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एक फोरलेन का मातम

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कांगड़ा अब ट्रीट और मिसट्रीटमेंट के बीच अपना बचाव कर रहा है। यह खिड़कियों से आकाश को देखने की कोशिश है जो आईनों के आर-पार होती सियासत का मंतव्य नहीं जानती। कुछ खुशियां भी हैं जिनसे राजनीतिक ट्रीट परिलक्षित होती है। नूरपुर में एएसपी कार्यालय, पालमपुर में सशस्त्र पुलिस व प्रशिक्षण मुख्यालय या धर्मशाला में डीआईजी इंटेलीजेंस कार्यालय का स्थानांतरण बेशक सियासी चेहरों की शान बढ़ा दे, लेकिन धर्मशाला से शिमला को जोड़ने की महत्त्वाकांक्षी फोरलेन परियोजना का खारिज होना, एक बड़े इलाके को दोयम दर्जे की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है। आश्चर्य यह कि इस परियोजना का जन्म, नामकरण और रिश्ता सर्वप्रथम भाजपा के राष्ट्राध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से जुड़ता है, फिर उम्मीदों को परवान चढ़ाने का बहाना बनते हैं केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर और अपने नए वजूद की रखवाली में सांसद किशन कपूर कांगड़ा के स्वाभिमान की कसम खाते हैं, लेकिन सारा राजनीतिक लंगर छिन्न-भिन्न हो जाता है। यह मात्र क्षेत्रीय पहचान का सबब नहीं, बल्कि भौगोलिक जरूरत का सबसे अहम प्रश्न है। ऐसा नहीं हो सकता कि प्रदेश की सबसे अधिक जनसंख्या से जुड़ रही फोरलेन परियोजना को यूं ही फांसी दे दी गई या यह कोई ऐसा संकल्प नहीं रहा जिससे भाजपा को राजनीतिक लाभ न मिला हो। परियोजना की एक आंख नड्डा तो दूसरी अनुराग की रही, तो क्या केंद्र आंख मूंद कर अब आगामी चुनाव में फिर बोली लगाएगा। यह सरासर तौहीन नहीं, बल्कि प्रदेश को कठपुतली की तरह देखने का अंदाज भी है। जाहिर तौर पर यह सियासी नफे नुकसान में हिमाचल की हिस्सेदारी है, जो इतने सालों तक प्रदेश को मूर्ख बनाती रही। गौर करें जब पिछली एनडीए सरकार के कार्यकाल में 69 एनएच की घोषणा हुई थी या जब वीरभद्र सिंह सरकार को इसी विषय पर घेरा जाता था। बाकायदा वीरभद्र सिंह इस बात के लिए दोषी ठहराए गए कि उन्होंने डीपीआर बनाने में देरी की। अब सवाल डबल इंजन के यथार्थ और राज्य की प्राथमिकताओं का भी है। भाजपा के भीतर नए समीकरणों और राजनीतिक भूगोल शास्त्र के पैमाने में अटकी इस परियोजना को पढ़ना होगा और यह भी सोचना होगा कि इस फैसले के नजरिए से कौन लुढ़क और कौन सिमट रहा है। हाल यह है कि अब शांता कुमार जैसे कद्दावर नेता को अपने प्रभाव की सीमा में पालमपुर नगर परिषद का बढ़ता दायरा ही सबसे बड़ा उपहार लगता है। उनके लिए वे तमाम प्रश्न गौण हो गए, जो उन्हें सांसद बनाते वक्त राजनीतिक संधि के तौर पर मिले थे। कांगड़ा-चंबा संसदीय क्षेत्र के सांसद, दो बार राज्य के मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के मार्गदर्शक रहे शांता कुमार का कद अगर पालमपुर नगर निगम साबित करेगा, तो कांगड़ा की पतझड़ पर गौर करें। अगर मसला बाढ़ग्रस्त सौरभ वन विहार के क्षेत्रफल में शांता कुमार को ले आया है, तो निश्चित रूप में आज मटौर-शिमला फोरलेन मिट रही है, तो कल पठानकोट-मंडी परियोजना भी मातम मनाएगी। पठानकोट-मंडी ब्रॉडगेज रेल मार्ग, कांगड़ा हवाई अड्डा विस्तार व औद्योगिक विकास के तमाम दावे इसी तरह पनाह मांगते नजर आएंगे। फिर कहीं प्रदेश की संवेदना को केंद्र नहीं समझ रहा है। फिर कहीं पौंग जलाशय में डूबी सिसकियां चोट खा रही हैं। फिर कहीं हमारे सांसद दिल्ली में फेल हो रहे हैं और इस बार तो सत्ता पुरुष जगत प्रकाश नड्डा भी अपनी जुबान से मुकर रहे हैं। हिमाचल के लिए सड़कों का विस्तार पर्वतीय जिंदगी के प्रति केंद्र का न्याय है, लेकिन हम ऐसे बच्चे हैं जो कभी बड़े नहीं होना चाहते। हमारे अधिकार कभी गोबिंदसागर तो कभी पौंग जलाशय में डूबे, लेकिन अफसोस यह कि केंद्र ने इसके बदले हमेशा हमारी किश्ती से किनारा किया। मटौर-शिमला फोरलेन अब एक ताजातरीन उदाहरण है कि किस तरह हिमाचली दुरुहता को मापा जा रहा है और तर्क यह कि ऐसी परियोजना के काबिल यह क्षेत्र ही नहीं है यानी एक बार फिर हिमाचल का राजनीतिक इतिहास शर्मिंदा है, लेकिन अब छाती ठोंककर हम महाराष्ट्र का मुकाबला करने में लगे हैं।