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महात्मा गांधी और अम्बेडकर के वैचारिक मतभेद

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आर.के.पालीवाल

गांधी और अम्बेडकर के जीवन और विचारों में कई मूल भूत अंतर थे जिनके कारण इन दो विभूतियों में कभी बहुत लंबे समय तक अच्छा तालमेल नहीं हो सका था। इन मूलभूत वैचारिक अंतरों को निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत देखा जा सकता है –
व्यक्तिगत जीवन अनुभव :
अम्बेडकर छुआछूत के भुक्तभोगी थे इसलिए वे हिन्दू धर्म की इस कुरीति से इतने आक्रोशित थे कि वे इस बुराई की जड़ वर्ण व्यवस्था और जाति को शीघ्रातिशीघ्र खतम करना चाहते थे। गांधी भी छुआछूत की विकृत परंपरा को हिन्दुओं का सबसे बड़ा कलंक मानते थे और इससे त्रस्त दलितों के प्रति मार्मिक संवेदनशीलता रखते थे, लेकिन वे सवर्ण हिन्दुओं का हृदय परिवर्तन कर इस गलत परंपरा को समाप्त करने के पक्षधर थे।
ब्रिटिश राज के प्रति व्यवहार :
ब्रिटिश शासन के प्रति शुरुआत में गांधी का रुख नरम था लेकिन 1919 – 20 से गांधी का व्यवहार ब्रिटिश शासन के प्रति निरंतर कठोर होता चला गया था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ किए गए गांधी के सत्याग्रह समय के साथ साथ ज्यादा प्रभावशाली होते चले गए थे। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन के प्रति अंत तक नरम रहे। वे कांग्रेस के नरम दल की तरह संवैधानिक तरीके से अपनी मांग रखते हुए विशेष रूप से दलितों की समस्या के समाधान के लिए ब्रिटिश शासन के प्रति हमेशा उदार रहे। उनका कहना था कि भारत आजाद होना चाहिए लेकिन उससे पहले दलितों की समस्या का समुचित समाधान होना चाहिए।
स्वराज और आजादी के प्रति :
गांधी कांग्रेस की तरह पहले भारत के लिए अंग्रेजी शासन से मुक्ति चाहते थे ताकि स्वराज आने पर दलित समुदाय की समस्या सहित आपसी समझबूझ से देश की तमाम समस्याएं सुलझाई जा सकें। अम्बेडकर पहले दलित समुदाय की समस्याओं का समाधान चाहते थे। उनका मानना था कि स्वराज का दलितों के लिए तब तक कोई महत्व नहीं है जब तक सदियों से चली आ रही उनकी विभिन्न समस्याएं दूर नहीं होती। उन्हें आजादी के बाद कांग्रेस शासन पर दलित समुदाय की समस्याएं सुलझाने का विश्वास नहीं था।
छुआछूत और दलित उत्थान के प्रति :
गांधी दलित समुदाय के लिए सामाजिक सुधार,मसलन मन्दिर प्रवेश , दलितों के लिए कुएं और सड़कों के इस्तेमाल पर पाबन्दी हटाने आदि के लिए जनता से अपील करने पर जोर देते थे। अम्बेडकर दलितों के लिए कानून, समानता के अधिकार और समुचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी सेवाओं में नौकरी, कोई भी व्यवसाय करने की छूट, शिक्षा एवं समाज में बराबरी आदि की वकालत करते थे। वे जाति व्यवस्था को जड़ से खत्म करने के पक्षधर थे।
धर्म और विशेष रूप से हिन्दू धर्म के प्रति :
गांधी धार्मिक व्यक्ति थे। वे धर्म के मामले में उदार सर्व धर्म समभाव का भाव रखते थे, उन्हें अपने हिन्दू धर्म से जुड़ाव था लेकिन अपनी प्रार्थना में हर धर्म के संदेश सम्मिलित करते थे। अम्बेडकर हिन्दू धर्म के कटु आलोचक थे। वे मनुस्मृति जैसे धर्म ग्रंथों से नफरत करते थे जिनमें वर्ण के आधार पर मनुष्यों के साथ भेदभाव करना बताया है। वे दलितों के लिए धर्म परिवर्तन की आवश्कता पर बल देते थे।उन्होंने हिन्दुओं के मन्दिर, देवता और त्योहार आदि के त्याग का भी आव्हान किया था और जीवन की अंतिम अवस्था में हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था ।
वर्ण और जाति व्यवस्था के प्रति :
गांधी वर्ण और जाति व्यवस्था के प्रति उदार थे। बाद के वर्षों में उन्होंने अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने की अपील की थी लेकिन वे इसके खात्मे की बात नहीं करते थे।अम्बेडकर वर्ण और जाति व्यवस्था को हिन्दू धर्म की पतनशीलता का प्रमुख कारण मानते थे और इसकी कटु आलोचना करते थे और इसकी पूर्ण समाप्ति चाहते थे।
सवर्ण हिन्दुओं के प्रति :
गांधी सवर्ण हिन्दुओं के हृदय परिवर्तन के लिए अपील करते थे जिससे वे छुआछूत को अविलंब बन्द करें और अंतर्जातीय विवाह करके समाज को प्रगतिशील बनाएं। अम्बेडकर दलितों के साथ बराबरी के अधिकार की बात करते थे और वे इसे सवर्ण हिन्दुओं से दया या भीख के रूप में स्वीकारने के बजाय कानूनन अधिकार से हासिल करने के पक्षधर थे।
पश्चिमी सभ्यता के प्रति :
गांधी और अम्बेडकर ने लंदन से बैरिस्टरी की पढ़ाई के दौरान वहां की पाश्चात्य संस्कृति को काफी हद तक आत्मसात कर लिया था और अपनी युवावस्था में दोनों पश्चिमी सभ्यता से काफी हद तक अभिभूत थे। यहां तक कि उनकी वेशभूषा भी पूरी तरह पश्चिमी हो गई थी।
समय के साथ साथ गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के समय ब्रिटिश शासन के भेदभाव को बहुत नजदीक से महसूस किया था तो उनके सिर से पश्चिमी सभ्यता का भूत उतरने लगा था और 1909 में हिंद स्वराज लिखते समय वे पश्चिमी सभ्यता के कटु आलोचक और भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक बन गए थे। बाद में भारत वापसी पर जैसे जैसे वे भारतीय जनमानस के बीच गहरे उतरते चले गए (विशेष रूप से चंपारण सत्याग्रह के समय से) ब्रिटिशर्स के प्रति उनका मोहभंग लगातार बढ़ता चला गया था।
अम्बेडकर इस मामले में काफी स्थिर रहे। उनकी नजर में पश्चिमी संस्कृति हमेशा चमकदार रही। उन्होंने अंतिम समय तक उसका साथ नहीं छोड़ा।संभवत: यही सबसे बड़ा कारण रहा कि उनके और गांधी के बीच खिंची वैचारिक मतभेद की दीवार भी अंत तक बरकरार रही।
पश्चिमी सभ्यता और बड़ी मशीनो के प्रति भाव :
हिंद स्वराज में गांधी भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पाश्चात्य संस्कृति से बहुत बेहतर मानते थे। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए वे बड़ी मशीनों को मनुष्य की बेरोजगारी और गरीबी का प्रमुख कारण मानते थे। अम्बेडकर अपने साथ हुए छुआछूत के कटु अनुभव के कारण भारतीय संस्कृति से आहत और आक्रोशित थे। उन्होंने युरोप में विशेष रूप से फ़्रांसीसी क्रांति और तुर्की की आधुनिक सभ्यता की अक्सर तारीफ की थी। वे बड़ी मशीनों पर आधारित औधौगिक क्रांति के भी प्रबल समर्थन में थे।
समाज सुधार के काम करने की गति :
गांधी सहज रूप से सबको साथ लेकर समाज में स्थाई बदलाव के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं। वे लोगों के हृदय परिवर्तन में विश्वास करते हैं और मानते थे कि अभी ब्रिटिश शासन ने अपना राज लंबा खींचने के लिए भारत के लोगों को एक दूसरे से अलग करने की रणनीति अपनाई है इसलिए आजादी के बाद हम लोग मिल बैठकर इस मुद्दे पर और ज्यादा तेजी से सुधार कर सकते हैं। अम्बेडकर तेज गति से राजनैतिक, धार्मिक , सामाजिक और आर्थिक सुधार चाहते थे इसलिए वे दलितों के लिए हर दिशा में तेजी के साथ संघर्ष पथ पर अग्रसर थे।
पसंदीदा विभूति :
गांधी के विचारों पर जिन विभूतियों का सबसे ज्यादा प्रभाव था वे सभी आध्यात्मिक और बौद्धिक उदारवादी राजनीतिक हस्तियां थी। इनमें उन पर सबसे ज्यादा प्रभाव टालस्टाय, जॉन रस्किन , रायचंद जैन और गोपाल कृष्ण गोखले आदि का था। इसके बरक्स अम्बेडकर गौतम बुद्ध, कबीर, ज्योतिबा फूले, तुर्की के आधुनिक शासक कमाल पाशा , इटली के शासक मुसोलिनी, फ्रांसीसी क्रांति और नॉर्थ अमेरिका के नीग्रो आंदोलन के नायकों से अधिक प्रभावित थे जो तेजी के साथ समाज में आमूल चूल परिवर्तन चाहते थे।
अंग्रेजी के प्रति रुख :
आजाद भारत के लिए गांधी आम जनता द्वारा बोली और समझी जाने वाली हिंदी उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी भाषा के पैरोकार थे और मातृ भाषा में अध्ययन की वकालत करते थे। उनके लिए अंग्रेजी बहुत महत्वपूर्ण नहीं थी। अम्बेडकर अंग्रेजी की ज्ञान संपदा और वैश्विक पृष्ठभूमि के कारण देश के विकास और प्रगतिशील सोच के लिए अंग्रेजी को महत्वपूर्ण मानते थे।
गांवों के प्रति भाव :
गांधी की आजाद भारत की परिकल्पना में गांवों की केंद्रीय भूमिका थी, दूसरी तरफ अम्बेडकर गांवों को छुआछूत जैसी सामाजिक समस्याओं की जड़ मानते थे। अम्बेडकर शहरों को प्रगतिशील मानते थे जहां लोगों के मध्य बेहतर सामाजिक समरसता रहती है।