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उत्तराखंड राज्य की अमूल्य संस्कृति और विरासत

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संस्कृति और विरासत:- उत्‍तराखण्‍ड की गौरवमयी लोक पारम्‍परिक एवं पौराणिक अध्‍यात्मिक लोक सांस्‍कृतिक विरासत भारत वर्ष में ही नहीं अपितु पूरे विश्‍व में अपना अलग स्‍थान रखती हैा अपने मुख्य आकर्षणों जैसे हिमालय, नदी- झरनों एवं घाटियों की सुन्दरता से परिपूर्ण है | यहाँ हिंदुओं की आस्था के प्रतीक चारधाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री स्थित हैं। अनादिकाल से यह भूमि भारती दर्शन, चिंतन, मनन, अध्‍यात्‍म, साधना तथा धर्म एवं संस्‍कृति का केन्‍द्र ही हैा भगवान शिव के और अनेक पवित्र मंदिरों के कारण उत्तराखंड हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थानों में गिना जाता है। धर्म और दर्शन के साथ-साथ यहां के साहित्‍य, कला एवं संस्‍कृति से जुडे हर पहलुओं ने भी सहस्‍त्र वर्षों से भारतीय संस्‍कृति को परिष्‍कृत किया हैा

 

 

 

 

 

उत्तराखंड में तमाम बड़े मंदिर और धार्मिक स्थल है जिसमे हरिद्वार, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमनोत्री, गंगोत्री, हेमकुंड साहिब और तुंगनाथ बेहद ख़ास है। रोजाना हजारों-लाखों की संख्या में तीर्थयात्री इस धार्मिक स्थलों के दर्शन हेतु उत्तराखंड का रुख करते है। इसके साथ साथ यहाँ बहुत से पर्यटक स्थल जैसे की औली, नैनीताल, फूलों की घाटी,मसूरी स्तिथ है।

 

 

 

 

 

  गढ़वाल का कुछ शब्दों में वर्णन करना कठिन है | देवभूमि नाम के अनुरूप यहाँ बड़ी संख्या में मंदिर एवं धार्मिक पर्यटन को देखा जा सकता है | उत्तराखंड राज्य की अमूल्य संस्कृति राज्य को वरदान स्वरुप प्राप्त है | महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा घाघरा हो या यहाँ का स्वादिष्ट व्यंजन “फाणा” हो, लोकनृत्य “लंगवीर” हो या लोकगीत “जोड्स”, यहाँ की हर चीज लोगों को आपस में एक अटूट बंधन में जोडती है|

 

 

 

 

 

 

 

कुमांउनी और गढ़वाली लोगों की जीवनशैली और रहनसहन में उनकी संस्कृति प्रदर्शित होती है | यहाँ पर इन दो प्रमुख समूह के अलावा

 

 

जौनसारी:-

 

 

 

 

बोक्सा:-
थारू:-
भोटिया और राजी भी प्रमुख जातीय समूह है | उत्तराखंड में ज्यादातर लोग सीढ़ीनुमा खेत एवं स्लेट छत वाले घरों में रहते हैं |गढ़वाली संस्कृति का मुख्य आकर्षण इतिहास, यहाँ के लोग, धर्म एवं नृत्य है जो की यहाँ पर राज्य करने वाले राजवंशो एवं जातियों के प्रभावों का एक सुन्दर समायोजन है | यहाँ के इतिहास में यद्यपि कलात्मक एवं सांस्कृतिक रूप से बहुत विविधता है किन्तु किसी व्यक्ति के ध्यानाकर्षण हेतु यह पर्याप्त है |

 

 

 

 

 

यहाँ के लोकनृत्य यहाँ के जीवन, मानव अस्तित्व एवं असंख्य मानव भावनाओं से युक्त हैं | इस शांत और सुरम्य राज्य की यात्रा तब तक अधूरी ही रहेगी जब तक यहाँ के स्थानीय जनों की संस्कृति एवं जीवनशैली के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं की जाती |

 

 

 

 

 

गढ़वाल क्षेत्र की लोकप्रियता पवित्र हिन्दू धर्म के धार्मिक स्थलों चार धाम के कारण है और इसी कारण इसे देवभूमि नाम से भी जाना जाता है |इस क्षेत्र का भोजन दिखने में सीधा सरल, किन्तु नैसर्गिक स्वाद से युक्त होता है | गढ़वाल की विषम एवं पहाड़ी परिस्थितियों के कारण गढ़वाली मांस खाना पसंद करते हैं एवं इसे अपने भोजन में विशेष स्थान भी देते हैं | किसी गाँव में किसी मंदिर अथवा किसी धार्मिक आयोजनों पर गाँव में रहने वाले एवं देश विदेश में रहने वाले सभी गाँव के लोगों को बुलाया जाता है जिसमे सभी लोग शामिल होते हैं |

 

 

 

 

 

उत्तराखंड के प्रसिद्ध व्यंजन  :- उत्तराखंड की संस्कृति का खाना-पीना सब कुछ एक अलग की खुसी का एहसास दिलाता है। उत्तराखंड में गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों के अलग-अलग खाद्य पदार्थों की बड़ी विविधता है, जो किसी को भी  उत्तराखंड में स्थानीय साग-पत्ते और मसाले का मिश्रण खाने का स्वाद और बढ़ा देते हैं  स्थानीय लोग खानपान में पतले भूरे रंग की मंडवे की रोटी को भी पसंद करते हैं जो की मंडवे (बाजरा) के आटे से बनायीं जाती है एवं इसे लोग घर में बने घी के साथ खाते हैं | इसके अलावा गढ़वाल कुमाऊ की पहाड़ियों में गहथ के परांठे भी पसंद किये जाते हैं जिन्हें बनाने के लिए दाल को रात भर भिगाया जाता है बहुत सी लहसन,अदरक, हरी मिर्च और कुक्कुट के आटे के साथ मिला कर प्रेशर कुकर में पका कर इसे गेंहू के आटे के साथ बनाया जाता है |इसके अलावा यहाँ रोट, रस, काफ्ली, छनछयोड, भांग की चटनी आदि प्रसिद्ध है | आप जब भी गढ़वाल की यात्रा पर आयें तो स्थानीय रेस्तरां की सूची बना के रखे जहाँ आप स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ़ ले सके ताकि आपकी यात्रा अप्रत्याशित आनंद से भर सके |
 

 

 

 

 

 

 

कंडाली का साग:- कंडाली में काँटे होने के कारण इसे बिच्छू घास भी कहते हैं| कंडाली को उबाल कर पकाया जाता है और चावल या रोटी के साथ खाया जाता है। इसके अलावा काली दाल और चावल के साथ भी कंडाली की खिचड़ी बहुत अच्छी लगती है। कंडाली को सर्दियों में शरीर में गर्माहट

 

 

 

 

 

 

 

 

थिन्चवानी:- थिन्चवानी आलू या मूली को क्रश कर के बनाया जाता है। इसे चावल या रोटी दोनों के साथ ही खा सकते हैं। थिन्चवानी में ज़ख्या या फरन का तड़का हो, तो इसका स्वाद और बढ़ जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

फानु / फाणु:- इस व्यंजन में अलग अलग तरह की दालों का इस्तेमाल किया जाता है। सारी रात उन दालों को भिगो कर रखने के बाद अगली सुबह पीसकर पकाते हैं और चावलों के साथ परोसते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

गहत की दाल के पराठे:- यह पराठे उत्तराखंड का फेमस खाना है। यह पराठे गहत की दाल को गेहूं या मडुआ (रागी) के आटे में भरकर बनाया जाता है। गहत के पराठे को देसी घी, भांग की चटनी या किसी भी अचार के साथ खाया जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

भांग की चटनी:- उत्तराखंड की फेमस चटनियों में से एक है भांग की चटनी। भांग की चटनी भांग के बीज, जीरा लहसुन के पत्ते, इमली और नमक को साथ में मिलाकर पीसकर बनाई जाती है और यह चटनी आप किसी भी व्यंजन के साथ खा सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

झंगोरी की खीर (Jhangora ki Kheer)- झंगोरी की खीर को मीठे पकवान के तौर पर जाना जाता है । इसे झंगोरी नामक स्थानीय बाजरे से बनाया जाता है जो काफी पौष्टिक होता है । इसमें काजू, किसमिस, बादाम डाल देने से यह और ज्यादा स्वादिष्ट और पौष्टिक बन जाता है ।

 

 

 

 

 

 

 

काछमौली (Kachmauli) – पहाड़ो के सर्द मौसम की वजह से यहाँ नॉनवेज भी खूब पसंद किया जाता है । काछमौली मटन से बना हुआ पकवान है । यह खूब तीखा और मसालेदार होता है । इसको बनाने के लिए पहले मटन को भूना जाता है । इसमें ग्रेवी कम रखी जाती है ।
 

 

अरसा (Arsa) – इसको गुड, चावल और सरसों के तेल से बनाया जाता है । एक स्थानीय मिठाई है । इसको बनाने के लिए चावल को थोड़ी देर भिगा देते है । फिर चावल से पानी छानकर अलग कर दें । पानी जब सूख जाए तो इसे पीसकर पाउडर बना लें । गुड को पानी में उबालकर चासनी तैयार कर ले और फिर चावल के पाउडर से आटा तैयार करके इससे छोटी-छोटी बॉल बनाकर सरसों के तेल में डीप फ्राई कर दें और फिर इसे चासनी में डाल दे ।
 

 

भट्ट की चुरकानी (Bhatt ki Churkani)- भट्ट की चुरकानी भट्ट की दाल से बनाई जाने वाली कुमाऊं की एक पारंपरिक पकवान है । इस काले बीन्स की फलियां बेहद सुगंधित और पोषणयुक्त होती है । ठंढे मौसम की यह एक बेहतरीन डिश है जो विटामिन्स, प्रोटीन और खनिज तत्वों से भरपूर होती है ।

 

 

 

 

 

 

मंडुवे की रोटी (Mandue ki Roti)- मंडुवे में बहुत ज्यादा फाइबर होता है, इसलिए इसकी रोटी स्वादिष्ट होने के साथ ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायक भी होती है। मंडुवे की रोटी भूरे रंग की बनती है, क्योंकि इसका दाना गहरे लाल या भूरे रंग का होता है। मंडुवे की रोटी को घी, दूध या भांग व तिल की चटनी के साथ परोसा जाता है, लेकिन इसका सबसे अच्छा और लोकप्रिय तरीका हैं मडुवे की रोटी में घी लगाकर गुड़ के साथ खाने का।

 

 

 

 

 

 

 

बाल मिठाई (Baal Mithai)- बाल मिठाई उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की और पड़ोसी कुमाऊं हिल्स की प्रमुख विशेषता है। ये मिठाई भूरे रंग के चॉकलेट की तरह दिखती हैं, जिसे खोया को भून कर उसे सफेद चीनी गेंदों के साथ लेपित कर बनाया जाता है| यह भारत के हिमालयी राज्य उत्तराखंड मुख्यतः अल्मोड़ा क्षेत्र की एक प्रसिद्ध मिठाई है |