Home Alok Mehta बम और बंदूक के बिना प्रजातंत्र की विजय पताका

बम और बंदूक के बिना प्रजातंत्र की विजय पताका

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-आलोक मेहता
शहरी इलाकों की अपेक्षा ग्रामीण , आदिवासी इलाकों में भारी मतदान हुआ | उनके लिए विकास , शिक्षा , चिकित्सा , सड़क सबसे बड़ा मुद्दा रहता है | पटना , दिल्ली , मुंबई जैसे शहरी इलाकों में मतदाता उदासीन रहने लगे हैं | वहां मत प्रतिशत कम होता है | गरीब लोगों की उम्मीदें , विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक जीवित और सुरक्षित कर रहा है |
सचमुच चमत्कार है | दुनिया के सबसे सम्पन्नं और दो सौ साल के चुनावी अनुभव वाले अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के समय कुछ इलाकों में लोग बंदूक लिए सड़कों पर अपनी पार्टी – उम्मीदवार के समर्थन में निकले दिखे , वाशिंगटन तक में व्हाइट हाउस – राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा बढ़ानी पढ़ रही है | करीब एक करोड़ मतदाताओं को मोबाइल या ईमेल से धमकी भरे सन्देश मिले कि वे घर से न निकलें , मतलब वोट न डालें | इनमें अधिकांश वहां के अल्पसंख्यक कहे जा सकने वाले अश्वेत ( अफ़्रीकी ) और एशियाई मूल के अमेरिकी नागरिक थे | इस कारण देश में पोस्ट ( डाक ) से वोट देने वालों की संख्या इस बार बहुत अधिक हो गई और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं | वहां डाक से वोट देने का अधिकार दशकों से रहा है |
दूसरी तरफ इन्ही दिनों में बिहार विधान सभा के तीन चरणों में हुए मतदान के दौरान बम धमाकों , बंदूकों से मतदाताओं को रोकने , बड़ी संख्या में हिंसा की घटनाएं देखने सुनने को नहीं मिली | इक्का दुक्का झगड़े गाली गलोच , आरोप प्रत्यारोप , धमकियों की ख़बरें सामने आई | चुनाव के परिणाम कुछ भी हों , मुझे ही नहीं हर भारतवासी को इस बात पर बहुत गौरव तथा प्रसन्नता होनी चाहिए कि हमारे प्रजातंत्र की विजय पताका पूरी दुनिया के लिए रोशनी पहुंचा रही है | सुदूर सीमांचल के क्षेत्र – अररिया – पूर्णिया के गरीब , अशिक्षित ८० वर्ष के स्त्री पुरुष या 18 वर्ष पार कर चुके युवा उत्साह से वोट डालते रहे |
इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाताओं का वर्चस्व भी है | बिहार सहित हाल के वर्षों के विधान सभा – लोक सभा चुनावों में एक सकारात्मक तथ्य यह भी सामने आया कि शहरी इलाकों की अपेक्षा ग्रामीण , आदिवासी इलाकों में भारी मतदान हुआ | उनके लिए विकास , शिक्षा , चिकित्सा , सड़क सबसे बड़ा मुद्दा रहता है | पटना , दिल्ली , मुंबई जैसे शहरी इलाकों में मतदाता उदासीन रहने लगे हैं | वहां मत प्रतिशत कम होता है | गरीब लोगों की उम्मीदें , विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक जीवित और सुरक्षित कर रहा है | पहले बिहार के चुनावों में हथियारों की बात स्पष्ट करना जरुरी है | लगभग पांच दशकों से चुनावी राजनीति को नजदीक से देखने सुनने लिखने बोलने का निजी अनुभव रहा है | लगभग तीस साल पहले तीन साल बिहार में रहकर एक प्रमुख अखबार का संपादक रहते हुए संयोगवश विधान सभा और लोक सभा के तीन चुनाव पर विस्तार से कवरेज करने कराने छापने का अवसर मिला | बात 1988 से 1991 की है | शायद विश्वसनीयता के कारण ऐसे राजनीतिक लोग भी मुझे दफ्ता में आकर मिले , जो बाकायदा सब्जी या जेवरों की सूची की तरह उनके विरोधियों और उनके पास हथियारों – बंदूक , गोला बारूद की अनुमानित संख्यां सूची दिखाकर जानकारी दे जाते थे | इनमें देश के राष्ट्रीय दलों के प्रभावशाली उम्मीदवारों के समर्थक – विरोधी होते थे | इसके अलावा माओवादी , कम्युनिस्ट , कोयला – सहकारिता माफिया से जुड़े लोग तो खुलकर मैदान में होते थे | पराकाष्ठा यह तक थी कि सांप्रदायिक दंगें में भी मारने घायल करने का पूरा प्लान रहता था | मतलब आतंक की छाया में भारी या कम मतदान होता था |
पश्चिम उत्तर प्रदेश की तरह बिहार के दलित बाहुल्य वाले कुछ गांवों के लोगों को तो मतदान के दो दिन पहले बाहर जाने का हुक्म दे दिया जाता था , ताकि उनके नाम का वोट ” बड़े लोग ” अपनी इच्छानुसार डलवा सकें | यदि कहीं मतदान हो भी जाए तो मत पेटियों को लूटकर तालाब , नदी , जंगल में फेंक दिया जाता था | अब इन बातों को शायद नई पीढ़ी के मेरे पाठक या उनके देश विदेश के मित्र कपोल कल्पित कहानी समझ सकते हैं | ऐसा नहीं है कि आज भी भय , आशंका , धमकियां और थोड़ी बहुत हिंसक घटनाएं भी होती हैं , लेकिन चुनाव आयोग , अदालत आदि के दरवाजे , सारी कमियों और नाराजगी के बावजूद टी वी न्यूज़ चैनल के कैमरों से बहुत सी बातों के प्रमाण आ जाते हैं | इसकी बावजूद अभी चुनाव सुधारों की अनेक मांगें , सिफारिशें चुनाव आयोग , सरकार और अदालतों के समक्ष विचाराधीन हैं |
प्रजातंत्र से राम राज्य की कल्पना , कल्याण की अपेक्षा , विकास की तेज गति , पार्टियों और नेताओं से कभी लगाव , कभी नाराजगी , नफरत तक स्वाभाविक है | वायदे करने और उन्हें तोड़ने , जीतने के बाद अपने इलाकों – लोगों से दूर हो जाने या निरंतर संपर्क सहायता करके उस क्षेत्र को अपनी जागीर बना लेने की स्थितियां भी हैं | धन बल का दबदबा रहता है | फिर भी बड़े धनपति पूर्व राजा महाराजा सारे संसाधनों के बावजूद बुरी तरह पराजित हो जाते हैं |
बिहार में बम बंदूक वाले माफिया और माओवादी भी पराजित हो रहे हैं | दूसरी तरफ अच्छी बात यह है कि डिब्बों के बजाय मशीनों से वोटिंग हो रही है और अमेरिका से तिगुनी आबादी शान के साथ वोट देती है | तभी पिछले दिनों मुझे एक अन्तर्राष्ट्रीय चैनल पर कहना पड़ा था कि अमेरिका को भारत के पूर्व चुनाव आयुक्तों , विशेषज्ञों की सहायता लेनी चाहिए | अब भारत लोकतंत्र की महा शक्ति है | चीन में तो जीवन पर्यन्त का इंतजाम कर लिया गया है | हम आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं | लेकिन राम राज्य हजारों वर्षों से जानते हैं | महात्मा गाँधी ने भी इसी बल पर आज़ादी दिलाई है | संघर्ष से सफलता पाना जानते हैं |