होली पर झारखंड के स्वयं सहायता समूहों ने तैयार किया हर्बल गुलाल

नेशनल एक्सप्रेस डिजिटल डेस्क
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झारखंड के सिमडेगा जिले में सरकार समर्थित स्वयं सहायता समूहों ने इस होली पर प्राकृतिक सामग्री से हर्बल गुलाल तैयार किया है।

रांची, भाषा। झारखंड के सिमडेगा जिले में सरकार समर्थित स्वयं सहायता समूहों ने इस होली पर प्राकृतिक सामग्री से हर्बल गुलाल तैयार किया है। ‘झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी’ (जेएसएलपीएस) से जुड़ी महिलाएं ठेठैतांगर, केरसाय और जलडेगा प्रखंडों में ‘पलाश’ ब्रांड के तहत इस उत्पाद का विपणन कर रही हैं। सिमडेगा की उपायुक्त कंचन सिंह ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक सहयोग मिलेगा और जिले की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उन्होंने कहा, “सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल होली मनाना हम सभी की जिम्मेदारी है। लोगों को स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार हर्बल गुलाल का उपयोग करना चाहिए।”

अधिकारियों ने बताया कि यह गुलाल पलाश के फूल, हल्दी, चुकंदर और पालक जैसे प्राकृतिक स्रोतों से पारंपरिक विधि से रंग निकालकर तैयार किया जाता है। सामग्री को छाया में सुखाकर पीसा और छाना जाता है। इसमें किसी रसायन का उपयोग नहीं किया जाता, जिससे यह त्वचा के लिए सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है। जेएसएलपीएस पिछले तीन-चार वर्षों से हर्बल गुलाल को बढ़ावा दे रहा है, विशेषकर कृत्रिम रंगों से होने वाली एलर्जी और त्वचा संबंधी समस्याओं की चिंताओं को देखते हुए। यह उत्पाद विभिन्न जिलों में मॉल, अस्थायी स्टॉल और खुदरा दुकानों के माध्यम से बेचा जा रहा है।

जेएसएलपीएस की मुख्य कार्यपालक अधिकारी अनन्या मित्तल ने बताया कि महिलाओं को पर्यावरण अनुकूल रंग तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया है। इस वर्ष रांची, सिमडेगा, हजारीबाग, कोडरमा, रामगढ़, पलामू और पाकुड़ जिलों के स्वयं सहायता समूह हर्बल गुलाल का उत्पादन कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, 100 ग्राम का पैकेट 30 से 60 रुपये के बीच और 250 ग्राम का पैकेट 90 से 120 रुपये के बीच उपलब्ध है। सिमडेगा के चंपा आजीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य देवांती देवी ने बताया कि 10 महिलाओं का समूह 2,500 रुपये के प्रारंभिक निवेश से जैविक गुलाल तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा, “समूह से जुड़ने के बाद हमें घर चलाने में कठिनाई नहीं होती। अब हमें पूरे वर्ष रोजगार के अवसर मिलते हैं।”

एक अन्य सदस्य रोमीला डुंगडुंग ने कहा कि गुलाल बनाने की प्रक्रिया में धैर्य और सावधानी जरूरी है। उन्होंने कहा “रंग फीका न पड़े, इसलिए इसे सीधी धूप में नहीं सुखाया जाता, बल्कि लगभग पांच दिन छाया में सुखाया जाता है। उचित प्रशिक्षण से एक महिला एक मौसम में 10,000 रुपये तक कमा सकती है।” एक अधिकारी ने बताया कि सिमडेगा जिले में जेएसएलपीएस के तहत 7,660 स्वयं सहायता समूहों से 83,831 ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं। अब तक 6,822 समूहों को आजीविका ऋण के रूप में 20 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्रदान की जा चुकी है।

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