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मन के घाव

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-मनोज पुरी
तन के घाव तो मिट जाते हैं, मन के घाव नहीं मिटते ,
पनप गये दुर्भाव जो मन में, वो आभाव नहीं मिटते ।
बड़े चाव व प्रेम-मोहब्बत, से रिश्ते ये बनते हैं ,
खुद मानव ही आखिर क्यों फिर, इन रिश्तों के हन्ते हैं ।।
रिश्तों के अवमूल्यन से तो, घोर निराशा पनप रही ,
घर के भीतर दो बर्तन सी, आपस में है खनक रही ।
आपस में तकरार दिलों को, दूर हमेशा कर जाती ,
पुर्नमेल की आशा में, ये नाक बीच में है आती ।।
अब प्रेम और सौहार्द की भाषा, समझ न इंसा पाता है ,
आँख मिला कर बात को करने, में भी वो घबराता है ।
मन की आँखों से क्यों हम, जीवन में भोर नहीं करते ,
प्रेम की बारिश जीवन में, घनघोर नहीं हम क्यों करते ।।
तन से दूर जो हो जाओ, पर मन से दूर नहीं होना ,
जीवन ये अनमोल बहुत है, रिश्ते इसके मत खोना ।
राह निकालो पुनर्मिलन की, मुद्दे को मारो गोली ,
गले मिलो तुम दुश्मन के भी, ईद हो या फिर हो होली ।।