वंदे मातरम् भी राजनीति का औजार बना
राकेश अचल की कलम से
देश की जिस संसद में देश की सबसे बडी समस्याओं पर बहस नहीं होती, वहाँ वंदेमातरम पर 10 घंटे बहस हो रही है, क्योंकि इस बहाने भाजपा एक बार फिर कांग्रेस और पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को खलनायक बनाना चाहती है।
मैं भाजपा को दाद देना चाहता हूँ राजनीति के लिए नये औजारों का अन्वेषण करने के लिए। राम से लेकर वंदेमातरम तक को भाजपा ने सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने में संकोच नहीं किया। देश की जिस संसद में देश की सबसे बडी समस्याओ पर बहस नहीं होती, वहाँ वंदेमातरम पर 10 घंटे बहस हो रही है, क्योंकि इस बहाने भाजपा एक बार फिर कांग्रेस और पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को खलनायक बनाना चाहती है।
आप जब ये आलेख पढ रहे होंगे तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में 'वंदे मातरम्' की 150 वीं वर्षगांठ पर बहस की शुरुआत कर चुके होंगे, वे इतिहास को कुरेदते, खंगालते हुए कुछ ऐसा कहेंगे, जिससे राष्ट्रीय गीत के बारे में चर्चा के दौरान हंगामे हो ही। प्रधानमंत्री ने पहले ही कांग्रेस पर गीत के छंद हटाने का आरोप लगाकर इस बात के संकेत दे दिए हैं।
लोकसभा के बाद राज्यसभा में ‘वंदे मातरम्’ पर मंगलवार को चर्चा होगी, जहां गृह मंत्री अमित शाह चर्चा की शुरुआत करेंगे और स्वास्थ्य मंत्री तथा राज्यसभा में नेता जेपी नड्डा दूसरे वक्ता होंगे। दोनों सदनों में यह चर्चा 'वंदे मातरम' की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करेगी, जो भारतीय राष्ट्रवाद की प्रतीक है।
वंदे मातरम्' को 1870 के दशक में महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने संस्कृतनिष्ठ बंगाली में लिखा था। ये गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा है, जिसका पहला प्रकाशन 1882 में हुआ था. इस गीत को जदुनाथ भट्टाचार्य ने संगीतबद्ध किया था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में 'वंदे मातरम' एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत बना, जिसने लाखों क्रांतिकारियों को एकजुट किया। 1950 में भारत गणराज्य के गठन के साथ इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया। उस समय भी भाजपा के आदिपुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वंदेमातरम पर विवाद खडा करने की कोशिश की थी और आज यही काम भाजपा कर रही है।
केंद्र सरकार ने 'वंदे मातरम्' की 150 वीं वर्षगांठ पर विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया है जो इसकी सांस्कृतिक विरासत को सम्मानित करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे स्वतंत्रता संग्राम की अमर धरोहर बताते हुए कहा था कि ये गीत राष्ट्रभक्ति की भावना को जागृत करता है।
दरअसल भाजपा के निशाने पर बंगाल है. बंगाल में अगले साल ही विधानसभा के चुनाव हैं। बिहार के बाद बंगाल जीतने के लिए भाजपा को एस आई आर की सफलता पर संदेह है इसलिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए भाजपा ने वंदेमातरम को तलवार बना लिया.जबकि ये मुद्दा है ही नहीं। दशकों पहले इस पर विराम लग चुका है। सब जानते हैं कि वंदेमातरम सांगीतिक कंपोजीशन के आधार पर जन गण मन की जगह नहीं ले सका था, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ही उसे नेशनल सांग आफ एक्सीलेंस कहा था।
बंगाल में भाजपा सत्तारूढ तृणमूल कांग्रेस से पिछले दो विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त खा चुकी है। बंगाल ने पिछले आम चुनाव में भाजपा का 400 पार का सपना चकनाचूर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीम ममता बनर्जी ने भाजपा की ओर से बंगाल में की गई ध्रुवीकरण की हर कोशिश को नाकाम किया है फिर भी भाजपा ने हार नहीं मानी है।
आपको बता दें कि बंगाल में इस बार भी हिंदुत्व को उभारने के लिए एक ओर वंदेमातरम का इस्तेमाल किया जा रहा है तो दूसरी ओर सामूहिक गीता पाठ के आयोजन भी किया जा रहा है. भाजपा में रह चुके तृणमूल के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर को भी भाजपा ने बाबरी मस्जिद के नाम पर ध्रुवीकरण करने के लिए मैदान में उतार दिया है। हुमायूं भाजपा की सी टीम बन गये हैं ओर भाजपा की बी टीम ओवैसी के साथ मिलकर तृणमूल कांग्रेस को मिलने वाले वोटों में सेंध लगाने की तैयारी कर रहे हैं ताकि भाजपा की तृणमूल कांग्रेस से लडाई आसान हो जाए.। अब देखना ये है कि वंदेमातरम की पतवार क्या भाजपा को बंगाल की सत्ता तक ले जाने में कारगर साबित होगी या नहीं?
- राकेश अचल

