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संक्रमण का जनादेश !

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आज बिहार चुनाव का जनादेश सार्वजनिक हो जाएगा। उसके साथ यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि किस मुद्दे पर सर्वाधिक वोट दिए गए हैं। यदि एग्जिट पोल अनुमानों के मुताबिक, राजद और उसके सहयोगी दलों को बहुमत हासिल होता है, तो यकीनन तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन ऐसा जनादेश जाति, संप्रदाय और पहचान के परे एक महत्त्वपूर्ण संक्रमण का जनादेश होगा। बिहार उत्तर भारत में राजनीतिक तौर पर एक परिपक्व राज्य है, बेशक वहां गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, पलायन और बदहाली के हालात आज भी हैं। करीब 33 फीसदी आबादी या तो गरीब है अथवा गरीबी-रेखा के नीचे है। इसी अक्तूबर में बिहार में बेरोजगारी की दर करीब 10 फीसदी रही, राष्ट्रीय औसत से करीब तीन फीसदी अधिक। यदि जनादेश तेजस्वी के नेतृत्व वाले गठबंधन के पक्ष में आता है, तो स्पष्ट है कि लोगों ने नौकरी और रोजगार की अपेक्षा और उम्मीद के पक्ष में ज्यादा मतदान किया। बेरोजगारी के मद्देनजर बिहारियों ने देश के प्रधानमंत्री मोदी और 15 साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहे और भद्र, ईमानदार छवि के राजनेता नीतिश कुमार तक की अपीलों और आह्वानों पर कम वोट दिए। हम अनुमानों पर आधारित जनादेश का आकलन कर रहे हैं। सटीक व्याख्या तो 10 नवंबर के बाद ही संभव है। फिलहाल बुनियादी मुद्दा लालू यादव-राबड़ी देवी के कालखंड का कथित ‘जंगलराज’ नहीं लगता, क्योंकि करोड़ों नौजवानों ने वह कालखंड न तो देखा है और न ही झेला है। अब उन्हें नौकरी चाहिए, ‘रोटी’ के लिए रोजगार चाहिए। अभी वह युवा वर्ग उन व्यावहारिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सोचने को भी तैयार नहीं है कि क्या और कैसे 10 लाख सरकारी नौकरियां संभव होंगी? उनके लिए बजट के बंदोबस्त कैसे होंगे? क्या बिहार का वित्तीय घाटा ‘असहनीय’ कर यह निर्णय थोपा जा सकेगा? क्या वे नौकरियां पाने वाले नौजवान नियमित वेतन प्राप्त कर सकेंगे? नियमित वेतन का घोर संकट तो दिल्ली विश्वविद्यालय और नगर निगमों में है, जहां बजट की व्यवस्था पहले से ही तय है और केंद्र सरकार वह बजट उपलब्ध कराती है। बिहार में सरकारी नौकरी और रोजगार पर किसी भी विवेकपूर्ण नीति का समर्थन नहीं दिखता। एग्जिट पोल के अनुमानों में 40-45 फीसदी वोट नौकरी के मुद्दे पर दिया गया है। औसत बेरोजगार, महिला-पुरुष, प्रवासी मजदूर और बेहाल किसान ने खुलकर वोट दिए हैं, ऐसा अनुमानों की व्याख्या है। बिहार की राजनीति में यह एक बहुत बड़े संक्रमण, परिवर्तन का संकेत है। वैसे बिहार की अर्थव्यवस्था की विकास-दर, बीते 2-3 सालों के दौरान, बेहतर रही है। औद्योगिक नगण्य होने के बावजूद विकास-दर 11 फीसदी से ज्यादा रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था में उत्पादन और निर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी, कृषि क्षेत्र की तुलना में, आधी से भी कम है, लिहाजा प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है। शायद यही सबसे बड़ा कारण है कि लाखों नौजवानों और अन्य वर्गों को दूसरे शहर और राज्य में रोजगार के लिए जाना पड़ता है। बहरहाल बिहार में नौकरी और रोजगार को, यदि, असलियत में देखना है, तो नई सरकार को उद्योगों को आमंत्रित कर निवेश करने की अपील करनी होगी। अपील से ही उद्योग स्थापित होने लगेंगे और बिहार की सूरत बदल जाएगी, ऐसी कल्पना और अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। यह एक बहुत लंबी प्रक्रिया है। बिहार सरकार को भरोसा दिलाना पड़ेगा कि सब कुछ सुरक्षित होगा और नया बिहार उद्योगों के माकूल राज्य है। लेकिन बिहार में अब संक्रमण का दौर लगता है। जो बिहार जाति, संप्रदाय, मंडल, यादव और कुर्मी, दलित और महादलित, पिछड़े और अति पिछड़े आदि के आधार पर वोट देता रहा है, वह बिहार इस बार बदलता दिखता है। यह रुझान इन चुनावों का सबसे बड़ा हासिल है। यदि अनुमानों के मुताबिक ही जनादेश आता है, तो इसे विडंबना ही मानना चाहिए कि नौकरी और रोजगार चाहने वाले बिहार में विकास को स्वीकृत मुद्दे के तौर पर मान्यता नहीं मिली। यदि यह भी महत्त्वपूर्ण मुद्दा होता, तो बेशक बिहारी मतदाता यह जरूर सोचता कि उसके राज्य में सड़कों और पुलों का जाल बिछा है।