पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है : अदालत

नेशनल एक्सप्रेस डिजिटल डेस्क
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।

नयी दिल्ली, भाषा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने कहा कि जब अधिकारियों की कोई भी कार्रवाई ऐसे किसी अधिकार का उल्लंघन करती है, तो यह तर्कसंगत होनी चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने केंद्र सरकार के उस फैसले को रद्द करते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें रहेजा डेवलपर्स के पूर्व निदेशक योगेश रहेजा का पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आवेदन करते समय उनके खिलाफ लंबित प्राथमिकी की जानकारी न देने के कारण जब्त कर लिया गया था।

याचिकाकर्ता का पासपोर्ट जब्त करने का आदेश अधिकारियों द्वारा 17 जनवरी, 2025 को पारित किया गया था, और इस निर्णय के खिलाफ उसकी अपील को अपीलीय प्राधिकरण द्वारा 25 मार्च, 2025 को खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि विदेश मंत्रालय के 2019 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, केवल प्राथमिकी दर्ज होना पासपोर्ट जारी करने के संदर्भ में आपराधिक कार्यवाही लंबित माने जाने के समान नहीं है, जब तक कि सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत ने कथित अपराध का संज्ञान न ले लिया हो।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता का पासपोर्ट जब्त करने के लिए अधिकारियों द्वारा दिए गए कारण कानून की कसौटी पर खरे नहीं उतरे, क्योंकि उसने अक्टूबर 2024 में अपने पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था और इस पर संज्ञान फरवरी 2025 में लिया गया था, जो कि जब्ती आदेश के एक महीने बाद था। अदालत ने कहा, “पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पासपोर्ट रखने के अधिकार का अतिक्रमण करने वाली राज्य की किसी भी कार्रवाई को युक्तिसंगतता की कसौटी पर खरा उतरना होगा तथा वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।” अदालत ने अपने फैसले में कहा, “यह स्पष्ट है कि प्रतिवादियों द्वारा पारित निर्णय को बरकरार नहीं रखा जा सकता। तदनुसार, दिनांक 17 जनवरी 2025 और 25 मार्च 2025 के आदेश रद्द किए जाते हैं।”

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