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श्री कालीनाथ कालेश्वर महादेव

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यूं तो देवभूमि हिमाचल में सैकडों मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन महाकाल मंदिर के बाद देशभर में जिला कांगड़ा स्थित धरोहर गांव गरली चंबापतन ब्यास तट के किनारे विराजमान विश्व ऐतिहासिक कालेश्वर महादेव एक ऐसा मंदिर है, जिसका शिवलिंग जमीन के नीचे यानी गृर्भगृह में स्थापित है। कालीनाथ मंदिर के साथ यहां बह रही ब्यास नदी का पानी विपरीत दिशा की ओर बहने से इस नदी का महत्त्व और भी विशेष हो जाता है, वहीं कालेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास अज्ञातवास के समय पांडवों व देवी-देवताओं की तपोस्थली से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि इस स्थल का गंगा नगरी हरिद्वार से भी जौं भर ऊंचा विशेष महत्त्व समझते हुए जिला कांगड़ा से ही नहीं, बल्कि हिमाचल के कोने-कोने से सैकड़ों लोग अपने मृत परिजनो की अस्थियां यहां जल विसजर्न करने आ रहे हैं। लॉकडाउन के बाद इस स्थल का महत्त्व और भी ज्यादा बढ़ गया है। बात करें, तो पहले यहां ब्यास नदी के किनारे चंद लोग ही अपने मृत परिजनो की अस्थियां विसजर्न करते थे, लेकिन अब समूचे हिमाचल के लोग यहां पहुंचकर यह कार्य कर रहे हैं। प्रदेश सरकार अगर कालेश्वर महादेव मंदिर व यहां ब्यास नदी पर गंगा नगरी हरिद्वार की तर्ज पर आने वाले लोगों की सुबिधा हेतु कोई उचित कदम उठाती है, तो न केवल हिमाचल भर के तमाम लोगों की इस स्थल से और भी ज्यादा आस्था बढ़ेगी, बल्कि पर्यटक दृष्टि से यहां प्रदेश के सैकड़ों बेरोजगार लोगों को भी रोजगार के साधन जुटेंगे। हिमाचल में मिनी हरिद्वार के नाम से विख्यात इस प्राचीन कालीनाथ कालेश्वर महादेवमंदिर में बैसाख मास यानी अप्रैल माह की संक्रांति के पावन अवसर पर इस तीर्थ स्थल पर पूजा-अर्चना एवं स्नान का विशेष महत्त्व है। लोगों का अटूट विश्वास है कि हरिद्वार एवं अन्य तीर्थ स्थलों की भांति ही इस पवित्र स्थल पर स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है।
उज्जैन के महाकाल मंदिर के बाद कालेश्वर एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसके गर्भगृह में ज्योर्तिलिंग स्थापित है। पांडवों से जुड़ा हुआ है मंदिर का इतिहास -कालेश्वर में स्थित श्री कालीनाथ मंदिर का इतिहास पांडवों से जुड़ा है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान इस स्थल पर पांडव भी यहां रुके थे, जिसका प्रमाण ब्यास नदी के तट पर उनके द्वारा बनाई गई पौडि़यों से मिलता है। कहा जाता है कि पांडव जब यहां आए, तो भारत के पांच प्रसिद्घ तीर्थों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक व रामेश्वरम का जल यहां तीर चलाकर एक ही जगह से निकाला था, जिसे आज ‘पंचतीर्थी’ स्नान सरोवर के नाम से जाना जाता है। तभी से पंचतीर्थी में स्नान को हरिद्वार स्नान के तुल्य माना गया है। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार ये एक तपस्वी स्थल है, इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि-मुनियों की समाधियों से मिलता है। इस मंदिर परिसर में भगवान शिव श्री कालीनाथ सहित नौ मंदिर तथा 20 मूर्तियां अवस्थित हैं।