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पर्यटन केवल दोहन नहीं

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आखिर हिमाचल का पर्यटन है क्या और किस उपभोक्ता के लिए है। क्या हम यह समझते हैं या किसी खुशफहमी में हैं कि पर्यटन उद्योग केवल होटल, टैक्सी और परिवहन का धंधा है। कम से कम मनाली टैक्सी यूनियन के व्यवहार से तो यही प्रतीत होता है कि उनके लिए सैलानी एक मुर्गा है, जिसे जबरिया तौर पर रोहतांग तक घुमाना है। यह इसलिए क्योंकि रोहतांग रोप-वे निर्माण का पहला विरोध मनाली के टैक्सी संगठन कर रहे हैं यानी पर्यटन उद्योग उनकी बपौती बनकर चले और इस तरह वह इसे यात्री ढुलाई की तरह चलाएं। बेशक आज के हालात में रोहतांग का सफर टैक्सी व पर्यटक के बीच का दोहन है, जिसका सीधा लाभ एक पक्ष को मिलता है, लेकिन यह रिश्ता चिरस्थायी नहीं हो सकता। रोहतांग को कब तक रज्जु मार्ग से मोहताज रखकर पर्यटन बढ़ सकता है या कल अटल टनल की तर्ज पर प्रदेश के बाकी हिस्से सुविधाजनक यात्रा के विकल्प ढूंढ पाएं तो रोहतांग की टैक्सी क्या करेगी। बेशक हिमाचल में पर्यटन विकास का अर्थ रोजगार के नए अवसरों से जुड़ता है और इनमें परिवहन और होटल व्यवसाय की अहम भूमिका है, लेकिन इस क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा को भी समझना होगा। हिमाचल में पर्यटन का बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर के बाधित सफर की कहानी सरीखा है। दूसरी ओर परिवहन की अत्यधिक दरों के कारण लोग सस्ती हवाई उड़ानों के कारण विदेश यात्रा को अहमियत देते हैं। विडंबना यह है कि हिमाचल के तीनों हवाई अड्डों पर उतरते सैलानी को पहले ही महंगी टिकट स्वीकार करनी पड़ती है, उसके ऊपर स्थानीय दृश्यावलियों को निहारने के नाम पर अव्यवस्थित व मनमर्जी की दरों पर टैक्सी यात्रा करनी पड़ती है। क्या सोलंग का अनुभव टैक्सी के कारण बढ़ता रहेगा या रोप-वे के लुत्फ में यह सफर पर्यावरण मित्र हो जाएगा। प्रदेश में पर्यटन आकर्षण बढ़ाने के लिए अगर एक सुरंग कमाल कर रही है, तो कल विकास के हर आयाम पर सैलानी खड़े होंगे यानी अधिकतम रज्जु मार्ग पूरे उद्योग को सशक्त करेंगे। एक अनुमान के अनुसार अगले दस सालों में देश का परिवहन-पर्यटन क्षेत्र करीब 34 करोड़ लोगों का रोजगार पैदा करेगा। यह रोजगार समग्र अधोसंरचना निर्माण, पर्यावरण संरक्षण तथा मनोरंजन के नए-नए प्रयोगों से संभव होगा। हिमाचल में ही कोरोना काल से पूर्व विकसित हुए पर्यटन उद्योग का विश्लेषण करें, तो सबसे अधिक धार्मिक, युवा तथ घरेलू पर्यटक ही बढ़े हैं। कायदे से अभी हिमाचल में पर्यटन की मंजिलें अधूरी हैं और इसीलिए वांछित सैलानी यहां नहीं पहुंच पाते। यही वजह रही कि राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल की हिदायतों के अनुरूप अब व्यवस्थाएं बन रही हैं। जाहिर है रोहतांग मार्ग पर इसीलिए वाहन गतिविधियां कम की गईं। हिमाचल में हाई एंड टूरिज्म के लिए अटल टनल के जरिए लाहुल-स्पीति एक प्रबल संभावना है, लेकिन क्या वर्तमान स्थिति में लग रहे ट्रैफिक जाम को परिवहन व्यवस्था की नियति मान लें। कल यही तो रोहतांग के सफर में हो रहा था। ऐसा संभव नहीं कि पर्यटक असुविधाजनक परिस्थितियों में पर्यटन का चिराग जलाए रखें और हम इसे अपना प्रोफेशनल अधिकार मान लें। हिमाचल का असली पर्यटन तो अभी शुरू होना बाकी है। जब प्रदेश में ग्रामीण-एग्रो, साहसिक, हैल्थ, सांस्कृतिक व ईको टूरिज्म की दिशा तय होगी, तो यकीनन हिमाचल की पर्यटन डेस्टिनेशन सीमांत क्षेत्रों से शुरू हो जाएगी। हिमाचल में पर्यटक को अगर सप्ताह भर रोकना है, तो अनेक ट्रैवल सर्किट बनाने पड़ेंगे और जहां बसें, टैक्सियां और रज्जु मार्ग भी चलेंगे। रोहतांग तो एक पड़ाव है, समूची कुल्लू घाटी की अंतिम संभावना नहीं, बल्कि रोप-वे जैसी सुविधाओं से निकलकर ही अगले पड़ाव तय होेंगे।