Home Delhi आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स में भारतीय भाषाओं के प्रयोग से आत्मनिर्भरता

आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स में भारतीय भाषाओं के प्रयोग से आत्मनिर्भरता

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नयी दिल्ली। भारतीय ज्ञान परम्परा एक विस्तृत अवधारणा है|यह एक व्यापक आयाम एवं दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक है| आज के समय में प्रचिलित कृत्रिम बुद्धिमत्ता, को यदि वास्तविक अर्थों में समझ कर परिभाषित किया जाए तो यह मानव मस्तिष्क की क्लोनिंग है|मानव मस्तिष्क में आने वाले भाव, उसका विभिन्न परिस्थितियों में व्यवहार, उसकी तर्क क्षमता एवं निर्णय लेने की प्रक्रिया ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स की कुन्जी है| मशीन स्वयं में निर्जीव है, किन्तु मानव मस्तिष्क उसे सॉफ्टवेयर एवं प्रोग्रामिंग के माध्यम से जो इनपुट उपलब्ध कराता है, उसका आउटपुट ही हमें आर्टिफिसियल इंटेलिजेन्स के अनुप्रयोगों के रूप में दिखता है| मशीन अथवा यन्त्र (रोबोट, कम्प्यूटर) की क्षमता उतनी ही प्रभावी होती है, जितना उसका निर्माता बुद्धिमान होता है |यदि इस क्षेत्र के वैज्ञानिक मस्तिष्क की क्रियाविधि को भावनात्मक रूप में समझ जाएँ तो इनके द्वारा बनाया गया रोबोट भी भावुक हो सकता है|यदि इनकी तर्कशक्ति प्रबल हो तो इनकी प्रोग्रामिंग में भी उस तर्कशक्ति का प्रतिविम्ब मशीन की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है |आजकल जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात हो रही है, उसकी कुछ सीमाएं भी है, जैसे एक रोबोट उतना ही कार्य कर सकता है, जितना उसका प्रोग्राम अथवा सॉफ्टवेयर उसे करने का आदेश देगा| सामान्यतया ये प्रोग्राम अनेक तथ्यों,अनुप्रयोगों, और उदाहरणों के आधार पर निर्मित किये जाते हैं| यदि परिस्थितयां बदल दी जाएँ तो ये मशीन अथवा रोबोट उस सीमा तक काम करेंगे, जिस सीमा तक उनमें परिस्थितियों की प्रोग्रामिंग की गयी है| यहाँ यह चिन्तनीय है कि विचार मूल रूप में हमें हमारी भाषाओं में ही आते हैं| विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भले ही कोई अन्य भाषा हो, किन्तु अमूर्त अथवा अव्यक्त अवस्था में वैचारिक प्रक्रिया व्यक्ति की मूल भाषा सापेक्ष है|यदि व्यक्ति को सॉफ्टवेयर की विधि का ज्ञान हो जाए तो व्यक्ति बिना किसी सम्पर्क भाषा के अपने मस्तिष्क की क्रियाविधि के इनपुट एवं आउटपुट को कृत्रिम रूप दे सकता है| यहाँ यह ध्यातव्य है कि विचार अभिव्यक्ति के रूप में एक भाषिक स्तर से दूसरे भाषिक स्तर पर जाते हुए धीरे धीरे अपनी तीव्रता एवं मौलिकता की दृष्टि से न्यून होते जाते हैं|अधिक भाषिक अन्तरण इनकी मूल भावना को ही नष्ट कर देता है| इस दृष्टि से विचारों की मौलिक भाषा का प्रयोग कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सर्वाधिक उपयोग कर अधिक दक्षतापूर्ण मशीन का निर्माण सम्भव होगा| मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है,उसके अनुभव जितने व्यापक होंगे, उतनी अधिक उसकी विचारशक्ति होगी|एक मनुष्य जो कई परिस्थितियों का चिन्तन अच्छे से करके उनमें क्या व्यवहार करना है, यह जानता है, वह सॉफ्टवेयर के ज्ञान एवं हार्डवेयर के समन्वय के साथ रोबोटिक्स, मशीन इंटेलीजेन्स में महारथ हासिल कर सकता है |इस तथ्य से यह स्पष्ट है कि आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स के तीन मुख्य घटक हैं 1- विचारणा शक्ति 2-सॉफ्टवेयर 3- हार्डवेयर| सम्पूर्ण विश्व में जहाँ भी इस विषय पर कार्य चल रहा है, उनमें तीनों घटक अलग रूप से कार्य करते हैं|इस कार्य का सबसे मुख्य घटक विचारणा शक्ति अथवा मानसिक संवेगों को क्लोन करना है| सॉफ्टवेयर का कार्य कोई भी दक्ष सॉफ्टवेयर इंजीनियर कर सकता है, और हार्डवेयर का कार्य कोई भी कम्पनी कर सकती है|अतः इसका मूल मानसिक संवेगों की क्लोनिंग करने में निहित है| व्यक्ति के विचार अथवा सोच के आंकड़े इसमें कच्चे माल अथवा मुख्य घटक का कार्य करते हैं|व्यवहार कुशलता एवं परिस्थितयों के त्वरित निदान में पूरे विश्व में भारत,चीन,जापान जैसे देशों का कोई सानी नहीं है|चीन में तुरंत किसी उत्पाद की नक़ल करने की प्रवृत्ति और भारत की चिन्तन पद्धति एवं विचारणा शक्ति दोनों से यह तथ्य सिद्ध होता है| अतः आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स का मुख्य घटक सबसे अधिक भारत,चीन,जापान जैसे देशों में उपलब्ध हैं|इसका उपयोग भारत पूर्ण रूप से नहीं कर पा रहा है, क्योंकि समेकित रूप में उसके ज्ञान के महत्त्व का उसे भान ही नहीं है,और असंगठित भारतीय प्रतिभा पलायन के माध्यम से अधिक धन कमाने की लालसा से वह ज्ञान लगातार उस देश को दे रहा है, जो सॉफ्टवेयर की दृष्टि से बहुत उन्नत है|यह ज्ञान केवल प्रतिभा पलायन के माध्यम से नहीं अपितु डेटा चोरी करने के माध्यम से भी अन्य देशों में जा रहा है|इसे एक उदाहरण के माध्यम से सर्वसाधारण को समझाया जा सकता है जैसे भोजन प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता है, किन्तु भोजन बनने तक की प्रक्रिया एक जटिल घटकों का समूह है |किसान खेती करता है,अभिकर्ता उसे मण्डी से खरीदते हैं, अभिकर्ता खुदरा बाजार में बेचता है, ग्राहक उसे खुदरा व्यापारी से खरीद कर भोजन बनाता है| अभिकर्ता के पास वह तन्त्र है, जो ग्राहक और किसान के बीच के प्रबन्धन हेतु आवश्यक है|इसलिए न किसान अपनी मेहनत के बराबर लाभ कमा पाता है, न अनाज का खुदरा व्यापारी, सबसे अधिक कमाई करता है अभिकर्ता, और महगाई की मार झेलता है ग्राहक| यही प्रवृत्ति विश्व में किसी भी तकनीक के साथ होती है, तकनीक की लॉबिंग जिसकी होती है, सर्वाधिक लाभ उसी का होता है|लॉबिंग उसकी होती है, जो अपने देश की प्रतिभाओं को तुष्ट करता है, जिस देश की प्रतिभाएं तुष्ट नहीं होती वहाँ सब कुछ अस्त व्यस्त रहता है|अतः अपनी भाषाओं के माध्यम से तन्त्र विकसित करके प्रतिभा पलायन को रोककर आत्मनिर्भरता की ओर द्रुतगति से गति की जा सकती है |
डा. आयुष गुप्ता