नीलकंठ महादेव बनाम शम्सी जामा मस्जिद मामले में अब 12 फरवरी को होगी सुनवाई

नेशनल एक्सप्रेस डिजिटल डेस्क
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बदायूं में नीलकंठ महादेव मंदिर बनाम शम्सी जामा मस्जिद मामले की पत्रावली अब फिर से अपर दीवानी न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) सुमन तिवारी की अदालत में स्थानांतरित होकर आ गई है और इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 12 फ़रवरी को मुकर्रर की गई है।

बदायूं (उप्र), भाषा। बदायूं में नीलकंठ महादेव मंदिर बनाम शम्सी जामा मस्जिद मामले की पत्रावली अब फिर से अपर दीवानी न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) सुमन तिवारी की अदालत में स्थानांतरित होकर आ गई है और इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 12 फ़रवरी को मुकर्रर की गई है। एक अधिवक्ता ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अभी त्वरित अदालत के न्यायाधीश पुष्पेंद्र चौधरी इस मामले पर सुनवाई कर रहे थे क्योंकि अपर दीवानी न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) सुमन तिवारी के मातृत्व अवकाश पर चले जाने के कारण मुकदमे की फाइल त्वरित अदालत में स्थानांतरित कर दी गई थीं।

अधिवक्ता अरविंद सिंह परमार ने बताया है कि आज 16 जनवरी को नीलकंठ महादेव मंदिर बनाम शम्सी जामा मस्जिद मामले की फाइल अपर सिविल जज सीनियर डिवीजन सुमन तिवारी के मातृत्व अवकाश पर से वापस लौट आने के कारण एक बार फिर से उनकी अदालत में स्थानांतरित कर दी गई है, जिसमें 12 फरवरी की तारीख तय की गई है। परमार के अनुसार अब इस मामले में 12 फरवरी को ही यह तय हो सकेगा कि निचली अदालत को इस प्रकार के वाद को सुनने का अधिकार है अथवा नहीं।

उन्होंने कहा कि बार-बार अदालत बदलने से निर्णय प्रभावित होता है। यह विवाद 2022 में तब शुरू हुआ जब अखिल भारत हिंदू महासभा के तत्कालीन संयोजक मुकेश पटेल ने दावा किया कि जामा मस्जिद शम्सी स्थल पर नीलकंठ महादेव मंदिर मौजूद है । उन्होंने इस दावे के साथ ढांचे में पूजा करने की अनुमति मांगी। शम्सी जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के वकील अनवर आलम ने दलील दी कि उच्चतम न्यायालय का आदेश अधीनस्थ अदालतों को ऐसे विवादों की सुनवाई करने से रोकता है, इसलिए इस मामले को खारिज कर दिया जाना चाहिए।

हिंदू पक्ष की कानूनी टीम ने कहा कि न्यायालय के आदेश चल रहे या पहले से मौजूद मामलों पर लागू नहीं होते और मामले की सुनवाई उसके गुण-दोष के आधार पर होनी चाहिए। हालांकि आलम ने कहा कि समिति ने 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम का हवाला देते हुए एक आवेदन प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय देश की सभी अदालतों को पहले ही निर्देश दे चुका है कि वे उन मामलों में कोई आदेश पारित न करें जिनमें 1991 का अधिनियम लागू होता है।

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