तक बेच देते हैं | यह क्या गुलामी की मानसिकता नहीं है | इस बार भी लालू के उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव ने सत्ता में आने पर पहले ही दिन दस लाख लोगों को सरकारी नौकरियां देने के आदेश पर दस्तखत करने की घोषणा ही कर दी है | भाजपा ने चतुराई से निजी क्षेत्र जोड़कर सत्रह लाख नौकरी का वायदा कर दिया है | जो युवा किसी कौशल विकास केंद्र में कारीगरी सहित विभिन्न क्षेत्र का सही हुनर सीखकर स्वयं कोई काम धंधा करके महीने में पच्चीस पचास हजार रूपये कमा सकता है , उसे भ्र्ष्ट तरीके से नौकरी लेकर जिंदगी भर निठल्ला रहने का प्रलोभन प्रदेश को कैसे प्रगति दिला सकेगा ?
दुनिया के किस लोकतान्त्रिक देश में नेता सरकारी नौकरियों का वायदा करते हैं ? उनका काम लक्ष्य रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना होता है | गुजरात , महाराष्ट्र , पंजाब , तमिलनाडु , कर्नाटक जैसे राज्यों में क्या अधिकाधिक लोग सरकारी नौकरियों में हैं ? इन प्रदेशों में अन्य राज्यों से अधिक प्रगति और सम्पन्नता का कारण उद्योग धंधें , कृषि का अधिक लाभकारी सदुपयोग रहा है | प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद इसीलिए निरंतर कौशल विकास , स्व रोजगार , सड़क , जल , मकान , और स्वास्थ्य की योजनाओं को सर्वाधिक प्राथमिकता दी | समस्या राज्य सरकारों द्वारा उनके क्रियान्वयन की है | अन्यथा हरियाणा , उत्तर प्रदेश , बिहार में ही नहीं कई राज्यों में सिपाही , शिक्षक , बाबु की सरकारी नौकरियों की भर्ती में गड़बड़ी भ्रष्टाचार के गंभीरतम अपराध हुए और ओमप्रकाश चौटाला सहित कई नेता – अफसर जालों में बैठे हैं | इसी तरह निजी क्षेत्र में भारतीय कंपनियों की तरह बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों को पिछड़े इलाकों में उद्योग लगाने के लिए पहले नेताओं – अफसरों की सेवा करनी पड़ती है और फिर स्थानीय स्तर पर भी जमीन , पानी , बिजली इत्यादि सुविधाओं की स्वीकृति के लिए महीनों भटकना पड़ता है |
नब्बे के दशक में मुझे बिहार में कुछ ऐसे प्रभावशाली लोग मिले , जिन्होंने बताया कि उद्योग लगाने या वहां बनाया सामान बेचने से होने वाली आमदनी से अधिक रिश्वत का आंकड़ा समझने के बाद उन्होंने बिहार को अपने व्यापारिक नक़्शे से हटा दिया | यही कारण है कि बिहार के लाखों योग्य मेहनती युवा देश के अन्य भागों या विदेशों में नाम और अच्छी कमाई करके सफल भी हो रहे हैं | स्वदेश वापसी के लिए उन्हें सही वातावरण और अवसर की प्रतीक्षा रहती है | इसलिए जनता का ही नहीं भारत के पूंजी निवेशकों या युवा उद्यमियों का विश्वास अर्जन बिहार के राजनेताओं की सबसे बड़ी चुनौती है |