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क़ैद

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-नीलम सक्सेना चंद्रा
हाँ, बहुत खूबसूरत दिख रहा था वो
इंसान को,दुनिया को,
पर छलनी में फंसा हुआ चाँद
किसी तरह क़ैद से निकलने के लिए
तड़प रहा था…
उसे देखकर कितनी सखियों ने
उस दिन अपने उपवास भी तोड़ दिया थे,
और उनके प्रीतम उनका हाथ पकड़ ले गए थे उन्हें भीतर
अपने हाथों से खाना खिलाने के लिए;
पर चाँद तो क़ैद था
छलनी में
और वो उसके पलकों के कोने से
आंसू की कुछ बूँदें
लुढ़ककर उसके गालों को गीला कर रही थीं!
न जाने कहाँ से
मुझे सुनाई दे गया उसका वो सुबकना
और मैं उसे सीढ़ी पर चढ़कर
ऊपर टंगी हुई छलनी में से निकाल दिया!
वो ख़ुशी-ख़ुशी आसमान में उड़ गया
और अपनी मदमस्त चाल में
घूमने लगा आवारा सा!
क़ैद किसे अच्छी लगती है-
चाहें वो कितनी भी खूबसूरत हो?