Home Alok Mehta संघ , समाज , राजनीति और पत्रकारिता के रिश्ते

संघ , समाज , राजनीति और पत्रकारिता के रिश्ते

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-आलोक मेहता
इन पांच दशकों में बड़े उताव – चढ़ाव के दौर रहे हैं | इसलिए प्रतिबन्ध के अंतिम दौर के बाद 1977 से संघ को लेकर रहे आग्रह , दुराग्रह , तीखी आलोचना , सराहना और समर्थन का दिलचस्प प्रदर्शन देखने को मिला है | संघ का शीर्ष नेतृत्व सत्ता की राजनीति से अपनी निश्चित दूरी हमेशा व्यक्त करता रहा है |
विजया दशमी का दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का स्थापना दिवस भी है | पत्रकारिता के अपने पचास वर्षों के कार्य के दौरान संघ की विचार धारा , सफलता , कमजोरियों , पक्ष – विपक्ष , सत्ता से विरोध या सहयोग , प्रतिबन्ध और विस्तार को समझने , शीर्ष सर संघचालकों से औपचारिक इंटरव्यू , संघ से जुड़े अन्य प्रचारकों , शिक्षाविदों तथा सम्पादको से मिलने बातचीत के अवसर मिले हैं |इसलिए अब संघ से ही शिक्षित दीक्षित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सहित अनेक स्वयंसेवकों – नेताओं के निरन्तरर छह वर्षों से राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में रहने , देश के बदलते वैचारिक सामाजिक राजनीतिक स्वरुप और अंतर्राष्टीय स्तर पर ऐतिहासिक मान्यता के दौर में विजया दशमी पर प्रकाशन की सीमित शब्द संख्या की सीमा में के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों की चर्चा करना उचित लग रहा है |
इन पांच दशकों में बड़े उताव – चढ़ाव के दौर रहे हैं | इसलिए प्रतिबन्ध के अंतिम दौर के बाद 1977 से संघ को लेकर रहे आग्रह , दुराग्रह , तीखी आलोचना , सराहना और समर्थन का दिलचस्प प्रदर्शन देखने को मिला है | संघ का शीर्ष नेतृत्व सत्ता की राजनीति से अपनी निश्चित दूरी हमेशा व्यक्त करता रहा है | सरसंघचालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह जी ने 4 अक्टूबर 1997 को एक लम्बे इंटरव्यू के दौरान मुझसे कहा था – भारतीय जनता पार्टी के कार्यों में संघ के सक्रिय हस्तक्षेप की बात ठीक नहीं है | संघ के सामाजिक कार्यों का बहुत तेजी से वबस्तगार हुआ है | विश्व हिन्दू परिषद् , वनवासी कल्याण आश्रम , विद्या भारती , संस्कार भारती जैसे हमारे अनेक संगठनों की गतिविधियां राष्ट्रीय स्तर पर लाखों लोगों को जोड़े हुयेड ह्नै | इतनी गतिविधियों के चलते भाजपा के करिहों में हस्तक्षेप की कल्पना भी नहीं की जा सकती है | भाजपा के कई नेता संघ से ही आगे बढे हैं |उनके संस्कार और विचार तो वही हैं | वे अपने संगठन की चिंता स्वयं करते हैं | 1977 में जब जनसंघ जनता पार्टी में विलय हुई थी , तब से हमने यह नीति तय कर ली थी |
जून 2003 में सरसंघचालक श्री सुदर्शनजी ने भी मुझे एक इंटरव्यू में लगभग यही बात दोहराई | तब अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान मंत्रित्व में भाजपा सत्यता में थी | सुदर्शनजी ने कहा – भाजपा संघ की राजनीतिक विंग नहीं है | संघ व्यक्ति तैयार करता है | हम अप्न्मे कार्यकर्ताओं से केवल तीन चार अपेक्षा रखते हैं – हिंदुत्व का स्वाभिमान , हिंदुत्व का ज्ञान , अपना समय और शक्ति लगाने की योग्यता , दायित्व निभाने की तैयारी तथा अनुशासन का भाव |” वर्तमान सरसंघचालक तो पत्रकार सम्मेलनों , सभाओं में भी यही बात कह रहे हैं | इस दृष्टि से अटलजी , मुरली मनोहर जोशी , नरेंद्र मोदी , राजनाथ सिंह , नितिन गडकरी , जैसे नेता सत्ता में आये हों अथवा नानाजी देशमुख , कुशाभाऊ ठाकरे , सुन्दर सिंह भंडारी , दत्तोपंत ठेंगड़ी ने मूलभूत आदर्शों
और विचारों को बनाए रखकर अपने अपने ढंग से राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ क्रांतिकारी कदम उठाकर देश को एक नई दिशा अवश्य दी है | उनके निर्णयों पर चाहे अंदरूनी अथवा बाहरी मत भिन्नता भी रही है | लोकतंत्रा में ऐसा होना स्वाभाविक है | प्रधान मंत्री , मुख्यमंत्री अथवा संगठन के प्रमुख पदों पर रहने वाले क्या सबको प्रसन्न और संतुष्ट कर सकते हैं ? महात्मा गाँधी के सबसे घनिष्ठ माने जाने वालों की मत भिन्नता भी सार्वजानिक रही है | इसलिए जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 से मुक्ति दिलाने , तीन तलाक की कुप्रथा को क़ानूनी रूप से ख़त्म करने , अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण प्राम्भ करने जैंसे ऐतिहासिक कदमों के बाद संघ को मोदी सरकार से नाराजगी क्यों हो सकती है ? भाजपा में किसको कितना महत्व मिले या सरकारतों के दैनंदिन कामकाज में संघ क्यों हस्तक्षेप करना चाहेगा | हाँ जब नेता महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए संघ के शीर्ष नेताओं से संपर्क और सलाह करना चाहते होंगें , तो क्या उन्हें इंकार करना भी उचित माना जाएगा? इसलिए यह मानकर चलना चाहिए कि संघ अपने उद्देश्यों में धीमी गति से सही बहुत सफल होता गया है |
ऐसा नहीं है कि कई अवसरों पर मुझे भी जनसंघ , भाजपा और संघ के नेताओं के बीच लगभग टकराव जैसी स्थितियां नहीं दिखाई दीं या संघ भाजपा के कुछ नेता उनके मूल आदर्शों से नहीं भटके ,और निकले | उन्होंने अपनी मनमानियों से भाजपा और भारतीय राजनीति को भी नुक्सान पहुँचाया | बलराज मधोक से लेकर गोविंदाचार्य तक के उदाहरण मिल सकते हैं | इस सन्दर्भ में पत्रकारिता – आजकल जिसे मीडिया कहा जाना ठीक होगा , ने भी अंतर्द्वंद्वों को अलग अलग रंग ढंग से प्रस्तुत किया है | यदि आपका पूर्वाग्रह है तो आप सर्वाधिक सराहना या सर्वाधिक कमियां बुराइयां रेखांकित कर सकते हैं | तटस्थ भाव होने पर संघ हो या कोई सरकार या नेता स्पष्ट राय पर आपत्ति नहीं कर सकेगा | इस बात को मैं अपने अनुभव के आधार पर एक रोचक तथ्य से रखना चाहूंगा | जब मैं 1971 में हिन्दुस्थान समाचार के पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में दिल्ली आया , तब संस्था के प्रमुख बालेश्वर अग्रवाल संघ प्रधान समपादक थे |
समाचार एजेंसी संघ से जुड़े प्रचारकों द्वारा ही स्थापित थी | लेकिन इंदिरा गाँधी की केंद्र सरकार से लेकर विभिन्न प्रदेशों की सरकारों ने न केवल उसकी सेवाएं लेकर उसे आगे बढ़ने दिया , बालेश्वरजी सहित कई पत्रकारों के कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से अच्छे संपर्क सम्बन्ध रहे | उन्होंने ही मुझे डी पी मिश्रा , जगजीवन राम , सत्यनारायण सिन्हा , विद्याचरण शुक्ल जैसे नेतगाओं से मिलवाया , ताकि मुझे उनसे अधिकाधिक सूचना – समाचार मिल सकें | दूसरी तरफ संघ से ही जुड़े भानु प्रताप शुक्ल , देवेंद्र स्वरुप अग्रवाल , के आर मलकानी , अच्युतानन्द मिश्र जैसे संपादक पांचजन्य सहित विभिन्न प्रकाशनों में भाजपा के कुछ नेताओं और उनके कदमों की तीखी आलोचनाएं भी लिखते छापते रहे | मैंने जिन सम्पादको के साथ काम किया – मनोहर श्याम जोशी , राजेंद्र माथुर , विनोद मेहता कभी संघ में नहीं रहे और उसके कुछ कदमों के आलोचक भी रहे , लेकिन संघ – भाजपा के नेताओं ने हमेशा उनका सम्मान किया , बात की , संघ के कार्यक्रमों में आमंत्रित भी किया | इसमें कोई शक नहीं कि प्रारम्भिक दौर में संघ अपनी गतिविधियों को प्रचारित प्रसारित करने से बचता था | इस कारण सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं मीडिया में भी भ्रांतियां रहती थी | देर सबेर शायद संघ के नेताओं ने यह बात समझी | इंटरव्यू , पत्रकार वार्ताओं तथा अन्य माध्यमों से अपनी सकारात्मक गतिविधियों और कट्टरता नहीं होने , , मुस्लिम समाज को अपना यानी भारत का अभिन्न अंग मांनने की बातें रखीं | फिर भी संघ से निकले कुछ लोगों ने अन्य संगठन खड़े कर कट्टर विचारों को प्रचारित कर रखा है | उसे अपवाद ही कहना चाहिए | आखिर मोहम्मद अली जिन्ना भी कभी महात्मा गाँधी के अनुयाई कहते थे | समाज को विभाजित करके कोई संगठन या देश तरक्की नहीं कर सकता है | विजय के लिए अद्भुत शक्ति के साथ उदार ह्रदय , उदार नीतियां ,समाज के व्यापक हितों की रक्षा करना ही श्रेयस्कर मार्ग है |