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मेरी नज्में

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-नीलम सक्सेना चंद्रा
कुछ ग़म
ज़िंदगी ने मुझे
शाल की तरह उढ़ा दिए…
मैंने उन सभी शालों को
एक-एक कर नज्मों में बदल दिया
और उन नज्मों को एक पोटली में डाल
सूखने को रख दिया…
जैसे गृहिणी पापड बनाकर
छत पर सुखाने रख देती है,
और तैयार हो जाते हैं कच्चे पर करारे पापड, वैसे ही
कुछ दिनों बाद मैंने देखा तो पाया
नज्मों का गीलापन सूख गया था
और वो बन गयीं थीं
बेहद हसीं और खूबसूरत,
जिन्हें किसी भी किताब में
जायके के लिए
परोसा जा सकता था!