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धर्म और ईश्वर: स्वामी विवेकानंद

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यही पूजा-पाठ है, नर- नारी का रूप धारण करने वाले प्रभु की सेवा, पूजा है। प्रेम कभी निष्फल नहीं जाता। चाहे आज हो, चाहे कल, चाहे सैकड़ों युगों के पश्चात प्रेम की विजय होगी और जरूर होगी। क्या तुम मनुष्य जाति से प्रेम करते हो? भगवान की खोज में कहीं जाते हो। दरिद्र दुखिया और दुर्बल क्या ये सभी तुम्हारे ईश्वर नहीं हैं। पहले उनकी उपासना क्यों नहीं करते। गंगा किनारे रहकर कुआं किसलिए खोदते हो। प्रेम की सर्वशक्तिमान पर विश्वास करना सीखें। क्या तुम्हारे हृदय में प्रेम है। यदि है, तो तुम सर्वशक्तिमान हो। क्या तुम्हें एक भी कामना नहीं कामनाओं से बिलकुल विहीन हो। यदि ऐसा है, तो तुम्हारी शक्ति को रोकने की सामर्थ्य किसमें है। अपने चरित्र के बल से मनुष्य सब जगह विजयी हो सकता है। भगवान अपनी संतान की रक्षा समुद्र के भीतर किया करते हैं। तुम्हारी मातृभूमि वीर मांगती है। तुम लोग वीर बनो। जिनकी समदृष्टि हो गई है, वे ब्रह्म में अवस्थित माने जाते हैं। सब प्रकार की घृणा का अर्थ है आत्मा के द्वारा आत्मा का विनाश। प्रेम ही जीवन का यथार्थ नियामक है।
प्रेमावस्था को प्राप्त करना सिद्धावस्था है, किंतु हम जितना ही सिद्धि की ओर अग्रसर होते हैं, उतना ही कम काम करते हैं। सात्विक व्यक्ति समझते और देखते हैं कि सब कुछ खिलवाड़ मात्र है, इसीसे वे किसी चीज में सिर नहीं खपाते।
निर्विघ्न उद्देश्य सिद्धि के लिए चटपट कोई काम कर डालना उचित नहीं सिद्धि प्राप्ति के लिए इन तीन गुणों पवित्रता, सहनशीलता और अध्यवसाय और सबसे अधिक प्रेम की आवश्यकता है। जो धर्म, जो ईश्वर विधवाओं के आंसू नहीं पोंछ सकता अथवा बिना माता-पिता वाले अनाथ के मुंह में रोटी का एक टुकड़ा नहीं दे सकता, उस धर्म अथवा ईश्वर पर मैं विश्वास नहीं करता। मतवाद, मत-मतांतरों की चर्चा कितनी ही सुंदर क्यों न हो, उसमें कितने ही गंभीर दार्शनिक तत्त्व क्यों न भरे हों, जब तक वह मतवाद पुस्तकों में आबद्ध है, तब तक मैं उसे मानता ही नहीं। हमारी आंखें पीठ की ओर नहीं सामने हैं अतएव सामने के उपदेशों को कार्य में परिणत करके दिखाओ। धर्म और ईश्वर शब्द से अनंत शक्ति का बोध होता है। दुर्बलता और दासता को छोड़ो। यदि तुम मुक्त स्वभाव हो जाओ, तभी तुम केवल मात्र आत्मा हो, मुक्त स्वभाव होने पर अमृत तत्त्व तुम्हारी मुट्ठी में आ जाएगा। मुक्त स्वभाव होने वाला ही ईश्वर है। मैं न मुक्ति चाहता हूं न भक्ति मैं महारौरव नरक में भी जाने को तैयार हूं। ‘वसंतवल्लोकारहिंत चरत’ बसंत जिस तरह