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खड़े हो रहे चौराहे

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बेशक कंगना हिमाचल की बेटी है, लेकिन इससे पहले अब वह सियासत की बेटी है। यह इसलिए कि हिमाचल की बेटियां तो ऐसी न थीं कि किसी मुख्यमंत्री के पद पर थूक दें या बहादुर होने के यही मायने हैं तो कम से कम हिमाचल की अपनी एक सांस्कृतिक भाषा है, जो हर हिमाचली को देश के भीतर आदर-सत्कार दिलाती है। देश भर में हम से कहीं भिन्न अन्य प्रदेशों के लोगों से सलूक होता है, क्योंकि हर हिमाचली के साथ माटी की खुशबू का परिचय चक्र रहता है। यह गौरव की बात है, लेकिन जिस तरह कंगना बनाम उद्धव ठाकरे संवाद चल रहा है, उससे शायद ही हिमाचल का कोई अभिभावक सहमत हो और अगर ऐसा नहीं है तो कल हमारी ही कोई बेटी वैचारिक भिन्नता के कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री से ‘तू’ की भाषा में आदरहीनता ही नहीं दिखाएगी, बल्कि अपमान की संगत में हम मिलकर समाज को चौराहे पर बैठा देंगे। यही चौराहे खड़े हो चुके हैं और महाराष्ट्र के खिलाफ आंदोलित राजनीति ने हमें घसीट कर वहां पहुंचा दिया, जहां कल तक बिहार या उत्तर प्रदेश की चर्चा होती थी। सवाल कंगना के साथ खड़े होने का है, लेकिन पहले यह भी तो समझें कि उसके साथ कौन खड़ा है और अगर हिमाचल की याददाश्त वापस आ जाए तो याद करें कि कोटखाई प्रकरण की ऐसी ही लपटों ने पहली बार एक थाने को जला दिया था या सीबीआई ने पुलिस की पूरी एसआईटी टीम को जेल में डाल दिया था, लेकिन आज भी जांच खामोश है। क्या गुडि़या की मौत का गम कंगना के विद्वेष से कम है। क्या गुडि़या की मां की सिसकियों को मार कर हम कंगना की मां से देश के गृहमंत्री को मिलते सर्टिफिकेट को आदर्श मान लें। एक मां तो सिर्फ अपनी बेटी की वीभत्स हत्या की जांच चाहती-चाहती सन्नाटे में चली गई, लेकिन एक दूसरी मां हमें इसी बहाने बता रही है कि कांग्रेस से उनकी भाजपा यात्रा क्यों हुई या हृदय परिवर्तन की वजह क्या है। क्या मां भी कांग्रस और भाजपा के बीच बंट जाएगी। इसी तरह अगर हम कंबल हटाकर हिमाचली अपराध को देखना शुरू करें, तो यही घटनाक्रम अनेक बलात्कार, प्रताड़ना और हत्याओं की चीखों से भर जाएगा। कंगना के साथ खड़ा होना आज की सियासत या सोशल मीडिया के लिए सबसे कामयाब हथियार हो सकता है, लेकिन इससे कांग्रेस को सीधी चुनौती मिल चुकी है। विडंबना भी यही है कि जिस कोटखाई प्रकरण ने कांग्रेस की सत्ता का विध्वंस किया, उस पर भी पार्टी आज तक अपना पक्ष या विरोध नहीं जता सकी। यह कंगना अब महाराष्ट्र का एक किस्सा नहीं, भाजपा की सियासत का हिस्सा है। आगे की राजनीति में ऐसे कई जमूरे नाचेंगे और कांग्रेस बंदर बनकर उछल कूद करती रहेगी। कंगना बनाम ठाकरे के बीच जो ट्वीट युद्ध चला है, उसका एजेंडा स्पष्ट है। वहां बाबर है, अयोध्या है, जम्मू-कश्मीर है और पीओके भी है। कंगना ने शिव सेना के भीतर सोनिया सेना की पहचान कर रखी है, तो स्वाभाविक है कि भाजपा के हथियार औैर पैने होंगे। यहां एक बड़ा प्रश्न भी उभरता है और इसे इसकी पृष्ठभूमि में समझना होगा या उन पर्वतीय वर्जनाओं या अधिकारों में समेटना होगा, जो इस राज्य की तकदीर से जुड़ता है। कंगना की तरफदारी में हमारे मुख्यमंत्री का बाहर आना बता रहा कि राज्य की अब यह भी एक प्राथमिकता हो सकती है। क्या हिमाचल बनाम महाराष्ट्र कर देने से हमारी पृष्ठभूमि सुदृढ़ होती है या हिमाचली अधिकारों पर कमर कसने की जरूरत आज भी है। जिस राज्य में ‘इन्वेस्टर मीट’कराने के इरादे से शुरुआत हुई हो, उसके मुख्यमंत्री को आर्थिकी का ब्रांड एंबेसेडर तभी स्वीकार किया जाएगा, अगर हमारा राजनीतिक मानचित्र किसी राज्य से न टकराए। कभी तो हम चाहते हैं कि मुंबई का कारपोरेट जगत या फिल्म उद्योग हिमाचल को छांव दें, तो अब किस छवि से इस्तकबाल करेंगे। यह जान लीजिए कि कभी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में औद्योगिक क्रांतियां हुई थीं, लेकिन राजनीति के संकीर्ण उद्देश्यों ने सारा ढांचा उजाड़ दिया। आश्चर्य यह कि राजनीतिक कारणों से सत्तारूढ़ दल ने कंगना के समर्थन में गाहे बगाहे पूरा हिमाचल ही झोंक दिया। यह सही नहीं और न ही सारा हिमाचल सिर्फ कंगना हो सकता है।