परमार्थ निकेतन में विदेेेशी सैलानियों का आगमन
आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और वैश्विक संवाद का केन्द्र
परमार्थ निकेतन में विदेशी सैलानियों का आगमन केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक विरासत, सनातन संस्कृति और मानवीय मूल्यों के वैश्विक विस्तार का सशक्त प्रतीक है।
नेशनल एक्सप्रेस ब्यूरो, ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन आज न केवल भारत का, बल्कि विश्व का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। गंगा तट पर स्थित यह आश्रम प्रतिवर्ष हजारों विदेशी सैलानियों, साधकों, शोधार्थियों और योग प्रेमियों को आकर्षित करता है। परमार्थ निकेतन में विदेशी सैलानियों का आगमन केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक विरासत, सनातन संस्कृति और मानवीय मूल्यों के वैश्विक विस्तार का सशक्त प्रतीक है।

विदेशी सैलानी यहां योग, ध्यान, प्राणायाम, वेदांत, आयुर्वेद और भारतीय जीवन-दर्शन को निकट से अनुभव करने आते हैं। अनेक देशों से आए सैलानी यहां के योग शिविरों, सत्संग, गंगा आरती और साधना कार्यक्रमों में भाग लेकर आत्मिक शांति और जीवन के अर्थ की खोज करते हैं। परमार्थ निकेतन उनके लिए केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन की प्रयोगशाला है।
इस आश्रम की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी समन्वयात्मक दृष्टि। यहां पूर्व और पश्चिम, विज्ञान और अध्यात्म, परंपरा और आधुनिकता सभी का सुंदर संगम देखने को मिलता है। विदेशी सैलानी भारतीय संस्कृति को केवल पुस्तकों के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में आत्मसात करते हैं। वे भारतीय जीवन शैली, सादगी, सेवा, करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा लेकर लौटते हैं।
परमार्थ निकेतन में प्रतिदिन होने वाली विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती विदेशी सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। जब वे दीपों की ज्योति, वैदिक मंत्रों की ध्वनि और गंगा की पवित्र धारा के साथ जुड़ते हैं, तो उनके भीतर एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति जागृत होती है। अनेक विदेशी अतिथि इस क्षण को अपने जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बताते हैं।
योग और ध्यान के क्षेत्र में परमार्थ निकेतन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां आयोजित अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव, रिट्रीट्स और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विश्व के कोने-कोने से योग शिक्षक, विद्यार्थी और शोधकर्ता भाग लेते हैं। इससे भारत की योग परंपरा को वैश्विक पहचान मिलती है और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना साकार रूप लेती है।
परमार्थ निकेतन केवल आध्यात्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता, प्लास्टिक मुक्त अभियान और सेवा कार्यों में भी विदेशी सैलानियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है। वे वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान और सामाजिक सेवा कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर भारत की “सेवा ही साधना है” की भावना को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाते हैं।
इस अंतरराष्ट्रीय सहभागिता से भारत की सॉफ्ट पावर को भी सशक्त बल मिलता है। विदेशी सैलानी जब अपने देशों में लौटते हैं, तो वे भारत को केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक मार्गदर्शक और मानवीय मूल्यों के स्रोत के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह भारत की छवि को विश्व में और अधिक उज्ज्वल बनाता है।
परमार्थ निकेतन में विदेशी सैलानियों का आगमन यह सिद्ध करता है कि आज की दुनिया भौतिक प्रगति के साथ-साथ आध्यात्मिक संतुलन की भी खोज कर रही है। लोग तनाव, असंतोष और अस्थिरता से मुक्त होकर शांति, करुणा और आत्मबोध की ओर बढ़ना चाहते हैं, और परमार्थ निकेतन उन्हें इस मार्ग पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि परमार्थ निकेतन में विदेशी सैलानियों का आगमन एक वैश्विक चेतना का प्रतीक है, जहां सीमाएं मिटती हैं, संस्कृतियां जुड़ती हैं और मानवता एक सूत्र में बंधती है। यह आश्रम भारत की सनातन परंपरा को विश्व के हृदय तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है, और आने वाले समय में इसकी भूमिका और भी व्यापक एवं प्रभावशाली होगी।

