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फिर कोटखाई का दर्द

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कुछ समय तक हिमाचल के पन्नों से नदारद रहा कोटखाई कांड पुनः अपनी संवेदना व्यक्त कर रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर कमोबेश इसी तरह की दरिंदगी पर उछला माहौल कहीं बहुत पीछे इन यादों को छोड़ गया था, लेकिन जिस घर-परिवार ने पूरे घटनाक्रम के मंजर में आहें भरी हैं उन्हें मालूम है कि जांच के लंबे दायरों के बावजूद संदेह के साये दूर नहीं हुए। अंततः एक बार फिर मामला हाई कोर्ट के पास अपनी सिसकियों के बीच फरियाद कर रहा है कि माननीय अदालत की निगरानी में परतें हटाई जाएं। पीडि़ता का परिवार इस दौरान सुप्रीम कोर्ट तक गया और अब सर्वोच्च अदालत के दिशा-निर्देश के अनुसार फिर से शिमला स्थित हाई कोर्ट के सामने हाजिर है। एक लंबी फेहरिस्त में उलझे जांच के सिलसिले, जनाक्रोश के बारूदी सफर पर झुलसी पुलिस और बेआबरू होकर निकली सीबीआई की पड़ताल के बाद तकरीबन चार साल से अंधेरों को सालता यह प्रकरण हमारी न्याय प्रणाली के सामने, पीडि़ता के परिवार को सिवाय हताशा के और क्या दे पाया। इस मामले में एक चिरानी की गिरफ्तारी और पुलिस गवाही में एक व्यक्ति की मौत के अलावा ऐसा कुछ हासिल नहीं जो बता सके कि उस मनहूस घड़ी के वास्तविक शैतान कौन हैं। यह दीगर है कि पूरा प्रकरण राजनीति के दो ध्रुवों की आपसी खींचतान का चश्मदीद गवाह बना रहा और यह भी सही है कि सीबीआई जांच ने मुख्य बिंदुओं से मुख मोड़ते हुए तत्कालीन सरकार की जांच में इतनी मीन मेख निकाली कि पूरी की पूरी एसआईटी कलंकित हो गई। जाहिरतौर पर इस शर्मनाक घटनाक्रम ने न केवल एक बेटी को पूरे प्रदेश के सामने अति निर्लज्जता से छीन लिया, बल्कि जांच खुद हमाम बन गई। दूसरी ओर गुडि़या के परिवार को इस बीच सिवाय जिल्लत के क्या मिला। प्रकरण के नाम पर आंदोलित हिमाचल ने अगर सियासत के आरोपों में खुद को जाहिर किया, तो फिर राज्य की व्यवस्था में तो सभी पक्ष दोषी हुए। तत्कालीन वीरभद्र सरकार पर लगी तोहमतें अगर सच थीं, तो वर्तमान जयराम सरकार की प्राथमिकताओं में पीडि़ता के परिवार को ढाढस भी तो नहीं मिला। पुनः हाई कार्ट पहुंचा मामला केवल आंसू पोंछने की कवायद नहीं, बल्कि चार साल की शिकायतों का पिटारा भी है। इस पिटारे में सीबीआई जांच तथा तत्कालीन आक्रोश का पक्ष भी है, जो अब कन्नी काटकर खामोश बैठा है। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने अपनी ही प्रदेश सरकार को सलाह देते हुए गुडि़या कांड के प्रति संवेदना प्रकट की है। अगर यही संवेदना राज्य सरकार का पक्ष बन जाए, तो तमाम परतों में छिपा गुनाह या न्याय प्रक्रिया की बेडि़यां फिर से खुल जाएंगी। हालांकि शांता कुमार को पूरे मामले में अब तक की जांच, पुलिस के तरीके और रफ्तार पर शक है, लेकिन हकीकत यह भी है कि वर्तमान सरकार के पिछले तीन सालों में ऐसी कोई उल्लेखनीय पैरवी नहीं हुई जिससे मामले के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती। आश्चर्य यह कि हिमाचल में भाजपा नेताओं ने कंगना रणौत के मुंबई कार्यालय के अवैध छज्जे के टूटने पर तो मातम मनाया, लेकिन जिस हिमाचली परिवार के आंगन में बेटी की मौत और जांच का श्मशान सरीखा माहौैल रहा है, उसके पक्ष में अपनी सरकार को कोई सलाह तक नहीं दी। बेशक हाथरस कांड की सुर्खियों में भी एक पक्ष भाजपा का होगा, लेकिन कोटखाई प्रकरण से पीछे हटने से राजनीति के हाथ साफ नहीं होंगे। हमारा मानना है कि अगर तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने दोषियों को तथाकथित रूप से बचाया तो गलत था, लेकिन भाजपा की वर्तमान सत्ता ने अगर तीन साल में जांच के गौण पक्ष को नहीं जगाया, तो यह मुद्रा भी सही नहीं। यह राज्य की लगातार नालायकी तथा कानून व्यवस्था के अध्यायों की कालिख है कि एक मनहूस कांड पर हम चार साल बाद भी पीडि़ता के परिवार को न्याय नहीं दिला पा रहे हैं। दूसरे मायनों में यह प्रदेश की कानून व न्याय व्यवस्था पर ऐसा प्रश्नचिन्ह चस्पां करता है, जो हर घर की इज्जत की परेशानी का सबब बन सकता है।