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सनातनी हिन्दू गांधी की दुनिया

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-शशि तिवारी
एक फर्जी सनातनी ने सच्चे सनातनी को मार डाला। दरअसल, हिन्दू धर्म की उनकी अवधारणा क्रांतिकारी अवधारणा थी, जो तथाकथित हिनुदूवादियों को पसंद नहीं थी। उनकी हिन्दू धर्म की अवधारणा में महिलाओं, दलितों और यहां तक कि विदेशियों तक के लिए जगह थी, जबकि हिन्दू समाज की धार्मिक परंपरा में उनके लिए कोई जगह नहीं थी और यदि थी भी, तो हाशिये पर।
गांधी जी को किसी खास दायरे में बांधकर यानी केवल एक पहचान में बांधकर उस जादुई असर की काट पहले भी होती रही है, जैसी कोशिश आज कल दिखाई दे रही है। यह जादुई असर तब लोगों के सिर चढ़कर बोलता था और आज समाज के अंतर्मन में बसता है। दिलचस्प है कि इस कोशिश में वे सब साथ आ जुटे थे, जो किसी भी बात में एक-दूसरे के साथ नहीं थे। सनातनी हिन्दू और पक्के मुसलमान दोनों इस बात पर एकमत थे कि गांधी को उनके धार्मिक मामलों में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। लेकिन बापू ने भी कभी माना कि उनके यह अधिकार नहीं है? विडंबना यह कि एक सनातनी हिन्दू गोड्से ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। एक फर्जी सनातनी ने सच्चे सनातनी को मार डाला। दरअसल, हिन्दू धर्म की उनकी अवधारणा क्रांतिकारी अवधारणा थी, जो तथाकथित हिनुदूवादियों को पसंद नहीं थी। उनकी हिन्दू धर्म की अवधारणा में महिलाओं, दलितों और यहां तक कि विदेशियों तक के लिए जगह थी, जबकि हिन्दू समाज की धार्मिक परंपरा में उनके लिए कोई जगह नहीं थी और यदि थी भी, तो हाशिये पर। इसलिए जब गांधी ने हिन्दू धर्म का दरवाजा सबके लिए खोल दिया, तो पारंपरिक औऱ जड़बुद्धि हिन्दू बिलबिला उठे और वे गांधीजी की जान के दुश्मन बन बैठे। मालूम हो कि गोड्से ने उनकी हत्या के लिए मूल रूप से मुसलमानों के प्रति उनके प्यार को ही जिम्मेदार ठहराया था।
महात्मा गांधी का विश्वास था कि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। एक बार उनसे हिन्दू धर्म की परिभाषा पूछी गई, तो उनका जवाब था, “मैं एक सनातनी हिन्दू हूं, लेकिन मैं हिन्दू धर्म की व्याख्या नहीं कर सकता। हां. एक समान्य मनुष्य की तरह मैं कह सकता हूं कि हिन्दू धर्म सभी धर्मों को सब तरह से समान समझता है। मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी। जैसा मैंने समझा है, हिन्दू धर्म की विशिष्टता यह है कि उसने सभी धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। मैं अपने को सनातनी हिन्दू कहता हूं, क्योंकि मैं वेदों, उपनिषदों समेत समस्त हिन्दू शास्त्रों में विश्वास करता हूं औऱ इसीलिए अवतार और पुनर्जन्म में भी मेरा विश्वास है। मैं वर्णाश्रम धर्म में विश्वास करता हूं, लेकिन उन अर्थों में विश्वास करता हूं, जो पूरी तरह वेद-सम्मत है, लेकिन उसके वर्तमान प्रचलित औऱ भोंडे रूप को नहीं मानता। मैं गोरक्षा में विश्वास करता हूं, लेकिन प्रचलित अर्थ में नहीं, बल्कि व्यापक अर्थ में। मूर्ति पूजा में मेरा विस्वास नहीं है।”
लेकिन इसके बावजूद गांधी का हिन्दू धर्म या उनका हिन्दूत्व देश के तत्कालीन प्रमुख हिन्दू संगठनों – हिन्दू महासभा औऱ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दूत्व से अलग था। इन हिन्दू संगठनों का प्रमुख या कि अंतिम लक्ष्य हिन्दू भारत की स्थापना था। इसके विपरीत गांधी के विचारों, कर्मों और उद्देश्यों में हिन्दू भारत कभी नहीं रहा। उनकी प्रर्थना सभाओं में कुरआन का भी पाठ होता था। गीता औऱ बाइबिल उनके लिए समान महत्व की पुस्तकें थीं। गांधी का भारत हिन्दू भारत न होकर वह भारत था, जिसमें समस्त स्तरों पर समानता के साथ देश के समस्त धर्मों, जीवन पद्धतियों, उपासना पद्धतियों और रीति-रिवाजों का समावेश हो। लेकिन हिन्दू संगठनों को गांधी का यह भारत स्वीकार नहीं था। उनके पास हिन्दू भारत की अपनी कुछ धुंधली तस्वीरें और अस्पष्ट व्याख्याएं थीं। उनका हिन्दू भारत का स्वप्न अपर्याप्त या अधूरे या अप्रमाणिक इतिहास के साथ सदैव भ्रम में विचरण करता था और आज भी कर रहा है। कमोबेश उसी तरह, जिस तरह पाकिस्तान के समर्थकों और जिन्ना के पास विभाजन के समय तक भी पाकिस्तान के संपूर्ण ढांचे, स्वरूप, भविष्य आदि को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी। इन हिन्दू संगठनों का हिन्दूत्व जिस हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति की महानता और गौरव से पैदा हुआ था औऱ जिससे प्रेरणा पाता था, उसका अंतिम सार्रवभौम राज्य लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले खत्म हो चुका था।
यहां इस बात का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि गांधी ने जिस हिन्दू धर्म का आत्मसात किया था वह कोई रातोंरात संभव नहीं हुआ था, बल्कि वह उनकी एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा का परिणाम था। धर्म में उनकी रुचि ईसाई पादरियों और अन्य धर्मों के धर्म प्रचारकों की संगति और उनके साथ संवाद से पैदा हुई था। 15 नवंबर, 1927 को कोलंबो में हुई बौद्ध धर्म सभा को संबोधित करते हुए गांधीजी ने अपने जीवन के कुछ रोचक तथ्य साझा किए और बौद्ध धर्म के बारे में महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने बताया, “आपको शायद पता न हो कि मेरे बड़े बेटे ने मेरे ऊपर बौद्ध होने का इल्जाम लगाया है औऱ मेरे कुछ हिन्दू देशवासी भी यह कहने में नहीं हिचकते कि मैं सनातन हिन्दू धर्म की आड़ में बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहा हूं। मेरे बेटे द्वारा लगाए गए आरोप और हिन्दू मित्रों के इल्जाम के प्रति मेरी सहानुभूति है। सच कहूं तो कभी-कभी मैं बुद्ध का अनुयायी होने के इल्जाम से गर्व का अनुभव करता हूं और इस सभा में आज यह कहने में मुझे जरा भी हिचक नहीं कि मैंने बुद्ध के जीवन से बहुत-कुछ प्रेरणा पाई है।” आगे उन्होंने यह भी बताया कि बुद्ध के जीवन और उनके उद्देश्यों से तत्कालीन हिन्दू समाज में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ। अपनी अंतिम बात कहते हुए गांधी ने कहा, “गहरे चिंतन-मनन के बाद मेरी यह धारणा बनी है कि बुद्ध की शिक्षाओं के प्रमुख अंग आज हिन्दू धर्म के अभिन्न अंग बन गए हैं। गौतम बुद्ध ने हिन्दू धर्म में जो सुधार किए, उनसे पीछे हटना आज भारत के हिन्दू समाज के लिए असंभव है। अपने महान त्याग, वैराग्य और जीवन की निर्मल पवित्रता से गौतम बुद्ध ने हिन्दू धर्म पर अमिट प्रभाव डाला है और हिन्दू धर्म उस महान शिक्षक से कभी उऋण नहीं हो सकता।”
इसी तरह गांधी ईसाई धर्म से भी काफी प्रभावित थे। ईसाई धर्म प्रचारकों को तो ऐसा लगता था, जैसे गांधी जल्दी ही ईसाई बन जाएंगे। लेकिन जब ईसाई धर्म प्रचारकों ने उनके सामने ईसाई होने का प्रस्ताव रखा, तो गांधी ने कहा कि चूंकि हिन्दू धर्म में ईसाइयत के सभी तत्व पहले से ही मौजूद हैं, इसलिए उन्हें अपना धर्म बदलने की कोई जरूरत दिखाई नहीं देती। हिन्दू धर्म की उनकी इसी समझदारी का यह परिणाम था कि उपनिवेशवादी गोरों के खिलाफ उनकी लड़ाई में नैतिक खंबे के तौर पर ईसाई धर्मावलंबियों का एक समूह भी शामिल था। उनका हिन्दू धर्म किसी संप्रदाय की सीमा में बंधा हुआ नहीं था। उनकी हिन्दू धर्म की अवधारणा में इस्लाम, बौद्ध, ईसाई और जरथुस्त्र धर्म की सभी अच्छाइयां शामिल थीं।
गांधी के राम राज्य की अवधारणा की बड़ी आलोचना की जाती है। अनेक लोग और संगठन इसे हिन्दुत्ववाद से जोड़कर देखते हैं। इसके विपरीत जब गांधी ने कहा कि वे राम राज्य लाना चाहते हैं, तो प्रतिक्रियावादी हिन्दुओं में खुशी की लहर दौड़ गयी। यह सोचकर उनकी बांछें खिल गयीं कि गांधीजी अंतत: उनके पाले में आ ही गये, लेकिन उनकी यह खुशफहमी जल्दी ही तब काफूर हो गयी, जब उन्होंने कहकर स्पष्ट कर दिया कि उनका राम वह नहीं है, जो दशरथ क बेटा है। उनका कहना था कि आम जनमानस में एक आदर्श राज्य की कल्पना राम राज्य के नाम से बैठी है और वे उसी सर्वमान्य कल्पना का छुना चाहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि दुनिया का हर क्रांतिकारी जनमानस में पैबस्त मान्य प्रतीकों में नया अर्थ भरता है और उस माध्यम से उस नये अर्थ को समाज में मान्यता दिलाने का काम करता है। इस दृष्टि से गांधी का सनातन धर्म हिन्दू धर्म की जड़ता के खिलाफ एक क्रांतिकारी परिभाषा थी।